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Sunday, July 25, 2021

Sankashti Chaturthi 2021: सावन की पहली संकष्टी चतुर्थी कब है? जानें तारीख और गणेश जी की आरती



Sankashti Chaturthi July 2021: पंचांग के अनुसार सावन मास (Sawan 2021) की पहली संकष्टी चतुर्थी 27 जुलाई को मनाई जाएगी. इस दिन गणेश जी की पूजा करने से संकटों से मुक्ति मिलती है.

Sankashti Chaturthi July 2021: संकष्टी चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश जी को समर्पित है. इस बार संकष्टी का पर्व पंचांग के अनुसार 27 जुलाई 2021 मंगलवार को श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाएगी.


सावन की पहली संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi 27 July 2021)
सावन का महीना 25 जुलाई 2021 रविवार से आरंभ हो रहा है. सावन का पहला सोमवार 26 जुलाई को पड़ रहा है. सावन मास में प्रथम सोमवार का विशेष महत्व बताया गया है. सावन का संपूर्ण महीना भगवान शिव को समर्पित है. गणेश जी, भगवान शिव के पुत्र हैं. इसलिए सावन मास में पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का विशेष महत्व बताया गया है. इस चतुर्थी की तिथि को ही संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है.


संकष्टी चतुर्थी का अर्थ (Meaning of Sankashti Chaturthi)
भगवान गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है. गणेश जी को प्रथम देवता होने का गौरव भी प्राप्त है. संकष्टी, संस्कृत का शब्द है. इसका अर्थ संकट के समय से मुक्ति प्राप्त करना है. इस दिन गणेश जी की विधि पूर्वक पूजा करने से जीवन में आने वाली दिक्कतें दूर होती हैं. इस दिन पूजा के बाद गणेश जी की आरती जरूर करनी चाहिए. इससे समृद्धि प्राप्त होती है.


गणेश आरती (Ganesh Ji Ki Aarti)
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा.
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा.
एकदन्त दयावन्त, चार भुजाधारी.
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी.
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा.
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा.
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा.
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा.
अँधे को आँख देत, कोढ़िन को काया.
बाँझन को पुत्र देत,निर्धन को माया.
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा.
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा.
दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी.
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी.
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा.
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा.


गणेश जी के मंत्र


ॐ गं गणपतये नम:

वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ। निर्विघ्नं कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

ॐ एकदन्ताय विद्धमहे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥

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