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Monday, December 6, 2021

कहो तो कह दूँ = गालों पर "पचास चांटे" खाओ और हसीन बन जाओ...





रेवांचल टाईम्स - पूरे संसार की महिलाएं  बेवजह अपनी खूबसूरती बढ़ाने के लिए ब्यूटी  पार्लर जाकर  हजारों रुपए खर्च करती हैं वे हसीन दिखें इसके लिए तमाम तरह की कोशिश  भी करती हैं "फेशियल" या  चेहरे  की "मसाज" तो आजकल आम बात हो गई है,शादी ब्याह में जाना हो तो जिसकी  शादी होने वाली है उसके पहले वधु की अम्मा, चाचियां, बहनें, सहेलियां  ब्यूटी  पार्लर पंहुच जाती हैं  घंटो तक उनका मेकअप चलता है ये बात अलग है कि वे उसके बाद भी वैसी की  वैसी  ही दिखाई देती हैं, हाँ उनके मन में संतोष जरूर हो  जाता  है कि वे हसीन दिखाई दे रही हैं l ब्यूटी पार्लर वालों के पास भी मेकअप करने के लिए सामान की कमी नहीं रहती हर मेकअप में मॉस्चराइजर फाउंडेशन, क्लींजर, प्राइमर कंसीलर,आई शेडो, काजल, मस्करा, सिन्दूर, आई लाइनर, फेस पाउडर, आइब्रो पेन्सिल,आई  लैशेस,  लिपस्टिक, नेल  पेंट, ब्लश, कम्पेक्ट पॉउडर,  बिंदी, आलता, फेस क्रीम, मेंहदी,  कुमकुम जैसे चीजे जरूरी होती है और उन सबके बदले  मोटी  रकम  वसूली जाती  है महिलाओं से l लेकिन अब नई थेरेपी आ गई है पंजी का खर्चा नहीं और चेहरा ऐसा हसीन हो जाएगा की लोग देखते ही रह जाएंगे और वो थेरेपी है "स्लेप थरेपी"  यानि गालों पर चांटे पर चांटे खाओ और हसीन बन जाओ l दक्षिण कोरिया में ये थेरेपी बेहद लोकप्रिय है उसके  चलते वहां के ब्यूटी पार्लर वाले भूखे मरने की कगार पर आ गये हैं बस करना इतना सा है कि जो महिला या  पुरुष अपने आप को हसीन दिखाना  चाहते हैं वो थप्पड़ खाने के लिए तैयार हो जाएl उनके दोनों गालों पर  लपोड़े और लपोड़े मारे जाते  हैं और उनका  चेहरा चाँद सा खूबसूरत हो जाता है, बताया जाता है कि लगातार पचास चांटे खाने के बाद चेहरे पर निखार आ जाता हैं l दक्षिण कोरिया की महिलाएं ये प्रयोग  कई बरसो से कर रही है और फ्री फोकट में अपनी चेहरे की  खूबसूरती बढ़ा रही है  ये खबर जब  अपन ने पढ़ी तब अपने को  समझ  में आया कि प्रायमरी स्कूल में मासाब लोग गालों पर चांटे क्यों मारा करते थे वे अपने तमाम विद्यार्थियों को असल में खूबसूरत  बनाना चाहते थे , घर में बाप भी गालों पर चांटे इसलिए मारते थे ताकि  उनका बच्चा खूबसरत हो जाए, उन दिनों अपन मासाब लोगो को जी भर भर कर गाली  देते थे कि बहुत जम कर चांटा मारते थे लेकिन अब पश्चाताप होता है, लगता है उनके चरणों में जाकर लोट जाएँ  कि मासाब  माफ़ कर दो हमें आज जितनी भी  रौनक हमारे चेहरे पर दिख रही है वो आपके चांटों की ही देन  है, न आप  चांटें मारते  और  न हम इतने हसीन हो पाते l पता चला है कि जब से ये खबर सामने आई है ब्यूटी पार्लर वालों को अपना धंधा संकट में दिखाए पड़ने  लगा  है कुछ ब्यूटी पार्लर वाले तो अब चांटा मारने की ट्रेनिंग लेने दक्षिण कोरिया निकल गए हैं वैसे जब से ये राज जाहिर हुआ हैं  वे पति बेहद खुश हैं जिनकी बीबियाँ आये दिन ब्यूटी पार्लर जाकर हजारों रूपये का चूना  उन्हें लगाती थीं l अपने को लगता है की अब हर पति अपनी पत्नी पर यही थेरेपी  आजमाने  के लिए जी तोड़ कोशिश करेगा पैसे भी बचेंगे  और बीबी सुन्दर भी  दिखाई देने लगेगी , सुबह आफिस जाने के पहले और शाम को आफिस से आने के बाद करना क्या है, बीबी के गालों पर चांटे ही तो मारना है और ये काम तो हर पति  बड़ी राजी खुशी से करने तैयार हो जाएगा  है कोई शक l


