नदियां बचेंगी तो बचेगा जीवन : नदी संरक्षण की चुनौती
प्रदूषण, रेत खनन, बांध और अनियोजित विकास के बीच नदियों के प्राकृतिक अस्तित्व को बचाने की बड़ी चुनौती
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ
पृथ्वी पर नदियां जीवनदायिनी हैं। अन्न और जल देने वाली नदियों को भारतीय समाज ने सदियों से मां का दर्जा देकर सम्मान दिया है। मानव सभ्यता के विकास की कहानी भी नदियों से अलग नहीं की जा सकती। दुनिया की अनेक प्राचीन सभ्यताएं नदी घाटियों के आसपास ही विकसित हुईं।
लेकिन आज वही नदियां प्रदूषण, अतिक्रमण, अनियोजित शहरीकरण, अत्यधिक दोहन, रेत खनन और प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। विकास की जरूरतों और नदी की पारिस्थितिकीय क्षमता के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकताओं में शामिल है।
नदी संरक्षण की चर्चा अक्सर बड़ी नदियों तक सीमित हो जाती है, जबकि उन्हें जल देने वाली छोटी नदियां, सहायक धाराएं और जलग्रहण क्षेत्र भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। छोटी नदी का प्राकृतिक प्रवाह खत्म होने का प्रभाव अंततः उस बड़ी नदी पर भी पड़ता है, जिसमें वह जाकर मिलती है।
इसलिए नदी संरक्षण की नीति में छोटी नदियों, स्थानीय जलधाराओं, तालाबों, आर्द्रभूमियों और उनके जलग्रहण क्षेत्रों को समान महत्व देना होगा। केवल मुख्य नदी की सफाई कर देने से पूरे नदी तंत्र को स्वस्थ नहीं किया जा सकता।
शहरी सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और दूसरे प्रदूषक जब नदियों में पहुंचते हैं तो समस्या केवल नदी के पानी तक सीमित नहीं रहती। जहां प्रदूषित जल का उपयोग सिंचाई में होता है, वहां इसके कृषि और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को भी समझना जरूरी है।
इसलिए नदी प्रदूषण को केवल शहर की सफाई या सीवेज प्रबंधन का विषय मानने के बजाय जल, मिट्टी, कृषि, स्वास्थ्य और जैव विविधता से जुड़ी व्यापक पर्यावरणीय चुनौती के रूप में देखना होगा।
अनियंत्रित रेत खनन नदी तल, जलीय आवास और नदी की प्राकृतिक संरचना को प्रभावित कर सकता है। नदी तल में अत्यधिक हस्तक्षेप से प्रवाह और अवसादन की प्राकृतिक प्रक्रिया बदल सकती है तथा जलीय जैव विविधता पर दबाव बढ़ सकता है।
अवैध रेत खनन पर प्रभावी निगरानी, पर्यावरणीय नियमों का कठोर पालन और निर्माण क्षेत्र में उपयुक्त वैकल्पिक सामग्री के उपयोग को प्रोत्साहन नदी संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
बांधों ने सिंचाई, पेयजल, बिजली उत्पादन और जल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दूसरी ओर बांध और अन्य नदी अवरोध प्राकृतिक प्रवाह, मछलियों की आवाजाही, तलछट परिवहन और नदी पर निर्भर समुदायों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए किसी नदी घाटी में अलग-अलग परियोजनाओं को केवल स्वतंत्र इकाई के रूप में देखने के बजाय पूरे नदी तंत्र पर उनके संचयी प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन महत्वपूर्ण है।
यूरोप में पुराने, अनुपयोगी अथवा पारिस्थितिकीय बाधा बन चुके नदी अवरोधों को हटाकर प्राकृतिक प्रवाह बहाल करने की पहल तेज हुई है। वर्ष 2024 में 23 यूरोपीय देशों में 542 नदी अवरोध हटाए गए।
अमरकंटक से निकलकर खंभात की खाड़ी तक पहुंचने वाली नर्मदा मध्य भारत की महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों में से एक है। इसके जल पर कृषि, पेयजल, जैव विविधता, मत्स्य संसाधन और बड़ी आबादी की आजीविका निर्भर है।
नर्मदा घाटी में बनी और प्रस्तावित जल परियोजनाओं के संदर्भ में प्रत्येक परियोजना को अलग-अलग देखने के साथ पूरे नदी घाटी पर पड़ने वाले संचयी प्रभाव (Cumulative Impact) का अध्ययन भी किया जाना चाहिए। नदी की वहन क्षमता, प्राकृतिक प्रवाह और जैव विविधता को विकास संबंधी निर्णयों में पर्याप्त महत्व मिलना जरूरी है।
मछलियां जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। नदी के प्राकृतिक प्रवाह, पानी की गुणवत्ता, प्रजनन स्थलों और जलीय आवास में बदलाव का प्रभाव मछलियों की विभिन्न प्रजातियों पर पड़ सकता है।
नर्मदा की प्रसिद्ध महाशीर सहित दूसरी स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्राकृतिक प्रवाह, प्रजनन क्षेत्र और नदी की जैव विविधता को संरक्षण नीति का हिस्सा बनाना जरूरी है।
● छोटी सहायक नदियों और जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण।
● सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण को नदी में पहुंचने से रोकना।
● अवैध एवं अनियंत्रित रेत खनन पर प्रभावी नियंत्रण।
● नदी के प्राकृतिक और पर्यावरणीय प्रवाह को महत्व देना।
● नदी घाटी स्तर पर परियोजनाओं के संचयी प्रभावों का अध्ययन।
● मछुआरों, किसानों, आदिवासी समाज और स्थानीय समुदायों की भागीदारी।
● नदी प्रबंधन में पर्यावरण, जैव विविधता और जलवायु विशेषज्ञों को शामिल करना।
नदियां केवल पानी का स्रोत नहीं हैं। वे सभ्यता, संस्कृति, कृषि, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार हैं। इसलिए नदी संरक्षण को केवल सफाई अभियानों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
नदी की वास्तविक सेहत उसके अविरल प्रवाह, निर्मल जल, प्राकृतिक जलधाराओं, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और उससे जुड़े समुदायों के जीवन से तय होती है।
जल बचेगा तभी जीवन और सभ्यता बचेगी।”
विश्व नदी दिवस हमें इसी बुनियादी सवाल की ओर लौटने का अवसर देता है। सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि हम नदियों से कितना ले सकते हैं, बल्कि यह भी तय करना होगा कि नदियों को जीवित और स्वस्थ रखने के लिए हम उन्हें कितना वापस दे सकते हैं।
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ
विश्व नदी दिवस विशेष | नदी संरक्षण एवं पर्यावरण
