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भारत के पर्यावरणीय कानूनों के लिए आज सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला आया है



दैनिक रेवांचल टाइम्स  - देश की सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया कि 

(1) सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के 2021 के उस कार्यालय ज्ञापन  को निरस्त कर दिया, जिसके तहत बिना पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति  के शुरू की गई परियोजनाओं को बाद में  पर्यावरणीय मंजूरी देने की व्यवस्था की गई थी।

(2) न्यायालय ने कहा कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के तहत परियोजना शुरू करने से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति लेना अनिवार्य है। केवल एक प्रशासनिक कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से इस वैधानिक आवश्यकता को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

(3) 'पहले निर्माण, बाद में मंजूरी' व्यवस्था असंवैधानिक है।  अदालत ने स्पष्ट किया कि कंपनियों को पहले परियोजना शुरू करने और बाद में पर्यावरणीय अनुमति लेने की समानांतर व्यवस्था कानून के अनुरूप नहीं है।

(4) इस फैसले का प्रभाव भविष्य के मामलों पर होगा। 2021 के कार्यालय ज्ञापन के तहत पहले से दी गई पर्यावरणीय स्वीकृतियां यथावत रहेंगी, ताकि पहले से चल रही परियोजनाओं में अनावश्यक व्यवधान न आए।

(5) न्यायालय  ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में पोस्ट-फैक्टो पर्यावरणीय स्वीकृति दे सकती है, लेकिन इसके लिए पर्यावरण  (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत विधिवत वैधानिक अधिसूचना  जारी करनी होगी। केवल कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से ऐसा नहीं किया जा सकता है। 


(6) इस निर्णय से पर्यावरणीय कानूनों के पालन को मजबूती मिलेगी। उद्योगों और परियोजना प्राधिकरणों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि बिना पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के परियोजना शुरू करना स्वीकार्य नहीं है।

भविष्य में यदि सरकार किसी "एमनेस्टी स्कीम" के माध्यम से पोस्ट-फैक्टो पर्यावरणीय मंजूरी देना चाहेगी, तो उसे कानून के अनुरूप अधिसूचना जारी करनी होगी और प्रक्रिया वैधानिक होगी। यह निर्णय विशेष रूप से परमाणु परियोजनाओं, बड़े बांधों, खनन, ताप विद्युत, औद्योगिक गलियारों और अन्य बड़ी विकास परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन सभी में परियोजना शुरू होने से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है।                                        (राज कुमार सिन्हा)

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