अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस: वैश्विक शांति, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की अनिवार्य आवश्यकता
“शांति में निवेश—हर व्यक्ति के लिए, हर जगह, हर दिन”
दैनिक रेवांचल टाईम्स। हर वर्ष 21 सितंबर को विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल युद्ध और हिंसा की समाप्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का अवसर भी है कि स्थायी शांति के लिए न्याय, समानता, मानवाधिकार, शिक्षा, संवाद, सहयोग और सामाजिक समावेशन आवश्यक हैं।
शांति का अर्थ केवल युद्ध का न होना नहीं
यदि किसी समाज में जातीय, नस्लीय, धार्मिक अथवा सामाजिक भेदभाव मौजूद हो, लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के समान अवसर न मिलें तथा महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों को असुरक्षा का सामना करना पड़े, तो केवल युद्ध की अनुपस्थिति को पूर्ण शांति नहीं माना जा सकता।
युद्ध की कीमत केवल युद्धभूमि नहीं चुकाती
युद्ध का प्रभाव सैनिकों और युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इसका असर बच्चों की शिक्षा, परिवारों की सुरक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और सामाजिक जीवन तक पहुंचता है। संघर्ष समाप्त होने के बाद भी विस्थापन, पुनर्निर्माण और सामाजिक विश्वास बहाल करने में लंबा समय लग सकता है।
सामाजिक न्याय के बिना स्थायी शांति अधूरी
गरीबी, असमानता, भेदभाव और अन्याय सामाजिक तनाव को बढ़ाने वाले कारक हो सकते हैं। इसलिए शांति के लिए केवल हिंसा रोकना पर्याप्त नहीं है। समान अवसर, न्याय तक पहुंच, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, सम्मानजनक रोजगार, लैंगिक समानता और सामाजिक सुरक्षा भी आवश्यक हैं।
शिक्षा शांति निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम
विद्यालय और विश्वविद्यालय केवल डिग्री हासिल करने के केंद्र नहीं हैं। वे ऐसे स्थान भी हैं जहां विद्यार्थी असहमति के बीच संवाद करना, विविधता का सम्मान करना, भेदभाव को समझना, तथ्य और अफवाह में अंतर करना तथा लोकतांत्रिक तरीके से समस्याओं का समाधान करना सीख सकते हैं।
बुद्ध की करुणा, गांधी की अहिंसा और आंबेडकर का सामाजिक न्याय
गौतम बुद्ध के चिंतन में करुणा, मैत्री, अहिंसा और आत्मसंयम महत्वपूर्ण हैं। गांधीवादी विचार अहिंसक प्रतिरोध और संवाद पर बल देता है, जबकि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के चिंतन में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व लोकतांत्रिक समाज के मूल तत्व हैं।
शांति का व्यापक अर्थ केवल हिंसा का अभाव नहीं, बल्कि सम्मान, समान नागरिकता, सामाजिक न्याय और बंधुत्व पर आधारित समाज के निर्माण से भी जुड़ा है।
महिलाएं और युवा शांति निर्माण की बड़ी शक्ति
महिलाएं परिवार, समुदाय, नागरिक समाज, शिक्षा और स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से संघर्ष समाधान और सामाजिक पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसी प्रकार युवा सामाजिक संवाद, डिजिटल जागरूकता, सामुदायिक सेवा, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और मानवाधिकार जागरूकता के माध्यम से शांति निर्माण में योगदान दे सकते हैं।
डिजिटल दौर में अफवाह और घृणा-भाषा नई चुनौती
डिजिटल माध्यमों ने सूचनाओं के प्रसार की गति कई गुना बढ़ा दी है। गलत सूचना, अफवाह, घृणा-भाषा और सामाजिक विभाजन भी इन्हीं माध्यमों से तेजी से फैल सकते हैं। दूसरी ओर डिजिटल माध्यम संवाद, शिक्षा और शांति का संदेश व्यापक स्तर पर पहुंचाने का प्रभावी माध्यम भी बन सकते हैं।
पर्यावरण संरक्षण भी शांति से जुड़ा प्रश्न
जल, भूमि, जंगल और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव समुदायों के बीच तनाव पैदा कर सकता है। जलवायु परिवर्तन, विस्थापन और संसाधनों की असमान उपलब्धता भविष्य के शांति निर्माण के महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को भी शांति के व्यापक विमर्श से जोड़ना जरूरी है।
शांति की शुरुआत हमारे आसपास से
अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर लें आठ संकल्प
दूसरा— बिना सत्यापन अफवाह और घृणा फैलाने वाली सामग्री साझा नहीं करेंगे।
तीसरा— जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव का विरोध करेंगे।
चौथा— बच्चों और युवाओं में शांति एवं संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा को बढ़ावा देंगे।
पांचवां— महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा एवं सम्मान को प्राथमिकता देंगे।
छठा— पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा बनाएंगे।
सातवां— असहमति को दुश्मनी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा मानेंगे।
आठवां— अपने समुदाय में ऐसा कार्य करेंगे जिससे किसी व्यक्ति के जीवन में सहयोग, सम्मान या अवसर बढ़े।
शांति कोई मौन नहीं, सक्रिय जिम्मेदारी है
स्थायी शांति केवल सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। यह हर नागरिक, परिवार, विद्यालय, विश्वविद्यालय, सामाजिक संस्था और समुदाय की भी जिम्मेदारी है।
जहां समानता है, वहां बंधुत्व विकसित होता है;
जहां संवाद है, वहां संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान संभव होता है;
और जहां मानव गरिमा का सम्मान है, वहीं स्थायी शांति की नींव मजबूत होती है।”
