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Sunday, May 3, 2020

उत्तराखंडः लॉक डाउन ने सुधार दी पर्यावरण की सेहत

देहरादून । सामान्य तौर पर देश के अन्य हिस्सों के मुकाबले उत्तराखंड की आबोहवा हमेशा बेहतर रहती है लेकिन कुछ धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर श्रद्धालुओं और सैलानियों का दबाव होने के कारण प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। फिलहाल लॉक डाउन की वजह से उत्तराखंड में इन स्थानों पर भी आजकल प्रदूषण खत्म हो गया है और नदी, झरने, पहाड़ और जंगल प्रदूषण की जद से बाहर निकल गए हैं।
इसके पीछे वैज्ञानिक अवधारण यह है कि जिन सड़कों पर दिन रात अंधाधुंध बेलगाम वाहन दौड़ा करते थे, लॉक डाउन की वजह वह आजकल सूनी पड़ी हैं। इससे ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण दोनों में कमी आई है। चूंकि इन दिनों उत्तराखंड में विदेशी और घरेलू यानी सभी तरह के पर्यटकों की आवाजाही पर भी रोक लगी है तो हरिद्वार, ऋषिकेश, नैनीताल आदि जिन शहरों पर पर्यटकों का दबाव रहता था, वहां भी सिर्फ स्थानीय आबादी ही बची है। कल कारखाने भी बंद हैं। इसलिए नदियों और झीलों में जाने वाला कचरा भी नहीं हो रहा है। नतीजतन इसका पर्यावरण पर बहुत अच्छा असर हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिस मानव ने प्रकृति को पहले कैद कर रखा था, वह अब घरों में कैद है और प्रकृति अपने मूल स्वरूप में अट्टहास कर रही है।
उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुख्य पर्यावरण अधिकारी एसएस पाल बताते हैं कि लॉक डाउन के दौरान गंगा में होने वाले प्रदूषण का अध्ययन कराया गया। जो रिपोर्ट आई वह वाकई चौंकाने वाली है। सामान्य तौर पर देवप्रयाग से लक्ष्मण झूला (ऋषिकेश) तक गंगा का पानी पहले भी ए श्रेणी का होता था और आज भी है लेकिन वहां से गंगा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वह उतना ही अधिक प्रदूषित होती जाती है। ऋषिकेश से हरिद्वार में हर की पैड़ी तक पहले गंगा का पानी बी श्रेणी का होता था, जो सिर्फ नहाने लायक होता था। यह अब ए श्रेणी में आ गया है। यानी अब आप हर की पैड़ी पर गंगा नदी के पानी को पी सकते हैं। अगर इसको क्लोरीनेशन करने के बाद पियें तो बेहतर रहेगा। हर की पैड़ी पर गंगा के पानी में बॉयोलिजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) में 17 से 21 फीसद कमी आई है। फिक्वल क्वालीफार्म (एफसी) में 25 से 35 फीसद की कमी आई है, जिसका मुख्य स्रोत नदी में गिरने वाला सीवरेज का पानी होता है। इसके पीछे वह यहां होने वाली पर्यटकों की भीड़ पर रोक और मंदिरों तथा धर्मशालाओं के बंद होने से कमर्शियल गतिविधियों के रुकने को इसका कारक मानते हैं। हरिद्वार से आगे उत्तर प्रदेश सीमा पर स्थित ब्रहम कुमारी मंदिर के बीच गंगा जल की क्वालिटी पहले भी बी श्रेणी की थी और अब भी उसी तरह है। यानी सिर्फ नहाने लायक ही है।
एसएस पाल कहते हैं कि बदरीनाथ से हरिद्वार तक सभी शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगे हैं, जो घरों से निकलने वाले सीवर के पानी को शोधित करते हैं लेकिन कुछ होटल, धर्मशालाओं के मामले में ऐसा नहीं है। इसलिए अब कमर्शियल गतिविधियां बंद होने से गंगा जल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। बीओडी 3.0 मिलीग्राम प्रति लीटर का मानक है जो इन दिनों इससे कम ही है। हरिद्वार से नीचे भी बीओडी तो निर्धारित मानक की जद में है लेकिन एफसी के मामले में यह मानक से ज्यादा 80 एमपीएन प्रति 100 एमएल है जबकि यह 50 एमपीएन प्रति 100 एमएल ही होना चाहिए। घुलनशील ऑक्सीजन (डीओ) 9 से 12 एमजी प्रति लीटर मिला है। स्टैंडर्ड मानक के अनुसार यह 6 एमजी से ऊपर होना चाहिए। यह जलीय जीवों के लिए बहुत ही अच्छा है।
वायु प्रदूषण की बात करें तो देहरादून में वायु प्रदूषण 35 से 55 फीसद धूल के कणों (पीएम 10) में कमी आई है। एसएस पाल के अनुसार सामान्य दिनों में यह 150 तक रहता है और कभी-कभी तो 200 तक पहुंच जाता है। अभी कहीं 75 और कहीं 80 तक आया है। इससे अब आसमान बिलकुल साफ और नीला दिखाई देता है, जिसे आप नंगी आंखों से देख सकते हैं। हरिद्वार में भी वायु गुणवत्ता की बात करें तो मार्च की अपेक्षा अप्रैल में हवा में पीएम10 की तादाद 50 फ़ीसदी से ज्यादा घटी है। तीर्थनगरी ऋषिकेश की हवा पूर्ण तरीके से शुद्ध हो गई है और वायु प्रदूषण का स्तर भी सामान्य से काफी नीचे पहुंच गया है। उत्तराखंड प्रदूषण बोर्ड के मानकों के अनुसार हवा की शुद्धता के लिए हवा में पीएम-10 पर्टिकुलर मैटर( धूल के कण) 100 माइक्रोन ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होना चाहिए। आम दिनों में यहां यह आंकड़ा 150 से 200 तक पहुंचता था जो अब घटकर करीब 50 हो गया है। निर्मल हॉस्पिटल के फिजिशियन डॉक्टर अमित अग्रवाल बताते हैं कि जो धुआं वाहनों और कारखानों से निकलता है वह कार्बन डाइऑक्साइड वाला धुआं होता है जो सांस की बीमारी पैदा करता है और एलर्जी, अस्थमा, सांस लेने में दिक्कत को बढ़ावा देता है। अगर इस समय वायु प्रदूषण कम है तो अस्थमा के रोगियों को घर में बहुत आराम मिल रहा होगा। शुद्ध हवा सबके लिए बहुत जरूरी है।

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