अब उमर  मिली है तो वे क्या करें


कहते हैं जीना मरना ऊपर वाले के हाथ में होता है, जिसको जाना है वो  भरी  जवानी में ऊपर वाले के दरबार में अपनी हाजरी दे देता है और जिसको ऊपर वाला अपने पास नहीं बुलाना  नहीं चाहता वो  यंही धरती पर घिसटता रहता है  देश में इस बात की बड़ी चिंता है कि देश में  बुजुर्गों  की  संख्या लगतार बढती जा रही है अभी तक तो भारत को युवाओ का देश माना  जाता था लेकिन जिस गति  से  "डुकरा डुकरिया"  अपनी संख्या  बढ़ा  रहे है उसके हिसाब से पूरे देश में तेरह  करोड़ बुढ्ढे  बुढ़िया हो गए है जिनकी  उम्र साठ बरस से ऊपर  है, जो  रिपोर्ट  सामने आ रही  है उसके देखते हुए  अगले दस साल  में इन  बुजुर्गों  की  संख्या  उन्नीस करोड़ तक पंहुच जाएगी,  विशेषज्ञों  का कहना है कि इससे देश की अर्थ  व्यवथा पर  विपरीत  प्रभाव पड़ेगा तो भैया ये बुढ्ढे बुढ़िया करें तो क्या करें  यदि ऊपर वाले ने लम्बी उम्र देकर दुनिया में भेजा है तो जीना तो पडेगा  न,अपने हाथ में तो है  नहीं कि बटन दबाया  और  ऊपर वाले के पास पंहुच गए l एक पुराना गाना भी तो है "दुनिया में हम आये है तो जीना ही पड़ेगा जीवन है अगर  जहर तो पीना ही पडेगा"यानि जब तक जिंदगी है तब तक तो सारे  कष्ट  भोगना ही  पड़ेंगे, लगता है सरकार ने इसलिये ही पेंशन दी बंद कर दी है क्योकि जितने साल लोग बागों  ने नौकरी नहीं ही उससे ज्यादा साल से वे पेन्शन ले रहे हैं लेकिन  इसमें उनका दोष तो है नही पुराने ज़माने में शुद्ध खाना मिलता था, प्रदूषण  रहित  आबोहवा थी मेहनत करते थे लोग  मीलों पैदल चलते थे सायकल  चलाते थे, पिज्जा, बर्गर  कोई  जानता नहीं था,खालिस दूध दही मिला करता था तो वो ताकत अंदर है इसलिए लंबी उमर पाकर जी रहे हैं  अब आपकी अर्थ व्यवस्था पर विपरीत असर पड़े  या न पड़े "बुढ्ढे  बुढ़िया" तो ज़िंदा रहेंगे उनका कोई सरकार बाल बांका नहीं कर सकती, इसलिए हे बुजुर्गो आप लोग तो ठस्से के  साथ  जियो अर्थ व्यवस्था का क्या है वो तो किसी भी कारण से बैठ जाती है थोड़ी बहुत और बैठ  जाएगी आप तो  मस्त रहो और सौ बरस जियो l


सुपर हिट ऑफ़ द वीक


"सुना हैं कोरोना की नई लहर  आ गयी  है आप क्या सोचते हैं" किसी ने श्रीमान जी से  पूछा


"इसका कारण मुझे तो एक ही नजर आता  है जरूर किसी महिला ने कहा होगा इसी पैटर्न में दूसरा कुछ दिखाइए न" श्रीमान जी ने समझाया

                                        चैतन्य भट्ट

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