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हर्राभाट में स्टोन क्रेशर के खिलाफ ग्रामसभा की हुंकार, सीमांकन से लेकर खनन अनुमति तक जांच की मांग

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हर्राभाट में स्टोन क्रेशर के खिलाफ ग्रामसभा की हुंकार, सीमांकन से लेकर खनन अनुमति तक जांच की मांग

ग्रामीणों ने कथित अवैध उत्खनन, सरकारी भूमि और ग्रामसभा के अधिकारों को लेकर उठाए गंभीर सवाल

दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला। संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में PESA के तहत ग्रामसभा को मिले अधिकारों और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। बिछिया तहसील क्षेत्र की ग्राम पंचायत हर्राभाट (कोको) के ग्रामीणों ने साईं स्टोन क्रेशर और उससे जुड़े कथित उत्खनन को लेकर प्रशासन से जांच और कार्रवाई की मांग की है।


ग्रामसभा में उठा मामला, प्रशासन तक पहुंची शिकायत

ग्राम पंचायत की ओर से दिए गए आवेदन में ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि गांव क्षेत्र में संचालित साईं स्टोन क्रेशर और उससे जुड़े उत्खनन के कारण स्थानीय लोगों को परेशानी हो रही है। आवेदन में ग्रामसभा में हुई चर्चा का उल्लेख करते हुए कथित अवैध उत्खनन रोकने और क्रेशर की वैधानिक स्थिति की जांच करने की मांग की गई है।

ग्रामीणों का कहना है कि क्रेशर और भारी गतिविधियों के कारण गांव के रास्तों, आसपास के वातावरण तथा स्कूल आने-जाने वाले बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है। ग्रामीण चाहते हैं कि प्रशासन मौके पर पहुंचकर शिकायतों का भौतिक सत्यापन करे।

PESA लागू है तो ग्रामसभा की आपत्ति का क्या हुआ?

मंडला जिला संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित क्षेत्र है। PESA Act, 1996 में अनुसूचित क्षेत्रों में लघु खनिजों से जुड़े prospecting licence अथवा mining lease से पहले ग्रामसभा या उपयुक्त स्तर की पंचायत की अनुशंसा से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। लघु खनिजों के auction concession के मामले में भी prior recommendation का प्रावधान है।

मध्यप्रदेश में मध्यप्रदेश पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) नियम, 2022 भी अधिसूचित हैं। ऐसे में ग्रामीणों का सवाल है कि ग्रामसभा में आपत्ति सामने आने के बाद संबंधित खनन गतिविधियों की वैधानिक स्थिति और शिकायत पर हुई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?

जरूरी कानूनी अंतर—खनन पट्टा और स्टोन क्रेशर एक ही अनुमति नहीं

PESA में लघु खनिज के prospecting licence, mining lease और auction concession से संबंधित प्रावधान हैं। वहीं स्टोन क्रेशर के संचालन के लिए लागू खनिज, भूमि, प्रदूषण नियंत्रण तथा अन्य वैधानिक अनुमतियों की स्थिति अलग-अलग जांची जानी चाहिए। इसलिए संबंधित इकाई के सभी लागू दस्तावेजों का विभागवार परीक्षण महत्वपूर्ण है।

ग्रामीणों का आरोप—स्वीकृत क्षेत्र से बाहर भी हुआ उत्खनन

ग्रामीणों का दावा है कि उन्हें क्रेशर संचालन और भंडारण के लिए करीब एक हेक्टेयर क्षेत्र की अनुमति होने की जानकारी मिली है, जबकि मौके पर इससे अधिक क्षेत्र में उत्खनन किए जाने की आशंका है। इस दावे की पुष्टि संबंधित विभाग के अनुमति-पत्र और स्वीकृत नक्शे से ही हो सकती है।

शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि श्मशान घाट, गोहू की भूमि और नाले में बने स्टॉप डेम के आसपास की सरकारी भूमि तक कथित रूप से अतिक्रमण और खनन किया गया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

सीमांकन से साफ हो सकती है पूरी तस्वीर

ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि राजस्व और खनिज विभाग की संयुक्त टीम मौके पर पहुंचकर स्वीकृत क्षेत्र का सीमांकन करे। अनुमति में दर्ज क्षेत्रफल और वास्तविक उत्खनन क्षेत्र का मिलान किया जाए तथा यह भी जांचा जाए कि कहीं सरकारी, पंचायत अथवा सार्वजनिक उपयोग की भूमि प्रभावित तो नहीं हुई।

