"फूल की पंखुड़ियों को* *तोड़कर, आप फूल की सुंदरता नहीं बटोर सकते।"
*— रवीन्द्रनाथ टैगोर*
दैनिक रेवांचल टाइम्स - यह एक छोटा-सा वाक्य है, लेकिन अपने भीतर जीवन, समाज और मानव संबंधों का गहरा दर्शन समेटे हुए है। फूल की सुंदरता उसकी प्रत्येक पंखुड़ी के साथ मिलकर बनती है। यदि हम उसकी पंखुड़ियाँ एक-एक करके तोड़ दें, तो न केवल उसकी सुंदरता समाप्त हो जाती है, बल्कि उसका अस्तित्व भी बिखर जाता है।
यही सिद्धांत समाज पर भी पूरी तरह लागू होता है। समाज अनेक व्यक्तियों से मिलकर बनता है। हर व्यक्ति अपने गुणों, अनुभवों, विचारों और योगदान के साथ समाज की एक महत्वपूर्ण कड़ी होता है। यदि किसी व्यक्ति से मतभेद होने पर उसे समाज से अलग कर दिया जाए, उसका अपमान किया जाए या उसका बहिष्कार कर दिया जाए, तो इससे समाज मजबूत नहीं होता, बल्कि उसकी सामूहिक शक्ति कमजोर होती है।
हर व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। हम सभी में कुछ कमियाँ और कुछ विशेषताएँ होती हैं। यदि समाज का उद्देश्य केवल गलतियाँ खोजकर लोगों को बाहर करना बन जाए, तो एक दिन ऐसा आएगा जब कोई भी व्यक्ति उस कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा। इसलिए समाज का धर्म दंड देना नहीं, बल्कि सुधार, मार्गदर्शन और सहयोग देना होना चाहिए।
इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने अपने लोगों को साथ लेकर चलने, संवाद करने और सुधार का अवसर देने की परंपरा अपनाई, वे समय के साथ अधिक संगठित और समृद्ध बने। इसके विपरीत, जहाँ गुटबाजी, बहिष्कार और व्यक्तिगत विरोध को बढ़ावा मिला, वहाँ समाज बिखरता चला गया।
मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद को मनभेद में बदल देना समाज के हित में नहीं है। यदि किसी व्यक्ति से भूल हुई है, तो निष्पक्षता के साथ उसकी समीक्षा हो, उसे अपनी बात रखने का अवसर मिले और सुधार का मार्ग दिखाया जाए। यही न्यायसंगत और मानवीय दृष्टिकोण है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम समाज को जोड़ने वाली सोच विकसित करें। आलोचना के स्थान पर संवाद, बहिष्कार के स्थान पर सहभागिता और कटुता के स्थान पर सहयोग का वातावरण बनाएँ। जब हर व्यक्ति स्वयं को समाज का सम्मानित सदस्य महसूस करेगा, तभी समाज की वास्तविक प्रगति संभव होगी।
अंततः, टैगोर का संदेश हमें यही सिखाता है कि जैसे पंखुड़ियाँ मिलकर फूल की सुंदरता बनाती हैं, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति मिलकर समाज की पहचान और शक्ति बनता है। इसलिए समाज को मजबूत बनाना है तो लोगों को जोड़िए, उन्हें सुधारिए, उनका सम्मान कीजिए—क्योंकि समाज की शक्ति उसके प्रत्येक सदस्य में बसती है, किसी एक व्यक्ति के बहिष्कार में नहीं।
*रंजीत कछवाहा*
(अध्यक्ष)*
*श्रीराम मंदिर ट्रस्ट कछवाहा समाज मंडला*
_मेरा तात्पर्य है अपना मंडला समाज में जिन क्षेत्रों के स्वजातीय बंधुओं अर्थात मतदाताओं ने समाज में पहले मतदान किया है उन्हें जोड़ना चाहिए न कि उनको और उनके क्षेत्र के स्वजातीय बंधु मतदाताओं को अलग करना ये उनका अपमान और उनके अधिकारों का हनन भी है। एसी स्थिति में एकजुटता कैसे आएगी_
