भाजपा के लिए गुजरात चुनाव में ऐतिहासिक जीत तो अपना महत्व रख ही रही है लेकिन पार्टी के अंदर हिमाचल प्रदेश को लेकर स्टडी शुरू हो गई है। हर बिंदु पर इसे देखा जा रहा है ताकि अगले साल जिन-जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव है वहां कमी न छूट जाए। इसमें सबसे महत्पूर्ण 230 विधानसभा वाला म.प्र. राज्य है जिस शिवराजसिंह चौहान ही लंबे समय से पार्टी का चेहरा रहे हैं। वैसे अगले साल चुनाव तो त्रिपुरा और कर्नाटक में भी होने हैं जहां भाजपा काबिज है लेकिन यहां पहले ही बीच में सीएम बदले जा चुके हैं।
भाजपा के थिंक टैंक हर आंकड़ों पर नजर दौड़ा रहा हैं। हिमाचल प्रदेश में भले ही सीएम रहे जयराम ठाकुर चुनाव जीत गए लेकिन उनके 10 में से 8 मंत्री चुनाव हा गए। पार्टी जब उत्तराखंड और गुजरात में सीएम बदल रही थी तब हिमाचल प्रदेश के बारे में भी मंथन हुआ था लेकिन सभी ने जयराम ठाकुर पर भरोसा जताया था। बात यह आ रही है कि हिमाचल प्रदेश में पिछले 35 सालों से हर पांच साल में सरकार में नई पार्टी को मौका देने की कवायद है जिससे यहां रिवाज नहीं बदला। ..लेकिन बात यह भी उठ रही है कि उत्तराखंड में भी 20 साल से कुछ ऐसा ही रिवाज था जिसे भाजपा ने इस बार बदला जिसके पीछे सीएम बदलने का फॉर्मूला काम कर गया। एक बात यह भी गौर की जा रही है कि हिमाचल प्रदेश में जीतने और हारने वाली पार्टी के बीच वोटो का स्विंग 6 प्रतिशत होता है लेकिन यहां एक फीसदी पर ही पार्टी हारी। इससे यह माना जा रहा है कि सरकार के प्रति जनता का विरोध नहीं था लेकिन हार मिलना ही सारी बातों पर विराम लगा देता है।
हेमंत बिस्वा सरमा मिला नया चेहरा…
गुजरात में सीएम चेहरे के साथ सारे मंत्रियों को बदले जाने पर भाजपा को 27 साल बाद भी ऐतिहासिक सफलता मिली जिसने प्रयोग को सफल बना डाला। 2019 के बाद भाजपा ने गुजरात, उत्तराखंड, त्रिपुरा और कर्नाटक में सीएम बदले थे। गुजरात-उत्तराखंड में तो उसे फायदा मिला लेकिन त्रिपुरा और कर्नाटक में अगले साल चुनाव होना है। असम में भी चुनाव के दौरान पार्टी ने कुछ ऐसा ही प्रयोग किया था। तब वहां तत्कालीन सीएम सर्बानंद सोनोवाल के चेहरे पर चुनाव लड़ने के बजाय सामूहिक नेतृत्व नाम देकर चुनाव लड़ा गया। भाजपा चुनाव जीती और उसने सोनोवाल को रिपीट करने के बजाय हेमंत बिस्वा सरमा को कुर्सी सौंपी। आज हेमंत बिस्वा सरमा भाजपा के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों में से एक हैं।
शिवराज नहीं तो फिर कौन…?
साल 2023 में त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, कर्नाटक, म.प्र., राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम व तेलंगाना में चुनाव होना है। त्रिपुरा और कर्नाटक में सीएम बदले जा चुके हैं जिससे वहां पुन: यह प्रयोग करना मुश्किल है। बात यदि म.प्र. की करें तो यहां शिवराजसिंह चौहान एक दशक से भी ज्यादा समय से सीएम है, बीच के 15 महीने कमलनाथ की कांग्रेस सरकार को छोड़ दे तो। वर्तमान में शिवराजसिंह चौहान म.प्र. में भ्रष्टाचार पर लगाम न लगा पाने के कारण लगातार निशाने पर हैं। यहां अफसरशाही मंत्रियों तक पर भारी पड़ रही है। कई प्रभारी मंत्रियों को तो स्थानीय प्रशासन तवज्जों तक नहीं देता है। कुछ अफसरों को तो इतने अधिकारी दे दिए गए हैं कि उनसे भाजपा के वरिष्ठ नेता तो बात करने में असहज महसूस करते ही हैं साथ ही उस अफसर के वरिष्ठ भी उसके समक्ष चुप्पी साधकर बैठे रहते हैं। ऐसे में कुछ अफसरों का सीडिंकेट ही पूरे प्रदेश की दिशा तय कर रहा है। ऐसे में जब भाजपा के मंत्री या बड़े नेता भी काम नहीं करा पा रहे हैं तो जनता का पार्टी नेताओं पर से विश्वास उठता दिख रहा है। इसका नतीजा 2023 के चुनाव पर भारी पड़ने की संभावना है। पार्टी के सामने यह है कि शिवराजसिंह चौहान नहीं तो फिर कौन? यहां आकर पार्टी असमंजस में देखी जाती है। वैसे शिवराजसिंह चौहान की एक विशेषता यह है कि वे प्रदेशाध्यक्ष व संगठन मंत्री के साथ कंधा मिलाकर काम करने में पीछे नहीं हटते हैं जिससे उनकी रिपोर्ट इन दोनों रास्तों से तो राष्ट्रीय नेतृत्व को उम्दा ही पहुंचती है। म.प्र. में जनवरी माह में प्रवासी भारतीय सम्मेलन है जिसके बाद कोई महत्वपूर्ण निर्णय होने की संभावना है, भले ही सीएम चेहरा न हो लेकिन कई मंत्रियों पर तो गाज गिरना तय है। कुछ मंत्री कांग्रेसी विचारधारा का चोला बदलकर भाजपा में आए हैं लेकिन उनमें से कईयों के कार्य से संतुष्टि नहीं मिल रही है।

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