पृथक ‘ईस्ट मध्यप्रदेश’ की बहस में मंडला की हिस्सेदारी पर सवाल, नगर निगम बनाने की मांग भी उठी
महाकौशल-विंध्य-बुंदेलखंड को लेकर अलग राज्य की चर्चा के बीच मंडला के विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा
दैनिक रेवाँचल टाईम्स - मंडला। मध्यप्रदेश में महाकौशल, विंध्य और बुंदेलखंड के विकास और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर पृथक राज्य की बहस एक बार फिर राजनीतिक चर्चा में है। जुलाई 2026 में राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा द्वारा इन क्षेत्रों को मिलाकर अलग “ईस्ट मध्यप्रदेश” की वकालत किए जाने के बाद अब सवाल यह भी उठ रहा है कि इस पूरी बहस में आदिवासी बहुल मंडला जिले की भूमिका, विकास जरूरतों और भविष्य की प्रशासनिक व्यवस्था को कितना स्थान मिलेगा।
पृथक राज्य की मांग का समर्थन करने वाले लोगों का तर्क है कि पूर्वी मध्यप्रदेश के विकास, रोजगार, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर व्यापक सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर किसी नए राज्य के आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभावों का आकलन भी आवश्यक होगा।
मंडला वर्तमान में जबलपुर संभाग का हिस्सा है। जिला नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र, कान्हा टाइगर रिजर्व, वन उपज, आदिवासी संस्कृति और पर्यटन संभावनाओं के कारण अपनी अलग पहचान रखता है। ऐसे में पृथक राज्य को लेकर चल रही किसी भी क्षेत्रीय चर्चा में मंडला के विकास मॉडल और स्थानीय आवश्यकताओं को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
जुलाई 2026 में राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने महाकौशल, विंध्य और बुंदेलखंड को मिलाकर अलग “ईस्ट मध्यप्रदेश” की अवधारणा की वकालत की थी। उन्होंने क्षेत्रीय विकास और कथित उपेक्षा का मुद्दा उठाते हुए इस विषय पर जनता के बीच संवाद और आंदोलन की आवश्यकता की बात कही थी।
इसके बाद से पृथक राज्य के पक्ष और विपक्ष में राजनीतिक तथा सामाजिक स्तर पर चर्चा सामने आ रही है। हालांकि अभी यह एक राजनीतिक-सार्वजनिक मांग और विचार के स्तर का विषय है; नए राज्य के गठन का कोई अंतिम संवैधानिक निर्णय नहीं हुआ है।
पृथक राज्य के समर्थक लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि पूर्वी मध्यप्रदेश के जिलों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप पर्याप्त प्रशासनिक और विकास प्राथमिकता नहीं मिलती। महाकौशल और आसपास के क्षेत्रों में रोजगार, उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर वे क्षेत्रीय असंतुलन का सवाल उठाते हैं।
हालांकि क्षेत्रीय असंतुलन की वास्तविक स्थिति का आकलन बजट आवंटन, प्रति व्यक्ति व्यय, परियोजनाओं, रोजगार, स्वास्थ्य-शिक्षा संकेतकों और अन्य आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल राजनीतिक दावों के आधार पर किसी क्षेत्र के साथ भेदभाव को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
पृथक राज्य की बहस के साथ अब मंडला नगर पालिका को नगर निगम में उन्नत करने की मांग भी सामने रखी जा रही है। वर्तमान में मंडला नगर निगम नहीं, बल्कि नगर पालिका परिषद है।
मांग के समर्थकों का सुझाव है कि भविष्य की जनसंख्या, शहरी विस्तार, पर्यटन, नर्मदा तट के धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व और आसपास विकसित हो रहे क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए मंडला के नगरीय ढांचे की दीर्घकालीन समीक्षा की जानी चाहिए।
