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Monday, August 9, 2021

कहो तो कह दूं : न कहो "थाईलैंड के गधे" लाने के बहाने अफसर वहां की भी सैर कर आएं...

 


रेवांचल टाईम्स - अपने देश के अफसर सरकारी खर्चे पर विदेश की सैर करने के  नए नए तरीके  खोज ही लेते हैं, नेताओं को तो खैर विदेश की सैर करने के तरह तरह  के मौके मिल ही जाते हैं तो ये अफसर भला क्यों पीछे  रहें सो वे भी  स्कीमें बनाकर विदेश की सैर कर आते हैंl अब देखों न "कूनो नेशनल पार्क" में "अफ्रीका के चीतों" को लाने की योजना बन गयी, और जब देश की सबसे बड़ी अदालत  सुप्रीम कोर्ट ने भी इन चीतों को भारत लाने की अनुमति दे दी तो फिर क्या था अफसरों की तो बांछें  खिल गयी l  इन चीतों के मनोविज्ञान को समझने, उसकी आदतों से परिचित होने के लिए वन मंडल अधिकारी, रेंजर,  कर्मचारियों  और डाक्टरों  का एक दल अफ्रीका जाएगा, ये दल पूरे  पच्चीस  दिनों तक चीतों  के बारे में  अध्ययन करेगा कि चीता कैसे देखता है, कैसे बैठता है, कैसे खड़ा होता है, कब चिल्लाता है, कब सोता है, कब जागता  है कब अपने प्रेमिका "चीती"  को आँख मारता है, कितनी  लम्बी छलांग लगाता है ऐसा तो नहीं  आगामी ओलम्पिक  में लम्बी कूद के लिए प्रेक्टिस  कर रहा हो, जिस  दिन सो कर जल्दी उठ जाता हैं तो क्यों उठ जाता है, उसे कौन कौन सी बीमारी  हो सकती है, उसका इलाज कैसे होगा, उसे कोरोना तो नहीं है,  वो इंडिया जाकर बोर तो नहीं हो जाएगा, वो कितना लम्बा है, कितना चौड़ा है, उसके शरीर पर कितनी धारियां हैंl आँखें कमजोर तो नहीं हैं यदि कमजोर हैं तो कौन से "नंबर का चश्मा" उसे लगेगा l  उसके रहन सहन उसकी आदतों के लिए पूरी टीम 24 घंटे उसके साथ ही रहेगी कि पता नहीं कौन से पल वो कोई ऐसा काम कर  जाए जिसका अध्ययन  ये टीम न कर पाए, यानि चीते के पल पल की खबर ये अफसरों की टीम लेगी  और उसके बाद जब पूरी तरह से उस चीते  की "सात पुश्तों" की जानकारी और उसकी कुंडली  खंगाल  लेगा ये दल  तो वंहा से चीते  आने शुरू हो जाएंगे, अफसरों की इस टीम के अफ्रीका जाने आने ठहरने खाने पीने का पूरा  खर्चा  सरकार  उठाएगी अपना धेला भी नहीं  लगना  है l अपने को तो लगता हैं कि अभी तो अफ्रीका के चीते लाने की बात  चल रही हैं कुछ दिनों बाद न कहो ये अफसर "कीनिया की बिल्ली" "थाइलैंड का  गधा"  "फिलिपाइन्स की मकड़ी" "इंडोनेशिया के काक्रोच"  "चीन की  चिड़िया" "मलेशिया की मख्खी" "नीदरलैंड के केंकड़ा, कनखजूरा, पटार  का अध्ययन  करने की स्कीम  निकाल  कर  और उनके नाम पर फिर से विदेश की सैर का  प्रोग्राम  बना लें 


