देहात से निकले लड़को की दुनिया उतनी रंगीन नहीं होती लेकिन वो अपने ब्लैक एंड व्हाइट जीवन में रंग भरने की कोशिश जरूर करतें हैं - करन शाह उइके..
रेवांचल टाईम्स - मंडला आदिवासी बाहुल्य जिले से पांचवी तक घर से तख्ती लेकर स्कूल गए थे! स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी! कक्षा के तनाव में स्लेटी खाकर हमनें तनाव मिटाया था! स्कूल में टाट-पट्टी की अनुपलब्धता में घर से खाद या बोरी का कट्टा बैठने के लिए बगल में दबा कर भी ले जाते थे! कक्षा छ: में पहली दफ़ा हमनें अंग्रेजी का कायदा पढ़ा और पहली बार एबीसीडी देखी! स्मॉल लेटर में बढ़िया f बनाना हमें दसवीं तक भी नहीं आया था! करसीव राइटिंग तो आज तक न सीख पाए!
हम देहात के बच्चों की अपनी एक अलहदा दुनिया थी कपड़े के बस्ते में किताब और कापियां लगाने का विन्यास हमारा अधिकतम रचनात्मक कौशल था! तख्ती पोतने की तन्मयता हमारी एक किस्म की साधना थी! हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते (नई किताबें मिलती) तब उन पर ज़िल्द चढाना हमारे जीवन का स्थाई उत्सव था!
व्हाइट शर्ट और ब्लैक पेंट में जब हम स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय पहुंचे तो पहली दफ़ा खुदके कुछ बड़े होने का अहसास हुआ! गांव से दस पंद्रह किलोमीटर की दूरी के कस्बे में साईकिल से रोज़ सुबह क़तार बना कर चलना और साईकिल की रेस लगाना हमारे जीवन की अधिकतम प्रतिस्पर्धा थी! हर तीसरे दिन हैंडपम्प को बड़ी युक्ति से दोनों टांगों के मध्य फंसा कर साईकिल में हवा भरते मगर फिर भी खुद की पेंट को हम काली होने से बचा न पाते थे!
स्कूल में पिटते मुर्गा बनते मगर हमारा ईगो हमें कभी परेशान न करता हम देहात के बच्चे शायद तब तक जानते नहीं थे कि ईगो होता क्या है? क्लास की पिटाई का रंज अगले घंटे तक काफूर हो गया होता और हम अपनी पूरी खिलदण्डिता से हंसते पाए जाते! रोज सुबह प्रार्थना के समय पिटाई के दौरान एक हाथ फांसला लेना होता मगर फिर भी धक्का-मुक्की में अड़ते-भिड़ते सावधान विश्राम करते रहते! हम देहात के निकले बच्चे सपने देखने का सलीका नहीं सीख पाते आपने मां-बाप को यह नहीं बता पाते कि हम उनसे कितना प्यार करते हैं! हम देहात से निकले बच्चे गिरते सम्भलते लड़ते भिड़ते दुनिया का हिस्सा बनते हैं, कुछ मंजिल पा जाते हैं कुछ बस यूँही खो जाते हैं! एकलव्य होना हमारी नियति है शायद!
देहात से निकले बच्चों की दुनिया उतनी रंगीन होती तो वो ब्लैक एंड व्हाइट में रंग भरने की कोशिश जरूर करते हैं! पढाई फिर नौकरी के सिलसिले में लाख़ शहर में रहें लेकिन हम देहात के बच्चों के अपने देहाती संकोच जीवनपर्यन्त हमारा पीछा करते हैं नहीं छोड़ पाते है! सुड़क सुड़क की ध्वनि के साथ चाय पीना अनजान जगह जाकर रास्ता कई कई दफ़ा पूछना! कपड़ो को सिलवट से बचाए रखना और रिश्तों को अनौपचारिकता से बचाए रखना हमें नहीं आता है!
अपने अपने हिस्से का निर्वासन झेलते हम बुनते है कुछ आधे अधूरे से ख्वाब और फिर ज़िद की हद तक उन्हें पूरा करने का जुटा लाते हैं आत्मविश्वास! हम देहात से निकले बच्चे थोड़े अलग नहीं पूरे अलग होते हैं अपनी आस-पास की दुनिया में जीते हुए भी खुद को हमेशा अकेला ही पाते हैं।
करन शाह उइके
सोशल वर्कर एवं राजनीतिज्ञ
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