प्रभावशाली लोगों के संरक्षण का आरोप, जांच के बिना निष्कर्ष नहीं

शिकायतकर्ताओं के बीच यह आरोप भी सामने आया है कि क्रेशर संचालक और उससे जुड़े लोगों को प्रभावशाली व्यक्तियों तथा जनप्रतिनिधियों का संरक्षण प्राप्त है, जिसके कारण विभागीय कार्रवाई प्रभावित हो रही है। हालांकि ग्रामीणों के इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और किसी सांसद, विधायक, मंत्री अथवा अन्य जनप्रतिनिधि की भूमिका के संबंध में सत्यापित दस्तावेज सामने नहीं आए हैं।

ऐसे में प्रशासन से अपेक्षा की जा रही है कि संरक्षण संबंधी आरोपों की भी निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट करे। यदि आरोप निराधार हैं तो उसे भी स्पष्ट किया जाए और यदि किसी स्तर पर नियमों के उल्लंघन या कार्रवाई प्रभावित करने के प्रमाण मिलते हैं तो जिम्मेदारी नियमानुसार तय की जाए।

खनिज विभाग बताए—कितनी जमीन, किसके नाम और किस काम की अनुमति?

पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल संबंधित विभागीय रिकॉर्ड का है। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित स्थान पर किस व्यक्ति अथवा संस्था के नाम कौन-सी खनिज अनुमति या पट्टा स्वीकृत है, उसका क्षेत्रफल कितना है, स्वीकृत सीमाएं कहां तक हैं और वर्तमान गतिविधियां उन्हीं सीमाओं के भीतर संचालित हो रही हैं या नहीं।

प्रदूषण नियंत्रण के मानकों की भी हो जांच

मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्टोन क्रेशरों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अलग दिशानिर्देश जारी किए हैं। ऐसे में संबंधित इकाई पर लागू consent, धूल नियंत्रण व्यवस्था, निर्धारित दूरी, हरित पट्टी और अन्य लागू पर्यावरणीय शर्तों की स्थिति भी जांच के दायरे में लाई जानी चाहिए।

ग्रामीणों का सीधा सवाल—जांच होगी या शिकायत फाइलों में दब जाएगी?

ग्रामीण जिला मुख्यालय पहुंचकर अपनी शिकायत प्रशासन के सामने रख रहे हैं। उनकी मांग है कि केवल कागजी रिकॉर्ड देखने के बजाय मौके का संयुक्त निरीक्षण किया जाए, उत्खनन क्षेत्र का सीमांकन हो, ग्रामसभा से संबंधित रिकॉर्ड की जांच हो और लागू वैधानिक अनुमतियों का वास्तविक स्थिति से मिलान कराया जाए।

जांच में इन सवालों का जवाब जरूरी

स्वीकृत खनन क्षेत्र वास्तव में कितना है? वास्तविक उत्खनन किस सीमा तक हुआ? ग्रामसभा अथवा संबंधित पंचायत की लागू वैधानिक भूमिका का पालन हुआ या नहीं? सरकारी अथवा सार्वजनिक उपयोग की भूमि प्रभावित हुई या नहीं? और स्टोन क्रेशर पर लागू प्रदूषण नियंत्रण एवं अन्य शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं?

असली सवाल—PESA का अधिकार जमीन पर कितना प्रभावी?

हर्राभाट का विवाद केवल एक स्टोन क्रेशर तक सीमित नहीं रह गया है। यह अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में स्थानीय समुदाय की आवाज का भी सवाल बन गया है। अब प्रशासनिक जांच से ही स्पष्ट होगा कि संबंधित खनन गतिविधियों में लागू कानून, अनुमति और निर्धारित शर्तों का पालन हुआ है या नहीं।

क्रेशर संचालक और विभागों का पक्ष भी जरूरी

ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों पर संबंधित क्रेशर संचालक, खनिज विभाग, राजस्व विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है। दस्तावेजी जांच और सभी संबंधित पक्षों का जवाब मिलने के बाद ही कथित नियम उल्लंघन या किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी पर अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है।











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