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Wednesday, September 7, 2022

क्या कॉलेस्ट्रॉल सच में उतना बड़ा विलेन है, जितना उसे माना जाता है! चलिए आज इस मिथ को भी तोड़ ही देते हैं



हाल के वर्षों में दिल से जुड़ी बीमारियों में बड़ा उछाल देखने को मिला है. दिल की बीमारियों के लिए हाई कॉलेस्ट्रॉल को एक प्रमुख कारण के तौर पर देखा जाता है. लेकिन प्रश्न यह है कि क्या कॉलेस्ट्रॉल सच में आपकी जिंदगी का विलेन है? क्या कॉलेस्ट्रॉल उतना बड़ा विलेन है, जितना उसे समझा जाता है? क्या सभी तरह के कॉलेस्ट्रॉल आपके लिए नुकसानदायक होते हैं? इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है – नहीं! सभी तरह के कॉलेस्ट्रॉल बुरे नहीं होते, बल्कि कॉलेस्ट्रॉल हमारे शरीर की कई गतिविधियों के लिए बहुत जरूरी होता है. यह सेल्स बनाने, विटामिन डी (Vitamin D) का निर्माण करने और सेक्स हार्मोंस (Sex Harmons) बनाने के साथ ही फैट और फैट सॉल्यूबल विटामिन्स (Soluble Vitamins) के अवशोषण के लिए बहुत जरूरी है. एलडीएल (LDL) और एचडीएल (HDL) के रूप में कॉलेस्ट्रॉल शरीर में पाया जाता है. एलडीएल जहां कॉलेस्ट्रॉल को लीवर से शरीर की कोशिकाओं, उत्तकों और धमनियों तक ले जाता है, वहीं एचडीएल शरीर से अतिरिक्त एलडीएल को बाहर निकालने में मदद करता है.

कॉलेस्ट्रॉल सेल मेम्बरेन का महत्वपूर्ण घटक है. पृथ्वी पर ऐसा कोई जीव नहीं है, जो बिना कॉलेस्ट्रॉल के जीवित रह सकता है. कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा बहुत कम होने से जल्द मृत्यु का खतरा होता है. कॉलेस्ट्रॉल सभी स्टेरॉयड हार्मोन का अग्रदूत भी है. यानी इसके बिना आप एस्ट्रोजेन, टेस्टोस्टेरोन, कोर्टिसोन जैसे कई कॉलेस्ट्रॉल मुक्त हार्मोन का उत्पादन नहीं कर सकते हैं. कॉलेस्ट्रॉल खास तौर पर तब समस्या बन जाता है, जब कुछ प्रकार के कॉलेस्ट्रॉल (स्मॉल, डेंस और एलडीएल पार्टिकल्स) शरीर में मुक्त कणों (Free Redicals) के ऑक्सीडेशन में योगदान देते हैं, जो धमनियों में सूजन और नसों में प्लाक जमने, खून के बहाव को रोकने और दिल की बीमारियों में योगदान देने लगते हैं.

शरीर में फ्री रेडिकल्स का निर्माण PUFAs यानी वनस्पति तेल (Vegetable Oils), सिगरेट पीने (Smoking Cigarettes), प्रोसेस्ड फूड के सेवन, इम्यून सेल एक्टीवेशन, मानसिक तनाव (Mental Stress), कैंसर और एजिंग स्कीमिया सहित अन्य कारणों से होता है. आइए आज बात करते हैं कॉलेस्ट्रॉल से जुड़े कुछ मिथ की और जानते हैं कि यह मिथ कितने सही हैं और अगर सही नहीं हैं तो इनका भंडाफोड़ भी आज कर ही देते हैं.
पहला मिथ तो यही है कि कॉलेस्ट्रॉल बुरा होता है

सच्चाई क्या है – शरीर की हर कोशिका के लिए कॉलेस्ट्रॉल बहुत जरूरी है. यह कोशिकाओं की संरचना को सपोर्ट करता है. कॉलेस्ट्रॉल, विटामिन डी के निर्माण और सेक्स हार्मोन के लिए जरूरी है. यह फैट और फैट सॉल्यूबल विटामिन के अवशोषण के लिए जरूरी है.
दूसरा मिथ – रक्त में हाई कॉलेस्ट्रॉल का कारण आपकी डाइट में मौजूद कॉलेस्ट्रॉल होता है

सच्चाई क्या है – हम जो खाना खाते हैं उससे हमारे शरीर में कुल कॉलेस्ट्रॉल का 20-25 फीसद हिस्सा आता है. जबकि 75-80 फीसद कॉलेस्ट्रॉल का निर्माण हमारा लिवर करता है.

कुछ स्थितियों में लिवर ज्यादा कॉलेस्ट्रॉल का निर्माण कर सकता है. इसमें इंसुलिन रेजिस्सटेंस और टाइप 2 डायबिटीज भी शामिल है. मेटाबोलिक सिंड्रोम, एड्रेनेल डिस्फंक्शन, तनाव और जेनेटिक डिसऑर्डर की वजह से भी लिवर ज्यादा मात्रा में कॉलेस्ट्रॉल का निर्माण कर सकता है.

15-25 फीसद जनसंख्या हाइपर रिसपॉन्डर्स होते हैं. इसका मतलब यह है कि उनकी आनुवंशिकी के आधार वे वे बाकी की जनता की तुलना में आहार कॉलेस्ट्रॉल के प्रति तीन गुना अधिक प्रतिक्रिया का अनुभव कर सकते हैं.
तीसरा मिथ – हाई कॉलेस्ट्रॉल का मतलब दिल की बीमारी पक्का है

सच्चाई ये है कि मानक लिपिड लेबल पर अपने एलडीएल-सी (कॉन्सनट्रेशन) की जांच करना हृदय रोग के जोखिम का एक गलत मार्कर है. जिन लोगों का एलडीएल का स्तर अच्छा होता है उन्हें भी दिल के दौरे पड़ते हैं. ऑक्सीडाइज्ड कॉलेस्ट्रॉल की वजह से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा होता है, इसका निर्माण ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और फ्री रेडिकल्स के कारण होता है. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और फ्री रेडिकल्स के कारण सूजन और धमनियों की दीवारों पर प्लाक जमा हो जाती है.

दरअसल असली खतरा तक पैदा होता है जब एलडीएल के कण ऑक्सीडाइज्ड हो जाते हैं और धमनियों में प्लाक या कॉलेस्ट्रॉल के रूप में जमा होने लगते हैं. इसीलिए डॉक्टर और डायटीशियन ऐसा फल और सब्जियों का सेवन करने की सलाह देते हैं, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट का उच्च स्तर होता या वह एंटी-ऑक्सीडाइजर होते हैं. यह धमनियों की दीवारों से ऑक्सीडेशन को बाहर निकाल देते हैं.

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