बढ़ रही ‘टेक्स्ट नेक’ की समस्या
दरअसल, जब कोई सीधी मुद्रा में खड़ा या बैठा होता है तो उसके सिर का वजन 4.5 से 5.5 किलोग्राम के बीच होता है। वहीं जब कोई स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप पर काम करने या मैसेज पढ़ने के लिए सिर झुकाता है तो यह दोगुना या तीगुना तक हो जाता है। इससे गर्दन में दर्द की समस्या शुरू हो जाती है, जिसे टेक्स्ट नेक कहते हैं। कई बार यह दर्द असहनीय हो जाता है। न्यूयॉर्क के एक स्पाइन इंजरी सेंटर ने एक शोध में पाया था कि 15 डिग्री के कोण पर झुकाने पर सिर का वजन 12.3 किलोग्राम, जबकि 45 डिग्री तक नीचे करने पर 22.3 किलोग्राम हो जाता है। इससे गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यूजर को न सिर्फ असहनीय दर्द झेलना पड़ता है, बल्कि गर्दन और कंधे के आसपास के हिस्से में कुछ रेंगने जैसी अनुभूति भी हो सकती है।
बिगड़ सकता है उंगलियों का आकार
जब यूजर चैटिंग के दौरान की बोर्ड पर मैसेज टाइप करने में व्यस्त होते हैं तो स्मार्टफोन और टैबलेट का सारा भार लिटिल फिंगर (कनिष्ठा) पर आ जाता है। इससे यह उंगली धीरे-धीरे हथेली की ओर मुड़ती चली जाती है। स्मार्टफोन पर लंबे समय तक चैटिंग करने पर अंगूठे और उंगलियों के आसपास के जोड़े जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। इससे उनमें मौजूद कार्टिलेज में या तो क्षरण की शिकायत होने लगती है या फिर आसपास बेतरतीब हड्डियां विकसित होने लगती हैं। इससे उंगलियों का आकार बिगड़ सकता है। इससे भार सहने और छोटे-बड़े काम निपटाने की क्षमता में भी गिरावट आती है।
कीबोर्ड क्लॉ
वहीं चैटिंग की लत से उंगिलयों, कलाइयों और हथेलियों के सुन्न पड़ने तथा नस चढ़ने की शिकायत भी हो सकती है। चिकित्सकीय भाषा में इसे ‘कीबोर्ड क्लॉ’ कहा जाता है। इसलिए फोन या टैबलेट को हमेशा एक हाथ में थामकर दूसरे हाथ की उंगलियों से ही टाइपिंग करें।
सेलफोन एल्बो
जब बात करते समय हम स्मार्टफोन को कान पर लगाते है तो उंगलियों और कलाई के रास्ते कोहनी को जाने वाली एक नस पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। लंबे समय तक हाथ इसी मुद्रा में मोड़े रखने पर खून का प्रवाह भी बाधित हो सकता है। इससे यूजर को असहनीय दर्द और उंगलियों में गुदगुदी जैसे एहसास की शिकायत होती है।
फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम
इस बीमारी में यूजर को फोन वाइब्रेट होने या उसकी घंटी बजने का भ्रम होता है। एक अनुमान के मुताबिक हर दस में सात स्मार्टफोन यूजर ‘फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम’ के शिकार हैं। 87 फीसदी पीड़ितों को यह भ्रम हफ्ते में एक बार, जबकि 13 फीसदी को रोजाना परेशान करता है।

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