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Friday, February 4, 2022

संस्कारों के कारण ही भारत को विश्व गुरु की संज्ञा दी गई - आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी प्रज्ञानंद सरस्वती जी महाराज.......




रेवांचल टाईम्स - भारत भूमि ही तपोभूमि,देवभूमि,धर्म भूमि है जहां भगवान का अवतरण होता है-:आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री प्रज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज आज दिनांक 04/02/2022 में बिहरिया,सिवनी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा महापुराण के तृतीय दिवस में पूज्य व्यासपीठ के गौरव आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी  प्रज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज जी ने बताया माता की गोद संस्कार पीठ है, संस्कार गांव में मिलते हैं, गांव से ही भारत देश की पहचान होती है,आज हमारे भारत देश के बड़े-बड़े शहरों में जो भी अपने अपने कर्म क्षेत्रे में प्रतिष्ठित अधिकारी हैं वे गाँवो में शिक्षा एवं संस्कार प्राप्त कर ही सम्मानित पद की प्राप्ति किए हैं। नीति नियम से बांधती है जो जीव को सद्बुद्धि देती है सुरुचि मोह काम वासना से बांधती है जो जीव को मन्दबुद्धि देती है,वासना ही बन्धन का कारण है,ये वासना से मुक्त होना है तो उपासना को जीवन मे लाओ,आपके हृदय में भगवान का वास है तो श्रीहरि पाप, पाखंड, रजोगुण, तमोगुण से हमेशा दूर रखते हैं। भगवान का उन्हीं लोगों के हृदय में वास होता है, जो सत्कर्म करते हैं। अनैतिक कमाई का लाभ तो कोई भी उठा सकता है। परन्तु तुम्हारे अनैतिक कर्मों को तुम्हें ही भोगना होगा। इसलिए कर्म करनें में सावधानी बरतें।

पूज्य आचार्य जी ने कहा जो लोग लोक या परलोक की किसी भी वस्तु की इच्छा रखते हैं या इसके विपरीत संसार में दुःख का अनुभव करके जो उससे विरक्त हो गये हैं और निर्भय मोक्ष पद को प्राप्त करना चाहते हैं, उन साधकों के लिये तथा योगसम्पन्न सिद्ध ज्ञानियों के लिये भी समस्त शास्त्रों का यही निर्णय है कि वे भगवान के नामों का प्रेम से संकीर्तन करें। अपने कल्याण-साधन की ओर से असावधान रहने वाले पुरुष की वर्षों लम्बी आयु भी अनजान में ही व्यर्थ बीत जाती है। उससे क्या लाभ। सावधानी से ज्ञानपूर्वक बितायी हुई घड़ी, दो घड़ी भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उसके द्वारा अपने कल्याण की चेष्टा तो की जा सकती है। राजर्षि खट्वांग अपनी आयु की समाप्ति का समय जानकर दो घड़ी में ही सब कुछ त्यागकर भगवान के अभयपद को प्राप्त हो गये।

आचार्य श्री ने बताया ये जो आनंद के समुद्र और सुख की राशि हैं, जिस (आनंदसिंधु) के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं, उन (आपके सबसे बड़े पुत्र) का नाम 'राम' है, जो सुख का भवन और संपूर्ण लोकों को शांति देनेवाला है।

 जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥

सो सुखधाम राम अस नामा,अखिल लोक दायक बिश्रामा।

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