संलग्नीकरण का खेल कब खत्म होगा, साहब? कलेक्टर के आदेश के बाद अब अमल पर उठे सवाल
पूर्व सहायक आयुक्त वंदना गुप्ता के कार्यकाल में हुए संलग्नीकरण की निष्पक्ष जांच की मांग
दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला। जनजातीय बाहुल्य मंडला जिले में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए शिक्षकों का संलग्नीकरण समाप्त करने संबंधी कलेक्टर के आदेश के बाद अब उसके जमीनी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आदेश में शिक्षकों को उनकी मूल पदस्थापना वाली शालाओं में वापस भेजने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन अब नागरिक यह जानना चाहते हैं कि आदेश के बाद वास्तव में कितने शिक्षक अपने मूल स्कूलों में लौटे और कितने अब भी दूसरी जगह कार्यरत हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार 7 सितंबर 2026 को जारी आदेश क्रमांक 6103 में स्थानांतरण नीति से अलग व्यवस्था के तहत मूल विद्यालय से अन्यत्र कार्य कर रहे शिक्षकों के संलग्नीकरण समाप्त कर उन्हें सात दिवस के भीतर मूल पदस्थापना वाली शाला में उपस्थित होकर आमद देने के निर्देश दिए गए थे।
संबंधित शिक्षकों की उपस्थिति का प्रतिवेदन विकासखंड शिक्षा अधिकारी के माध्यम से जिला कार्यालय तक भेजे जाने की व्यवस्था भी आदेश में बताई गई थी।
आदेश जारी होने और निर्धारित सात दिन की समय-सीमा बीतने के बाद अब इसकी अनुपालन रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो गई है। यदि सभी संबंधित शिक्षक मूल विद्यालयों में वापस पहुंच चुके हैं तो विभाग को इसकी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि कुछ शिक्षक अब भी अन्यत्र कार्यरत हैं तो यह भी बताया जाना चाहिए कि वे किस प्रशासनिक आदेश अथवा किस आवश्यकता के आधार पर वहां कार्य कर रहे हैं।
इस बीच संलग्नीकरण समाप्त करने वाले आदेश को बाद में निरस्त किए जाने की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। यदि आदेश में कोई संशोधन अथवा निरस्तीकरण किया गया है तो उसका आदेश क्रमांक, दिनांक और कारण सार्वजनिक होना चाहिए। वहीं यदि ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ है तो मूल आदेश के अनुपालन की स्थिति सामने आनी चाहिए।
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उन स्कूलों और विद्यार्थियों से जुड़ा है, जहां संबंधित शिक्षकों की मूल पदस्थापना है। किसी शिक्षक के लंबे समय तक दूसरी जगह कार्यरत रहने की स्थिति में मूल विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसलिए विभाग द्वारा विद्यालयवार स्थिति सामने रखने से तस्वीर साफ हो सकती है।
इस पूरे मामले के बीच अब जनजातीय कार्य विभाग की पूर्व सहायक आयुक्त वंदना गुप्ता के कार्यकाल में हुए संलग्नीकरण सहित महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णयों की निष्पक्ष जांच की मांग भी उठाई जा रही है। मांग करने वाले नागरिकों का कहना है कि जांच विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर हो, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किस शिक्षक को कब, कहां और किस प्रशासनिक आवश्यकता के तहत संलग्न किया गया था।
जांच में यह देखा जा सकता है कि संबंधित अवधि में कितने शिक्षकों का संलग्नीकरण हुआ, उनकी मूल पदस्थापना कहां थी, उन्हें कहां भेजा गया, आदेश किस अधिकारी ने जारी किया, संलग्नीकरण का कारण क्या था और यह व्यवस्था कितने समय तक चली। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित शिक्षक के मूल विद्यालय में विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था थी अथवा नहीं।
पूर्व सहायक आयुक्त के कार्यकाल की जांच की मांग अपने आप में किसी अधिकारी की अनियमितता या दोष सिद्ध नहीं करती। निष्पक्ष जांच में आदेशों, सक्षम स्वीकृति, प्रशासनिक आवश्यकता और लागू नियमों का परीक्षण होना चाहिए। यदि निर्णय नियमानुसार पाए जाते हैं तो वह तथ्य भी सार्वजनिक हो और यदि नियमविरुद्ध निर्णय सामने आते हैं तो जिम्मेदारी नियमानुसार तय की जाए।
विभाग यदि कलेक्टर के आदेश से प्रभावित शिक्षकों की मूल पदस्थापना, पूर्व संलग्नीकरण स्थल और वर्तमान कार्यस्थल की सूची सार्वजनिक कर दे तो काफी हद तक यह साफ हो जाएगा कि आदेश का कितना पालन हुआ। इससे उन स्कूलों की स्थिति भी सामने आएगी जहां शिक्षकों की वापसी अपेक्षित थी।
अब जनजातीय कार्य विभाग से यह स्पष्ट होना जरूरी है कि 7 सितंबर के आदेश की वर्तमान स्थिति क्या है, कितने शिक्षकों ने मूल विद्यालयों में आमद दी और क्या किसी शिक्षक को बाद में दोबारा संलग्न किया गया। पूर्व सहायक आयुक्त के कार्यकाल से जुड़े सवालों पर भी अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजी जांच और संबंधित पक्ष का जवाब सामने आने के बाद ही निकाला जाना उचित होगा।
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