गमछे में कौन? साहब की ई-अटेंडेंस या किसी और का खेल!
सार्थक पोर्टल की तस्वीरों ने खड़े किए सरकारी हाजिरी व्यवस्था पर सवाल; कृषि अधिकारी की उपस्थिति को लेकर गंभीर आरोप, शिकायतकर्ताओं का दावा—दो साल से कार्रवाई का इंतजार
दावा किया जा रहा है कि कुछ तस्वीरों में संबंधित अधिकारी के बजाय कोई दूसरा व्यक्ति दिखाई दे रहा है। हालांकि इस आरोप की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में मामले की वास्तविकता फोटो, लोकेशन, समय और तकनीकी रिकॉर्ड के सत्यापन के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
जब डिजिटल हाजिरी में फोटो, समय और लोकेशन दर्ज होते हैं तो संबंधित कर्मचारी की पहचान और वास्तविक उपस्थिति के सत्यापन की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
गमछा बांधकर कौन लगा रहा था हाजिरी?
उपलब्ध कराई गई सार्थक पोर्टल की 10 पेज की अटेंडेंस रिपोर्ट में 8 जून से 22 जून 2026 के बीच की उपस्थिति दर्ज होने की बात कही गई है। इसमें चेक-इन, चेक-आउट, फोटो और लोकेशन जैसी जानकारियां शामिल बताई गई हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि रिपोर्ट की कई तस्वीरों में चेहरे पर गमछा या कपड़ा बांधे दिखाई देने वाला व्यक्ति देवेंद्र कुमार बरास्कर नहीं है। इस दावे की स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
- क्या अधिकारी के नाम से किसी दूसरे व्यक्ति ने ई-अटेंडेंस दर्ज की?
- क्या विभाग ने अटेंडेंस फोटो में दिखाई दे रहे व्यक्ति की पहचान सत्यापित की?
- फोटो, समय और लोकेशन डेटा का मिलान किस स्तर पर किया गया?
- डिजिटल उपस्थिति की निगरानी की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी?
10 दिन की रिपोर्ट ने खड़े किए कई सवाल
रिपोर्ट में 8, 9, 10, 11, 12, 15, 16, 18, 19 और 22 जून 2026 की उपस्थिति दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। शिकायतकर्ताओं ने इनमें से कई तस्वीरों में दिखाई देने वाले व्यक्ति की पहचान पर सवाल उठाए हैं।
वहीं 18 जून के चेक-आउट से संबंधित फोटो और लोकेशन उपलब्ध नहीं होने की बात भी कही गई है। इसकी पुष्टि मूल डिजिटल रिकॉर्ड और पोर्टल लॉग की जांच से की जानी आवश्यक होगी।
संबंधित तारीखों के मूल फोटो, लॉगिन रिकॉर्ड, टाइम-स्टैम्प, लोकेशन डेटा और अधिकारी की वास्तविक ड्यूटी लोकेशन का मिलान किया जाए तो आरोपों की सत्यता पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
शिकायतकर्ताओं का दावा—दो साल से उठ रहा मामला
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि ई-अटेंडेंस से जुड़ी कथित गड़बड़ी का मामला करीब दो वर्षों से विभागीय स्तर पर उठाया जा रहा है, लेकिन अभी तक निर्णायक कार्रवाई सामने नहीं आई। इस दावे की पुष्टि संबंधित शिकायतों की तारीख, पत्राचार और विभागीय फाइल से हो सकती है।
ऐसे में यह मामला केवल एक अधिकारी की हाजिरी तक सीमित नहीं रह जाता। सवाल उस व्यवस्था की निगरानी का भी है, जिसे सरकारी उपस्थिति को डिजिटल और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया है।
उप संचालक बोले—कलेक्टर को भेजी गई फाइल
अब प्रशासनिक स्तर पर यह स्पष्ट होना जरूरी है कि फाइल की वर्तमान स्थिति क्या है, जांच किस स्तर पर लंबित है और उपलब्ध ई-अटेंडेंस रिकॉर्ड का तकनीकी सत्यापन कब कराया जाएगा।
जनता के फोन नहीं उठाने के भी आरोप
स्थानीय लोगों की ओर से अधिकारी के व्यवहार को लेकर भी शिकायतें किए जाने की बात सामने आई है। आरोप है कि आम जनता के फोन और समस्याओं पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि इस संबंध में औपचारिक शिकायतें हैं तो प्रशासन उनके तथ्यों की भी जांच कर सकता है।
शराब सेवन को लेकर आरोप, प्रमाण और सेवा नियमों से तय होगी स्थिति
स्थानीय स्तर पर संबंधित अधिकारी के शराब सेवन को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उन्हें कुछ अवसरों पर होटल में शराब पीते देखा गया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
केवल शराब सेवन का आरोप अपने-आप विभागीय कदाचार साबित नहीं करता। यदि शिकायत ड्यूटी के दौरान शराब सेवन, सरकारी कार्य पर प्रभाव या किसी सेवा नियम के उल्लंघन से जुड़ी है, तो उसके लिए प्रमाण और संबंधित सेवा नियमों के आधार पर जांच आवश्यक होगी।
अब प्रशासन से इन सवालों के जवाब की दरकार
- क्या अटेंडेंस रिपोर्ट की तस्वीरों का तकनीकी सत्यापन कराया जाएगा?
- फोटो में दिखाई देने वाले व्यक्ति की पहचान कैसे सुनिश्चित की जाएगी?
- क्या संबंधित तारीखों के लोकेशन और टाइम-स्टैम्प का स्वतंत्र मिलान होगा?
- दो साल से मामला लंबित होने के दावे की जांच होगी?
- कलेक्टर को फाइल भेजे जाने के बाद उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?
- यदि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा ई-अटेंडेंस दर्ज करने की पुष्टि होती है तो जवाबदेही किसकी होगी?
डिजिटल हाजिरी का दावा, तस्वीरों पर सवाल—अब जांच से ही खुलेगा सच
सार्थक पोर्टल के माध्यम से सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का उद्देश्य है। ऐसे में किसी अधिकारी की डिजिटल उपस्थिति पर सवाल उठना रिकॉर्ड के सत्यापन की जरूरत को रेखांकित करता है।
मामले में निष्पक्ष निष्कर्ष के लिए जरूरी है कि मूल ई-अटेंडेंस डेटा, फोटो, लोकेशन और टाइम-स्टैम्प की जांच की जाए। साथ ही संबंधित अधिकारी को आरोपों पर अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाए।
फाइल प्रशासन तक पहुंच चुकी है तो अब तस्वीरों और डिजिटल रिकॉर्ड का सत्यापन कब होगा? आरोप सही हैं या गलत—इसका जवाब निष्पक्ष जांच से सामने आना चाहिए।
