लेखक : नवीन चौरसिया
शिक्षक एवं पर्यावरण अध्येता
दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला, मानव सभ्यता ने विज्ञान, चिकित्सा, कृषि और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि के कारण विश्व की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र के नवीनतम अनुमानों के अनुसार वर्ष 2025 में विश्व की जनसंख्या लगभग 8.2 अरब हो चुकी है, जबकि भारत लगभग 1.47 अरब (147 करोड़) की आबादी के साथ विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बना हुआ है। अनुमान है कि वर्ष 2080 के दशक तक विश्व की जनसंख्या लगभग 10.3 अरब तक पहुँच सकती है। यह स्थिति एक ओर विशाल मानव संसाधन का प्रतीक है, तो दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव की गंभीर चेतावनी भी है।
धरती के प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, जबकि जनसंख्या, उपभोग और विकास की गति लगातार बढ़ रही है। प्रत्येक व्यक्ति को भोजन, स्वच्छ जल, ऊर्जा, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की आवश्यकता होती है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनों की कटाई, खनन, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप पर्यावरण का संतुलन तेजी से प्रभावित हो रहा है। आज पर्यावरण संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की अनिवार्य शर्त बन चुका है।
विश्व आज जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण, वायु एवं जल प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसी अनेक गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। इसके परिणामस्वरूप हीट वेव, अनियमित मानसून, सूखा, बाढ़, समुद्री तूफान, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना तथा समुद्र के बढ़ते जलस्तर जैसी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। इनका प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि, खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
बढ़ती जनसंख्या का सबसे अधिक दबाव जल संसाधनों पर पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार विश्व में आज भी लगभग 2.2 अरब लोग सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं, जबकि 3.5 अरब से अधिक लोग वर्ष के किसी न किसी समय गंभीर जल संकट का सामना करते हैं। भूजल का अनियंत्रित दोहन, नदियों का बढ़ता प्रदूषण तथा वर्षा जल का अपर्याप्त संरक्षण भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं।
भारत की स्थिति और भी संवेदनशील है। विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या भारत में निवास करती है, जबकि देश के पास विश्व के कुल भू-भाग का केवल 2.4 प्रतिशत और मीठे जल संसाधनों का लगभग 4 प्रतिशत ही उपलब्ध है। बढ़ती आबादी के कारण कृषि भूमि, जल, वन एवं खनिज संसाधनों पर दबाव निरंतर बढ़ रहा है। तेजी से फैलते शहर, सिकुड़ते हरित क्षेत्र, बढ़ता ठोस अपशिष्ट, गिरता भूजल स्तर और प्रदूषित होती नदियाँ भविष्य के लिए गंभीर संकेत हैं।
ऊर्जा की बढ़ती मांग भी जनसंख्या वृद्धि का प्रत्यक्ष परिणाम है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार वर्ष 2025 में वैश्विक बिजली की मांग में लगभग 4.5 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, एयर कंडीशनरों का बढ़ता उपयोग, विद्युत वाहनों का विस्तार तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा सेंटरों की बढ़ती संख्या ऊर्जा की मांग को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा रही है।
चिंता का विषय यह है कि आज भी वैश्विक ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से पूरा किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार ऊर्जा क्षेत्र से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का उत्सर्जन लगभग 37.8 अरब टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुका है। वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का सबसे बड़ा हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र से आता है, जो जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण और वैश्विक तापमान वृद्धि का प्रमुख कारण है।
भारत में भी बिजली की मांग निरंतर बढ़ रही है। यद्यपि सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, फिर भी विद्युत उत्पादन का बड़ा भाग अभी भी कोयला आधारित है। इसके कारण कार्बन डाइऑक्साइड के साथ-साथ सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा सूक्ष्म कण (PM2.5) का उत्सर्जन बढ़ता है, जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए गंभीर खतरा है। इसलिए स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और हरित हाइड्रोजन जैसी तकनीकों का तीव्र विस्तार समय की आवश्यकता है।
बढ़ती जनसंख्या का प्रभाव केवल जल और ऊर्जा तक सीमित नहीं है, बल्कि मृदा, वन, जैव विविधता तथा संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र पर भी गहराई से दिखाई देता है। खाद्यान्न की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कृषि भूमि का विस्तार, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग तथा अनियोजित भूमि उपयोग मृदा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। अनेक क्षेत्रों में मृदा अपरदन, भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण की समस्या बढ़ रही है, जिसका सीधा प्रभाव कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
