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Friday, November 4, 2022

देवउठनी एकादशी और उसकी मान्यताएं...



   

दैनिक रेवांचल टाइम्स - कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारस तिथि को देवउठनी एकादशी कहा जाता है । इस वर्ष यह पुण्यतिथि 4 नवंबर 2022 दिवस शुक्रवार को है |

  वैदिक मान्यता के अनुसार आदिकाल में शंख चूर्ण नामक परम शक्तिशाली दैत्य हुआ जिनकी पत्नी का नाम वृंदा था । वृंदा भी परम पतिव्रता एवं सतीत्व का पालन करने वाली नारी थी । जिनके सतीत्व के कारण शंख चूर्ण दैत्य का वध नहीं किया जा सकता था अतः श्री हरि ने छल से उसका सतीत्व भंग किया तभी शिव जी ने दैत्य का वध कर दिया था इस छल के लिए वृंदा ने श्री हरि को श्राप देकर सिला रूप में परिवर्तित कर दिया था जिसे शालिग्राम भी कहा जाता है । उसके पश्चात वृंदा ने कठोर तप करके उन्हें अपने पति रूप में मांग लिया । वृंदा ने तुलसी के रूप में जन्म लिया और श्रीहरि शालिग्राम के रूप में तुलसी को अपनी पत्नी रूप में स्वीकार किया था ' तब से तुलसी विवाह उपरांत ही सभी मांगलिक कार्य जैसे शादी विवाह सगाई गृह प्रवेश आदि प्रारंभ हो जाते हैं ।यह वही तुलसी है जिसे आयुर्वेद के ज्ञाता महर्षि चरक ने अमृतोपम  बताया है ।

   वैदिक मान्यताओं में एक मान्यता यह भी है की आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तक भगवान श्री हरि योग निद्रा में विश्राम करते हैं ,इसी काल को चतुर्मास भी कहा जाता है । जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पूर्ण होता है इसलिए इसे देवउठनी ग्यारस के नाम से जाना जाता है ।

   ओम श्री तुलसैः विद्मते विष्णु प्रियाय धीमहि तन्नोः वृंदा प्रचोदयात् ॥इस मंत्र से तुलसी की पूजा करनी चाहिए एवं घर के सभी स्थानों और घर के बाहर भी दीप प्रज्वलित कर इस उत्सव को मनाना चाहिए |

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