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Wednesday, September 2, 2020

देसी, स्वदेशी और विदेशी



रेवांचल टाइम्स डेस्क - भारत की जनसंख्या और लड़खड़ाती आर्थिकी पर देश के और विदेश के चिंतक चिंता प्रगट कर रहे हैं, पर समाधान कोई सुझा नहीं रहा है | भारत ही नहीं, कोरोना महामारी के कारण दुनिया भर में एक जैसी स्थितियां पैदा हो गयी हैं, इससे अधिकतर देश बाहर से अधिक अपने देश के अंदर की तरफ झांकने को मजबूर  हैं| ऐसे में हम भारतीय क्या करें? हमारे पास एक ही विकल्प है आयात कम और आत्मनिर्भरता अधिक | ऐसी स्थिति में सबसे ज्यादा याद आता है, 20 बरस पहले सुना एक फार्मूला – आदत से देसी, आवश्यकता से स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी | 20 बरस पहले अपने पहले अध्ययन अवकाश से लौटे के एन गोविन्दाचार्य ने यह फार्मूला सुझाया था | आज यह फार्मूला आर्थिकी सुधार का विकल्प है, सरकार के साथ हम सब भी देश हित में इसके मर्म को स्वीकार करें |

         हर बाजार के नजरिये भारत की अधिक जनसंख्या एक सकारात्मक पहलू है| देश के भीतर ही बड़ी संख्या में उपभोक्ता उपलब्ध हैं और हम उत्पादन और वितरण की श्रंखला को सही गति प्रदान कर
अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं| यह आत्मनिर्भर देश बनाने की एक अच्छी कोशिश हो सकती है| इसके लिए एक निश्चित समय सीमा में दूरदर्शी सोच के साथ सबसे पहले विनिर्माण के स्तर को बढ़ाना होगा|
         यह सही है कि अभी बहुत से लोगों के पास आय नहीं है क्योंकि उनके पास रोजगार नहीं है| सरकार के पास भी इतने संसाधन नहीं हैं कि वह सभी को सालाना लाखों का पैकेज देकर रोजगार उपलब्ध करा सके| इसलिए वर्तमान में छोटे पैमाने पर रोजगार पैदा करना होगा| अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में छोटे व मझोले उद्यमों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है| वैसे  यह क्षेत्र भी सभी लोगों को गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध नहीं करा सकता, लेकिन यह बेरोजगारी को कुछ हद तक कम कर सकता है |
          इस दिशा में सरकार की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है यह देखना है वह लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कैसी योजनाएं लाती है| बड़े-बड़े उद्योगपतियों पर सरकार का नियंत्रण बहुत कम है, इसलिए उनसे रोजगार सृजन की उम्मीद सरकार  नहीं कर सकती| उनका योगदान सिर्फ चंदे तक होता है | लघु एवं मध्यम उद्योगों का योगदान इस समस्या के निदान में होगा उनकी ओर ही ध्यान देना श्रेयस्कर है |कोरोना काल में बहुत से छोटे उद्योग बंद हो गये हैं. सरकार को इन्हें फिर से जीवंत करने के लिए उन तक पैसा और सुविधा पहुँचाने की बात सोचना होगी |
यदि हम आयात कम करना चाहते हैं, तो हमें ऐसे क्षेत्रों को चुनना होगा, जिनमें हम अधिक आयात कर रहे हैं, जैसे कि मशीनरी| हमें इनके उत्पादन के लिए बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगानी होंगी जिससे आयात पर निर्भरता कम हो सके|हमें इस क्षेत्र में आने वाले विदेशी उद्ध्योगों का उसका स्वागत करना चाहिए, क्योंकि इससे भी कुछ हद तक रोजगार बढ़ेगा| यहाँ प्रश्न यह है कि विदेशी कंपनियां भारत में फैक्ट्री क्यों लगाना चाहेंगी? इसका अधिकतर उत्तर यही दिया जाता है कि भारत में श्रम लागत बहुत कम है|आनेवाले पांच-दस सालों में श्रम लागत एक प्रमुख कारक नहीं रह जायेगा| इसका सबसे बड़ा कारण है ‘ऑटोमेशन’. श्रम के क्षेत्र में ‘ऑटोमेशन’ बढ़ जाने के बाद 100 लोगों का काम 5-10 लोग ही कर लेंगे| सस्ते श्रम के क्षेत्र में बांग्लादेश, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देश भी सस्ता श्रम उपलब्ध करा रहे हैं| इसलिए सस्ता श्रम भारत में विदेशी कंपनियों को बुलाने के लिए काफी नहीं होगा|
       सबसे पहले अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना होगा| जब तक हम विदेशी कंपनियों के अनुकूल देश में इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं करेंगे, तब तक हम बहुत अधिक निवेश की उम्मीद नहीं कर सकते हैं|अभी इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के दो फायदे हैं- पहला, आप विदेशी कंपनियों को एक ढांचा तैयार कर दे रहे हैं और दूसरा, कंपनियां आने से देश में रोजगार बढ़ेगा और लोगों के पास पैसा पहुंचेगा| पैसे  आवक के साथ हमें अपनी जीवन पद्धति को भी नये तरीके से विकसित करनी होगी और उसका फार्मूला है - आदत से देसी, आवश्यकता से स्वदेशी और मजबूरी में विदेशी |
                                          राकेश दुबे
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