धूमधाम से विनोद की बारात ललिता के दरवाजे पर पहुंची. झूमते नाचते बारातियों का वधूपक्ष ने भरपूर स्वागत किया. जैसे ही बारात द्वार पूजा के लिए जय माल के लिए स्टेज पर पहुंची वैसे ही ललिता ने विनोद को देखा, विनोद को देखते ही ललिता के सपने चकनाचूर हो गए. हाथ में जय माला लेकर वह स्टेज पर पहुंची और विनोद के सांवले रंग को देखते ही उसने जयमाला डालने से इनकार कर दिया और स्टेज से मुंह फेरकर वापस चली गई.
घर के लोगों ने पूछा तो उसने बताया कि दूल्हा सांवला है, मैं इससे शादी नहीं कर सकती. काफी समझाने के बाद भी जब ललिता नहीं मानी तो दोनों पक्षों ने एक-दूसरे से बात की. जिसके बाद विनोद के पिता बिना दुल्हन लिए बारात को वापस ले जाने को राजी हो गए. इसके बाद तो गांव में लोग आपस में चर्चा करने लगे. लोगों की बातों को सुनकर विनोद को इतना बुरा लगा कि वो परेशान रहने लगा. विनोद को इतनी शर्म आई कि वह कमरे में बंद हो गया और फांसी लगा ली.
बेटे की मौत की खबर सुनते ही पिता मुन्नीलाल पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. जो पिता धूमधाम से बारात लेकर बेटे की दुल्हन की डोली लेने गया था अब अपने कंधे पर बेटे का शव लेकर चल पड़ा. इस खबर से पूरे इलाके में गहरी खामोशी छा गई. जिस घर में शादी की चहल-पहल थी वहां मातम पसर गया और चीख-पुकार मच गई. विनोद के भाई प्रवीण ने बताया की भाई की शादी तय की थी, लेकिन रंग सांवला होने की वजह से दुल्हन ने शादी करने से साफ इंकार कर दिया इसी वजह से उसके भाई ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली
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