नगरपालिका अधिकारी गजानन नाफड़े अब ‘लफड़े’ में!
₹2 लाख की कथित रिश्वत लेते लोकायुक्त के शिकंजे में CMO — लंबित भुगतान के बदले ₹4 लाख मांगने का आरोप, पहली किस्त लेते ही ट्रैप
मंडला। शुक्रवार को शहर में गणेश विसर्जन की हलचल थी। कहीं गणपति को विदाई देने की तैयारियां चल रही थीं, तो दूसरी तरफ मंडला नगर पालिका कार्यालय में एक बिल्कुल अलग घटनाक्रम सामने आया।
जबलपुर लोकायुक्त की टीम ने नगर पालिका के मुख्य नगर पालिका अधिकारी गजानन नाफड़े के खिलाफ ट्रैप कार्रवाई करते हुए उन्हें कथित रूप से ₹2 लाख की रिश्वत लेते पकड़ा। कार्रवाई के बाद मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई।
सवाल उस सरकारी भुगतान व्यवस्था का भी है, जिसमें एक ठेकेदार को अपने लंबित भुगतान से जुड़ी शिकायत लेकर लोकायुक्त तक पहुंचना पड़ा।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार जबलपुर निवासी शासकीय पंजीकृत ठेकेदार ने लोकायुक्त से शिकायत की थी। शिकायत में नगर पालिका से संबंधित सप्लाई एवं अन्य कार्यों के भुगतान का मामला उठाया गया।
रिपोर्टों के मुताबिक करीब ₹15 लाख का भुगतान लंबित था और इसके एवज में ₹4 लाख की कथित रिश्वत मांगने का आरोप सामने आया।
यहीं से एक बुनियादी सवाल पैदा होता है। यदि काम नियमों के अनुसार पूरा हुआ था, सामग्री की आपूर्ति हुई थी और बिल भुगतान योग्य था, तो भुगतान किस वजह से लंबित रहा?
और यदि बिल भुगतान योग्य नहीं था, तो उसके कारण सरकारी फाइल पर दर्ज होने चाहिए थे। मगर यदि भुगतान की प्रक्रिया में कथित रिश्वत की मांग सामने आती है, तो मामला केवल एक अधिकारी और एक ठेकेदार के बीच का नहीं रह जाता।
क्या भुगतान की फाइल केवल नियम और दस्तावेजों से आगे बढ़ती है, या उसके रास्ते में कोई अनौपचारिक व्यवस्था भी खड़ी हो जाती है?
शिकायत लोकायुक्त तक पहुंचने के बाद उसका सत्यापन किया गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार कथित रिश्वत की पहली किस्त के रूप में ₹2 लाख देने की बात तय हुई।
इसके बाद लोकायुक्त की टीम ने योजना बनाई। शिकायतकर्ता तय रकम लेकर पहुंचा और कथित लेन-देन के दौरान टीम ने ट्रैप कार्रवाई कर दी।
संबंधित भुगतान की फाइल किस स्तर पर और कितने समय तक लंबित रही? किस अधिकारी के पास कितने दिन रही? क्या भुगतान रोकने का कोई लिखित कारण दर्ज था? इन सवालों के जवाब अभिलेखों की जांच से ही सामने आ सकते हैं।
नगर पालिका की यह कार्रवाई इसलिए भी ध्यान खींचती है क्योंकि हाल के समय में मंडला जिले में रिश्वत संबंधी अन्य ट्रैप कार्रवाइयां भी सामने आई हैं।
विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में पदस्थ कर्मचारी को GPF भुगतान से जुड़े मामले में ₹5 हजार की रिश्वत लेते ट्रैप किए जाने की खबर सामने आई थी।
नामांतरण से जुड़े मामले में एक निजी कर्मचारी को ₹8 हजार की कथित रिश्वत लेते पकड़े जाने की कार्रवाई सामने आई। मामले में संबंधित राजस्व अधिकारी की भूमिका को लेकर भी जांच की बात रिपोर्ट हुई।
अब CMO गजानन नाफड़े के खिलाफ ₹2 लाख की कथित रिश्वत लेते ट्रैप की कार्रवाई सामने आई है।
इन घटनाओं के आधार पर पूरे सरकारी तंत्र को भ्रष्ट कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन बार-बार सामने आ रही ट्रैप कार्रवाइयां निगरानी, शिकायत निवारण और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल जरूर पैदा करती हैं।
ट्रैप की खबर आती है। आरोपी पकड़ा जाता है। रकम सामने आती है। कानूनी प्रक्रिया शुरू होती है और कुछ दिनों बाद खबर सार्वजनिक चर्चा से गायब हो जाती है।
लेकिन असली प्रशासनिक कहानी इसके बाद शुरू होनी चाहिए।
नगर पालिका जनता से सीधे जुड़ी संस्था है। सड़क, पानी, सफाई, प्रकाश व्यवस्था, निर्माण और भुगतान—इन सभी का सीधा संबंध शहर के नागरिकों से है।
इसलिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों से यह पूछा जाना स्वाभाविक है कि क्या उन्हें नगर पालिका की भुगतान व्यवस्था से संबंधित शिकायतों की जानकारी थी? क्या लंबित भुगतानों की कभी संस्थागत समीक्षा की गई? क्या परिषद स्तर पर भुगतान प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के उपायों पर चर्चा हुई?
