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Friday, September 16, 2022

पितृपक्ष में क्यों कराया जाता है कौवों को भोजन? जानिए इसका महत्व और पौराणिक कथा



रेवांचल टाइम्स: हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है और लोग विधि-विधान के साथ अपने पितरों का श्राद्ध व तर्पण करते हैं. इस साल पितृपक्ष 10 सितंबर से शुरू हो गया है और 25 सितंबर तक रहेगा. पितृपक्ष में सबसे महत्वपूर्ण कार्य कौवों को भोजन कराने का होता है. जब भी किसी पूर्वज का श्राद्ध कर्म किया जाता है तो उसके बाद कौवों को भोजन कराया जाता है. आइए जानते हैं पितृपक्ष में कौवों में भोजन कराने का महत्व और इसका कारण
पितृपक्ष में कौवों का विशेष महत्व

आमतौर पर कौवों का छत पर आना या आवाजें करना अशुभ माना जाता है. लेकिन पितृपक्ष में लोग कौवों का इंतजार करते हैं कि वह आएं और भोजन ग्रहण करें. मान्यता है कि पितृपक्ष में ब्राहम्ण और भांजे को भोजन कराने के साथ ही कौवों का भी हिस्सा निकालना चाहिए. तभी श्राद्ध कर्म पूरा होता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में पितर कौवों के रुप में धरती पर आते हैं और इससे जुड़ी एक कथा भी प्रचलित है.
पितृपक्ष में कौवों से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार इन्द्र के पुत्र जयन्त ने ही सबसे पहले कौवे का रूप धारण किया था. यह कथा त्रेतायुग की है, जब भगवान श्रीराम ने अवतार लिया और जयंत ने कौए का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारा था. तब भगवान श्रीराम ने तिनके का बाण चलाकर जयंत की आंख फोड़ दी थी. जब उसने अपने किए की माफी मांगी, तब राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया भोजन पितरों को मिलेगा. तभी से श्राद्ध में कौवों को भोजन कराने की परंपरा चली आ रही है. यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में कौवों को ही पहले भोजन कराया जाता है.

इस समय में कौवों को न तो मारा जाता है और न हीं किसी भी रूप से सताया जाता है. यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे पित्तरों के श्राप के साथ- साथ अन्य देवी देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ता है और उन्हें जीवन में कभी भी किसी भी प्रकार की कोई सुख और शांति प्राप्ति नहीं होती.

डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं.रेवांचल टाइम्स इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.

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