सावन छोड़ो, पूरे साल ही झूले झूल रहे  हैं हम 


अब सावन में पहले जैसे झूले नहीं लगते , ऐसा लोग बाग़ कहते हैं, पहले के जमाने में जब सावन आता था  तो  झूलों की बहार शुरू हो जाती थी गांवों में पेड़ों पर रस्सियों के झूलों में गांव की छोरियां और छोरे जम कर झूला झूलते थे सावन में लगने वाले मेलों में भी  "टेंपरेरी झूला" भी लग जाता था जिसे "हिंडोला" कहा जाता था , पर वक्त बदल रहा है पुरानी बातें अब सिर्फ बातें रह गई ,अब नया जमाना है भैया ,नए-नए झूले आ गए हैं जो दिखाई  तो नहीं देते पर हमें झुला रहे हैं  और अकेले सावन में नहीं बल्कि  पूरे साल  झूले लगे हुए और हर आदमी उन झूलों में झूल रहा है l मसलन नेता, मंत्री आम जनता को अपने वादों का झूला झुला  रहे हैं ये झूला खूब ऊपर जाता है और फिर धड़ाम से नीचे आ जाता है  अर्थव्यवस्था का जो झूला है वह भी बहुत तेज झूल रहा है लेकिन ये ऊपर कम जाता है नीचे बहुत तेजी से आता है ।बेरोजगार नौजवान रोजगार पाने का झूला झूल रहे है वे इस आशा में झूले का इंतजार कर रहे हैं कि जैसे ही झूला उनकी तरफ आएगा वे उसे पकड़ कर उसमें लटक जाएंगे पर ये झूला गोदाम में बंद हो चुका है जिसके बाहर निकलने की उम्मीद कम ही है।शेयर मार्केट का झूला तो इतनी स्पीड से ऊपर नीचे होता है कि खरीदने वाले कभी नोट कमा नहीं पाते क्योंकि यह झूला कब ऊपर चला जाए कब नीचे आ जाए भगवान् भी नहीं  जानता,  कोरोना का झूला तो आजकल चल ही रहा है कभी इधर, कभी उधर ,ये ऊपर नीचे आड़ा तिरछा कहीं भी झूल जाता है  कोई भरोसा नहीं इस झूले का, इस झूले पर  पर लोग नहीं बैठते बल्कि झूला लोगों पर ही बैठा जा रहा है।  हमारे प्रधानमंत्री ने चीन के प्रधानमंत्री को झूले में बैठा कर उन्हें झूला झुलाया था, अब वही चीन हमें झूले पर बैठाए हुए है l  किसी भी शहर की सड़कों पर वाहन चलाओ तो झूले जैसा आनंद तो अपने आप आता है । सावन,छोड़ो भादों छोड़ो क्वार, कार्तिक, अगहन ,मास पूस ,,फागुन,  चैत, बैसाख यानी पूरे साल जनता तो झूला झूल रही है इधर अपने प्रदेश   के भाजपा  विधायकों  को "मामाजी"  झुलाए पड़े हैं।  

        ये विधायक इस आस में हैं कि निगम मंडलों  का झूला जैसे ही उनकी तरफ आएगा और वे  उसे लपक  लेंगे पर मामा उन्हें झूला झुलाये पड़े हैं यानी कुल मिला कर पूरा देश ,पूरा प्रदेश, पूरा शहर तरह-तरह के झूलों का आनंद उठा रहा है। उसे ना सावन की राह देखने की जरूरत है ना भादो की ,चौतरफा झूले लगे हुए हैं और लोग झूल रहे हैं बस अंतर इतना है कि झुलाने  वाले चंद लोग हैं और झूलने वाले करोड़ों और वे जिंदगी भर झूलते ही रहेंगे ये भी तय हैं 

सुपर हिट ऑफ़ द  वीक 

"तुम्हारी शर्ट में तो एक भी लम्बा बाल नहीं मिलता" श्रीमती जी ने श्रीमान जी से कहा 

"हां तो क्या हुआ" श्रीमान जी ने पूछा

"मैं पूछती हूँ कौन हैं वो टकली"  श्रीमती जी ने चिल्ला कर पूछा

                                         चैतन्य भट्ट

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