राजस्थान निकाय चुनाव: BJP वार्डों में आगे, कांग्रेस भी करीब; निर्दलीयों ने बिगाड़ा दोनों दलों का गणित
जयपुर। राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी वार्डों की संख्या में कांग्रेस से आगे रही है, लेकिन नतीजों की तस्वीर केवल भाजपा और कांग्रेस के मुकाबले तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत और दोनों प्रमुख दलों के वोट शेयर में बेहद कम अंतर ने कई शहरों में स्थानीय सत्ता का गणित दिलचस्प बना दिया है।
वोट शेयर में मुकाबला बेहद करीबी
भाजपा सबसे आगे, लेकिन तस्वीर एकतरफा नहीं
वार्डों की संख्या के लिहाज से भाजपा राजस्थान में सबसे आगे रही। पार्टी ने 4,179 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस को 3,613 वार्डों में सफलता मिली। दोनों के बीच 566 वार्ड का अंतर रहा।
भाजपा ने जयपुर, उदयपुर, कोटा और भीलवाड़ा जैसे नगर निगमों में बहुमत का आंकड़ा पार किया। दूसरी ओर कई बड़े शहरी निकायों में मुकाबला करीबी या खंडित रहा, जिससे परिणामों की राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जा रही है।
भाजपा ने नतीजों को बताया जनसमर्थन
भाजपा नेतृत्व ने निकाय चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन को सरकार की नीतियों और विकास कार्यों के प्रति समर्थन के रूप में पेश किया है। प्रदेश भाजपा नेतृत्व ने भी पिछले चुनावों की तुलना में पार्टी के प्रदर्शन में सुधार का दावा किया है।
कांग्रेस पीछे, मगर वोट शेयर में फासला बहुत कम
कांग्रेस वार्ड संख्या में भाजपा से पीछे रही, लेकिन वोट शेयर में दोनों के बीच अंतर एक प्रतिशत अंक से भी कम रहा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भाजपा को 35.19 प्रतिशत और कांग्रेस को 34.25 प्रतिशत वोट मिले।
कांग्रेस नेतृत्व इन आंकड़ों को अपने पक्ष में राजनीतिक संदेश के रूप में पेश कर रहा है। विपक्ष का तर्क है कि परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण शहरी क्षेत्रों में इतना करीबी वोट शेयर सरकार के लिए विचार का विषय है। यह हालांकि कांग्रेस की राज्यव्यापी वापसी या भविष्य के विधानसभा नतीजों का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता।
बड़े शहरों ने दिखाई अलग-अलग तस्वीर
जोधपुर नगर निगम में भाजपा और कांग्रेस ने 44-44 वार्ड जीते। ऐसे निकायों में निर्दलीय और अन्य दल बोर्ड के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया। अजमेर में भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई, जबकि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
पाली में कांग्रेस भाजपा से आगे रही। वहीं अलवर में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
भरतपुर में निर्दलीयों का बड़ा प्रदर्शन
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह क्षेत्र भरतपुर नगर निगम में निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। यहां 65 वार्डों में से 36 निर्दलीयों ने जीत दर्ज की। भाजपा को 20 और कांग्रेस को सात वार्ड मिले।
इस परिणाम के कारण स्थानीय बोर्ड के गठन में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गई है।
जयपुर में पुनर्मतदान की चारों सीट कांग्रेस ने जीतीं
जयपुर नगर निगम के चार वार्डों में पुनर्मतदान के बाद कांग्रेस ने चारों सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद 150 सदस्यीय नगर निगम में भाजपा के 78, कांग्रेस के 57 और निर्दलीयों के 15 पार्षद हो गए।
भाजपा हालांकि जयपुर नगर निगम में बहुमत के आंकड़े से ऊपर बनी हुई है।
2,273 निर्दलीय—नतीजों की तीसरी बड़ी कहानी
इन चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के अलावा निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण रहा। कुल 2,273 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं।
जहां किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, वहां बोर्ड, सभापति और महापौर के चुनाव में निर्दलीय पार्षदों का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है।
छोटे दलों ने भी दर्ज कराई मौजूदगी
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को 63, आम आदमी पार्टी को 42 और सीपीआई(एम) को 38 वार्डों में सफलता मिली।
बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी ने 60 में से 31 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल किया। नोखा नगरपालिका में सीपीआई(एम) ने 45 में से 29 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया।
2028 के लिए क्या मायने?
निकाय चुनाव के आंकड़े दोनों प्रमुख दलों को अलग-अलग संदेश देते हैं। भाजपा वार्ड संख्या में सबसे आगे है, जबकि कांग्रेस का वोट शेयर भाजपा के बेहद करीब रहा। वहीं बड़ी संख्या में निर्दलीयों की जीत बताती है कि कई स्थानों पर स्थानीय उम्मीदवार और स्थानीय मुद्दे भी परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण रहे।
इन नतीजों को 2028 विधानसभा चुनाव का सीधा पूर्वानुमान मानना जल्दबाजी होगी। विधानसभा चुनाव का मतदाता आधार, मुद्दे, उम्मीदवार और राजनीतिक परिस्थितियां स्थानीय निकाय चुनाव से अलग हो सकती हैं।
नतीजों का सीधा संदेश
भाजपा वार्ड संख्या में आगे है, कांग्रेस वोट शेयर में करीब है और निर्दलीयों ने कई निकायों में सत्ता गठन का गणित खुला रखा है। यही तीन तथ्य राजस्थान के इस शहरी जनादेश की प्रमुख तस्वीर पेश करते हैं। आगे बोर्ड और महापौर के गठन की प्रक्रिया से स्थानीय सत्ता की अंतिम तस्वीर और स्पष्ट होगी।
