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Thursday, September 3, 2020

सर्वोच्च न्यायालय का सही कदम



रेवांचल टाइम्स डेस्क - आरक्षण और गैर आरक्षण की अंतहीन बहस के बीच, अनेक बार कई मामलों में तो यह लगने लगा है कि अनुसूचित जाति या जनजाति के अंदर ही अनेक उपवर्ग, अर्थात जातियां-उपजातियां हैं, जो आरक्षण की दौड़ में पिछड़ने लगी हैं।देश के  सर्वोच्च न्यायलय ने आरक्षण में सुधार की दिशा में जो एक कदम बढ़ाया है, स्वागतयोग्य है पर समग्र विचार जरूरी है| बदलते भारत के लिए यह बेहद जरूरी हो गया है | अगर इसका समय रहते हल नहीं निकला तो परिणाम गंभीर हो सकते है  । समानता का तकाजा है कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग के अंदर ही उपवर्ग बनाकर विशेष आरक्षण का मुद्दा समय के साथ गंभीर  होता जा रहा है। 
             अब सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही 16 साल पुराने फैसले पर विचार करना है। चूंकि सर्वोच्च न्यायलय की पांच सदस्यीय पीठ ने वर्ष 2004 में यह फैसला दिया था कि राज्यों को किसी आरक्षित वर्ग के अंदर उपवर्ग बनाकर आरक्षण देने का अधिकार नहीं है, इसलिए अब जब इस फैसले में कोई बदलाव करना है, तो सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ को विचार के बाद नया फैसला करना होगा। संभावना है, सर्वोच्च न्यायालय इस मुद्दे को सुलझाने के लिए सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ का गठन करेगा। यह पीठ इस पर विचार करेगी कि क्या सूची के भीतर ‘अत्यंत पिछड़ी’ जातियों को प्राथमिकता देने के लिए अजा/ अजजा आरक्षण सूची में उप-वर्गीकरण हो सकता है।
देश में अक्सर ऐसे फैसले चुनाव के दौरान किये जाते हैं, फिर उनके अमल में मुसीबतें आती हैं  यह ही ऐसे ही घटनाक्रम की उपज है |पंजाब सरकार ने वर्ग के अंदर उपवर्ग बनाकर आरक्षण देने की कोशिश की थी, लेकिन पंजाब उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के 2004 के फैसले के प्रकाश में पंजाब सरकार के कदम को गलत ठहरा दिया था। ईवी चिनैया मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि इस तरह का उप-वर्गीकरण अवैध है। अब अगर स्वयं सर्वोच्च न्यायालय को कुछ अनुचित लग रहा है कि वह अपने फैसले की समीक्षा कर सकता है, तो देश को इस पर अंतिम फैसले का इंतजार करना चाहिए।
यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुनर्विचार आरक्षण सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा और इसकी जरूरत कम से कम दो दशक से महसूस की जा रही थी। अनेक मामलों में तो यह लगने लगा है कि अनुसूचित जाति या जनजाति के अंदर ही अनेक उपवर्ग, अर्थात जातियां-उपजातियां हैं, जो आरक्षण की दौड़ में पिछड़ने लगी हैं।
 पंजाब सरकार वाल्मीकि और मजहबी सिख को आरक्षण में पहली प्राथमिकता देना चाहती थी, पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के कारण अपने प्रयास में नाकाम रही। सर्वोच्च न्यायालय में एक न्यायमूर्ति ने पिछले दिनों यह भी संकेत किया कि एक बार जब सरकार को आरक्षण देने की ताकत मिली हुई है, तब वह वंचितों को लाभ पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण भी कर सकती है। पांच सदस्यीय पीठ ने मान लिया कि ई वी चिनैया मामले में उचित फैसला नहीं हुआ था। पीठ ने यह भी कहा कि राज्य विधानसभाएं अनुसूचित जाति श्रेणियों के भीतर उप-जातियों को विशेष उपचार देने के लिए कानून बना सकती हैं।
         हमारे देश भारत में विभिन्न अध्ययनों में यह बात सामने आती रही है कि ऐसी अनेक जातियां-उपजातियां हैं, जिन तक आरक्षण का लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। कुछ जातियां आरक्षण का लाभ लेने में आगे हैं और अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में पहुंच गई हैं, जबकि पिछडे़ समाज में एक बड़ा तबका है, जो प्राथमिक शिक्षा से भी वंचित है। इन वंचित जातियों को आगे लाने के लिए अनेक राज्य अपने - अपने हिसाब से सक्रिय हैं, इसका दुरूपयोग चुनाव के दौरान राजनीतिक दल करते हैं, ये बात भी किसी से छिपी नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद ऐसे राज्यों को महावंचितों या महादलितों तक पहुंचने में खासी मदद मिलेगी। ऐसा करते हुए उन जातियों को भी आरक्षण का लाभ जारी रहेगा, जो अपेक्षाकृत लाभ में रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय का ताजा रुख देश के समेकित और संतुलित विकास को बल देगा। अगर राजनीतिक संप्रभुओं ने कोई और अवरोध खड़ा नहीं किया |
                                        राकेश दुबे

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