वन पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन के आधार हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन की गति को कम करते हैं, ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं तथा असंख्य जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के प्राकृतिक आवास हैं। नवीनतम वैश्विक आकलनों के अनुसार विश्व में लगभग 4.14 अरब हेक्टेयर वन क्षेत्र शेष है, जो पृथ्वी के लगभग 32 प्रतिशत भू-भाग पर फैला हुआ है। भारत लगभग 7.27 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र के साथ विश्व के प्रमुख वन संपन्न देशों में शामिल है तथा पिछले वर्षों में वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि भी दर्ज की गई है। फिर भी प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता, वन्यजीव आवासों का संरक्षण तथा जैव विविधता की सुरक्षा आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
जैव विविधता का संकट भी तेजी से गहराता जा रहा है। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार विश्व की लगभग 10 लाख (एक मिलियन) वनस्पति एवं जीव-जंतु प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं। प्राकृतिक आवासों का विनाश, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, आक्रामक प्रजातियाँ तथा संसाधनों का अत्यधिक दोहन इसके प्रमुख कारण हैं। किसी एक प्रजाति का लुप्त होना केवल उसी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। परागण करने वाले कीटों, पक्षियों तथा जलीय जीवों की घटती संख्या कृषि उत्पादन, खाद्य श्रृंखला और मानव जीवन के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
प्लास्टिक प्रदूषण आधुनिक उपभोक्तावादी जीवनशैली की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष 40 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसका बड़ा भाग नदियों और समुद्रों में पहुँचकर जलीय जीवों तथा पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाता है। सूक्ष्म प्लास्टिक (माइक्रोप्लास्टिक) अब पेयजल, मिट्टी, समुद्री जीवों और यहाँ तक कि मानव शरीर में भी पाए जा रहे हैं। भारत में एकल-उपयोग (सिंगल-यूज़) प्लास्टिक पर नियंत्रण के लिए कई कदम उठाए गए हैं, किंतु इनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जनसहभागिता और व्यवहार परिवर्तन आवश्यक है।
भारत के सामने पर्यावरणीय चुनौतियाँ बहुआयामी हैं। एक ओर बढ़ती जनसंख्या के लिए आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं का विस्तार आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। देश के अनेक महानगर वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। कई नदियाँ प्रदूषण के दबाव में हैं, भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है तथा जलवायु परिवर्तन के कारण कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबे सूखे जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं। हिमालयी हिमनदों का तेजी से पिघलना और तटीय क्षेत्रों में समुद्र के बढ़ते जलस्तर भविष्य के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं।
हालाँकि परिस्थितियाँ निराशाजनक नहीं हैं। यदि विकास को सतत विकास के सिद्धांतों पर आधारित किया जाए, तो आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, विशेषकर बालिका शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता, वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण, जैविक एवं प्राकृतिक खेती, ऊर्जा दक्षता, सौर एवं पवन ऊर्जा का विस्तार, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा, कचरा पृथक्करण, पुनर्चक्रण तथा प्लास्टिक के उपयोग में कमी जैसी पहलों को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ना होगा।
विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पर्यावरण शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर व्यवहार का हिस्सा बने। यदि प्रत्येक नागरिक जल और ऊर्जा की बचत को अपनी दैनिक आदत बनाए, प्रतिवर्ष कम से कम एक पौधा लगाकर उसका संरक्षण करे तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करे, तो छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।
बढ़ती जनसंख्या अपने आप में समस्या नहीं है। यदि यही जनसंख्या शिक्षित, स्वस्थ, कुशल, जागरूक और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी हो, तो यही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। वास्तविक चुनौती जनसंख्या नहीं, बल्कि संसाधनों का असंतुलित और अपव्ययी उपयोग है। इसलिए विकास की ऐसी नीति अपनानी होगी, जिसमें आर्थिक उन्नति, सामाजिक समावेशन और पर्यावरण संरक्षण तीनों को समान महत्व मिले।
आज आवश्यकता केवल विकास की गति बढ़ाने की नहीं, बल्कि उसकी दिशा को प्रकृति के अनुकूल बनाने की है। पृथ्वी हमारे पूर्वजों से मिली विरासत भर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमानत भी है। यदि हम आज जल, जंगल, जमीन, जैव विविधता और ऊर्जा संसाधनों के संरक्षण के प्रति गंभीर होंगे, तभी सुरक्षित, समृद्ध और सतत भविष्य की मजबूत नींव रख सकेंगे। यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता और मानव सभ्यता के प्रति हमारी साझा जिम्मेदारी है।
— नवीन चौरसिया
शिक्षक एवं पर्यावरण अध्येता

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