नगर निगम की मांग से जुड़े लोगों का सुझाव है कि महाराजपुर सहित मंडला शहर से सटे क्षेत्रों और प्रमुख मार्गों के आसपास विकसित हो रही ग्राम पंचायतों की भौगोलिक, जनसंख्या और शहरीकरण की स्थिति का सर्वे कराया जाए।
यदि भविष्य में नगरीय सीमा विस्तार का प्रस्ताव बनता है तो संबंधित पंचायतों, आबादी, राजस्व क्षेत्र, बुनियादी सेवाओं और राज्य सरकार द्वारा निर्धारित वैधानिक मानकों के आधार पर उसका परीक्षण किया जाना होगा।
नगर निगम का दर्जा मिलने की स्थिति में नगरीय प्रशासन का स्वरूप और जिम्मेदारियां बदल सकती हैं तथा बड़े शहरी क्षेत्र के लिए सीवरेज, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, सड़क, पेयजल, यातायात, स्ट्रीट लाइट और शहरी नियोजन जैसी सेवाओं की व्यापक योजना बनाने का आधार तैयार हो सकता है।
हालांकि केवल नगर निगम का दर्जा मिल जाने से किसी निश्चित राशि का अतिरिक्त बजट स्वतः मिलना तय नहीं होता। वित्तीय सहायता संबंधित योजनाओं, राज्य एवं केंद्र सरकार की नीतियों, वित्त आयोग और परियोजना स्वीकृतियों पर निर्भर करेगी।
पृथक राज्य की मांग से जुड़े समर्थक अब महाकौशल, विंध्य और बुंदेलखंड के सांसदों, विधायकों तथा अन्य जनप्रतिनिधियों से इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने और क्षेत्रीय विकास के सवालों पर साझा संवाद की अपील कर रहे हैं।
उनका कहना है कि राजनीतिक दलों के बीच मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन रोजगार, उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और बुनियादी ढांचे जैसे विषयों पर क्षेत्र की दीर्घकालीन जरूरतों को लेकर व्यापक चर्चा होनी चाहिए।
पूर्वी मध्यप्रदेश से जुड़े विमर्श में जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभागों का उल्लेख होता रहा है। हाल के वर्षों में राज्य सरकार ने भी कुछ प्रशासनिक और संस्थागत व्यवस्थाओं में इन चार संभागों को एक साथ क्षेत्राधिकार में रखा है।
लेकिन पृथक राज्य के लिए इन चार संभागों की सीमाओं को ही अंतिम सीमा मानने वाला कोई अंतिम राज्य-पुनर्गठन निर्णय अभी नहीं है। इसलिए संभावित नए राज्य की विधानसभा और लोकसभा सीटों की निश्चित संख्या बताना इस स्तर पर उचित नहीं होगा।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को नए राज्य के गठन तथा मौजूदा राज्यों की सीमा, क्षेत्र या नाम में परिवर्तन के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है। ऐसे विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है।
यदि प्रस्ताव किसी मौजूदा राज्य की सीमा या क्षेत्र को प्रभावित करता है तो राष्ट्रपति उस प्रस्ताव को संबंधित राज्य की विधानसभा के पास उसके विचार जानने के लिए भेजते हैं। इसके बाद अंतिम कानून बनाने का अधिकार संसद के पास रहता है।
पृथक राज्य का प्रस्ताव आगे बढ़ता है या नहीं, यह संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया से तय होगा। लेकिन इस बहस ने मंडला के सामने विकास से जुड़े कई सवाल जरूर रख दिए हैं— जिले में रोजगार और उद्योग कैसे बढ़ें, पर्यटन क्षमता का बेहतर उपयोग कैसे हो, शहरी ढांचा भविष्य की जरूरतों के अनुरूप कैसे विकसित हो और क्षेत्रीय योजनाओं में आदिवासी बहुल मंडला की आवश्यकताओं को कितना महत्व मिले।
पृथक राज्य के समर्थकों के अपने तर्क हैं, जबकि ऐसे किसी पुनर्गठन के आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभावों पर अलग दृष्टिकोण भी हो सकते हैं। इसी तरह मंडला को नगर निगम बनाने के प्रस्ताव के लिए भी जनसंख्या, शहरी क्षेत्र, राजस्व क्षमता, आसपास की पंचायतों और भविष्य की बुनियादी जरूरतों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होगा।
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