भ्रष्टाचार-मुक्त और पारदर्शी प्रशासन के दावों का वास्तविक परीक्षण विज्ञापन या भाषण में नहीं, बल्कि तब होता है जब कोई किसान नामांतरण कराने जाता है, कोई कर्मचारी अपना GPF निकालने जाता है, कोई नागरिक प्रमाणपत्र लेने पहुंचता है या कोई ठेकेदार किए गए काम का भुगतान मांगता है।
यदि वैध सरकारी काम के लिए नागरिक को किसी मध्यस्थ या कथित रिश्वत की व्यवस्था का सामना करना पड़ता है, तो सवाल उस पूरे सेवा तंत्र पर उठता है।
बम्हनी बंजर ... नामांतरण का मामला
मंडला नगर पालिका ...ठेकेदार के भुगतान का मामला
लोकायुक्त की जांच अपनी कानूनी प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ेगी। इसके समानांतर नगर पालिका के भुगतान तंत्र की प्रशासनिक समीक्षा कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब दे सकती है।
पिछले वर्षों में कितने बड़े ठेके और सप्लाई आदेश जारी हुए? कितने बिल अभी लंबित हैं? किस फाइल में कितने दिन का विलंब हुआ? भुगतान किस क्रम में किए गए? क्या किसी ठेकेदार ने पहले भी लिखित शिकायत की? और संबंधित भुगतान को रोकने या लंबित रखने का रिकॉर्ड में क्या कारण दर्ज है?
इस प्रकरण का सार्वजनिक महत्व केवल ट्रैप की रकम से तय नहीं होगा। महत्व इस बात से तय होगा कि जांच और प्रशासनिक समीक्षा कितनी गहराई तक जाती है।
यदि जांच केवल उस कथित लेन-देन तक सीमित रहती है, तो मामला एक आपराधिक प्रकरण तक रहेगा। लेकिन यदि भुगतान प्रणाली, लंबित फाइलों और पूर्व शिकायतों की समीक्षा होती है, तो यह पता चल सकता है कि व्यवस्था में कोई व्यापक कमजोरी मौजूद थी या नहीं।
और यदि ऐसी कोई व्यापक अनियमितता नहीं मिलती, तो वह तथ्य भी उतनी ही स्पष्टता से जनता के सामने आना चाहिए।
जवाबदेही का अर्थ पहले से किसी को दोषी घोषित करना नहीं है।
जवाबदेही का अर्थ है रिकॉर्ड खोलना, जांच करना और तथ्य जनता के सामने रखना।
हर ट्रैप कार्रवाई के बाद एक तस्वीर सामने आती है—आरोपी, रकम और जांच अधिकारी। लेकिन नागरिक की जिंदगी उस तस्वीर से आगे चलती है।
अगले दिन उसे फिर तहसील जाना है। नगर पालिका में आवेदन देना है। किसी विभाग से भुगतान लेना है। किसी योजना का लाभ लेना है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि आज कौन पकड़ा गया?
इससे बड़ा सवाल है—कल किसी नागरिक को अपना वैध काम कराने के लिए कथित रिश्वत की मांग का सामना न करना पड़े, इसके लिए व्यवस्था में क्या बदलेगा?
मंडला | विशेष रिपोर्ट | लोकायुक्त ट्रैप एवं प्रशासनिक जवाबदेही
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