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Saturday, August 29, 2020

अब गंगा के किनारे गोविन्द जी का अलख



रेवांचल टाइम्स - गोविन्द जी, हाँ अपने गोविन्द जी, कौडीपक्क्म नीलमेघचार्य गोविन्दाचार्य अविरल गंगा निर्मल गंगा के मार्ग में आ रहे अवरोधों के अध्ययन के लिए एक माह गंगा जी किनारे पर बिताने जा रहे हैं |उनका यह अध्ययन बरसों से चल रहे अविरल गंगा निर्मल गंगा आन्दोलन में मील का पत्थर साबित होगा और उन हुत्तामाओं को शांति देगा जो गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर चुके हैं | इनमे स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद, स्वामी निगमानंद, जैसी विभूतियाँ हैं जिन्होंने ने गंगा से जुड़ी मांगों को लेकर अनशन किया  और प्राण न्यौछावर कर दिए | स्वामी आत्मबोधानंद ने भी 194 दिन की तपस्या की। केंद्र सरकार में मंत्री रही साध्वी उमा भारती के पास तो गंगा विभाग ही रहा पर गंगा की समस्याएं आज भी ज्यों की त्यों हैं | अब गोविन्द जी नए सिरे से अलख जगा रहे हैं 1 सितम्बर से 2 अक्तूबर तक |ऋषिकेश से गंगा सागर तक |
             वैसे गंगा जी पर कुल 6 बांध और 4  बैराज बने हैं। अपर गंगा बेसिन (टिहरी गढ़वाल से हरिद्वार के बीच) ये सभी 6 बांध हैं। सरकारी अधिसूचना में जल प्रवाह से संबंधित तीन नियम हैं। पहला, जून से सितंबर के बीच (उच्च प्रवाह का मौसम) अंतर्वाह (इनफ्लो) के औसत का 30 प्रतिशत बहिर्वाह (आउटफ्लो) होना चाहिए। दूसरा, अक्टूबर, अप्रैल और मई में 25 प्रतिशत बहिर्वाह व तीसरा, नवंबर से मार्च के बीच (निम्न प्रवाह का समय) 20 प्रतिशत बहिर्वाह होना चाहिए। मध्य गंगा बेसिन (हरिद्वार से कानपुर) में जहां सभी बैराज हैं, वहां हर परियोजना के लिए पर्यावरणीय प्रवाह अलग है। पौड़ी गढ़वाल में श्रीनगर बांध की संचालक और 330 मेगावाट बिजली उत्पन्न करने वाली अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी लिमिटेड (एएचपीसीएल) नियमों का विरोध करने में सबसे आगे है। यह कंपनी 88 प्रतिशत बिजली की आपूर्ति उत्तर प्रदेश और 12  प्रतिशत बिजली रॉयल्टी के रूप में उत्तराखंड को निशुल्क प्रदान करती है। चमोली जिले में स्थित विष्णुप्रयाग बांध का संचालन जयप्रकाश पावर वेंचर्स लिमिटेड द्वारा किया जाता है। इस कंपनी ने भी केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की अधिसूचना के प्रति अनिच्छा प्रकट की है।
एएचपीसीएल ने जुलाई 2019 को राज्य सरकार और केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के खिलाफ उत्तराखंड के उच्च न्यायालय में वाद दायर कर कहा कि अधिसूचना का पालन करने पर 26 सालों में उसे 3036 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान होगा। उत्तराखंड सरकार से हुए समझौते के तहत कंपनी के पास बांध का संचालन 26 साल तक रहेगा। कंपनी ने यह भी कहा कि वह उत्तराखंड उच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्देशों के मानकर प्रतिदिन 15 प्रतिशत का बहिर्वाह सुनिश्चित कर रही है। सीडब्ल्यूसी ने जनवरी से प्रतिदिन बांधों और बैराजों से डिस्चार्ज होने वाले पानी का आंकड़ा जुटाया है। उसकी तीन तिमाही रिपोर्ट में जारी आंकड़े एएचपीसीएल के दावे को खारिज करते हैं।
          दूसरी तिमाही (अप्रैल से जून) की रिपोर्ट के अनुसार,15 मई से 21 मई के बीच बांध से बहिर्वाह मुश्किल से 5 प्रतिशत था। एनएमसीजी द्वारा न्यायालय में दाखिल  प्रति शपथ पात्र में भी इसका उल्लेख है। आंकड़े बताते हैं कि एकमात्र टिहरी बांध ने ही अधिसूचना का पालन किया है|
गंगा जी भारत के कुछ राज्यों के लिए बिजली और पानी की प्रदायक हो सकती है | सरकार की दृष्टि इससे ज्यादा न तो पहले थी और न अब है | इसके विपरीत कश्मीर से केरल तक के भारतीय नागरिक इसे मोक्षदायिनी मान “माँ” का दर्जा देते हैं | भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे जीवंत माना है |दुर्भाग्य है, केदारनाथ और बदरीनाथ का प्रसाद लेकर आने वाला गंगाजल अब वाराणसी तक भी नहीं  पहुंच रहा है। जो पानी पहुंचता है, वह मुख्यत: काली और रामगंगा का है। पानी कम होने से गंगा की प्रदूषण को वहन करने की क्षमता भी क्षीण हो गयी है। गंगा और यमुना के कमांड एरिया में मेंथा, धान और गन्ने जैसी फसलों का उत्पादन हो रहा है, जिन्हें पानी की भारी जरूरत होती है। इस सम्पूर्ण क्षेत्र में जल सघन फसलों के उत्पादन पर रोक लगानी होगी। तब ही वाराणसी और उसके आगे गंगा का सतत प्रवाह बनाये रखना संभव हो सकेगा। इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी के समूह द्वारा गंगा के प्रबन्धन पर जो प्लान बनाया गया उसकी एक प्रमुख संस्तुति है कि उद्योगों द्वारा गंदे पानी को बाहर फेंका ही न जाये। गंदे पानी को बारम्बार साफ करके पुन: उपयोग में लाया जाये, जब तक वह समाप्त न हो जाये। इसकी प्रमुख समस्या है कि पानी को साफ करने में आने वाली लागत जिससे बाजार में बिकने वाला माल यथा कागज और चीनी महंगे हो जायेंगे। ऐसे में हमें यह तय करना होगा कि हमारे लिये सस्ता कागज और सस्ती चीनी महत्वपूर्ण है या गंगाजी का स्वच्छ जल। यह तभी होगा जब गंगा जी अविरल हों निर्मल हों |
                                               राकेश दुबे

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