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Tuesday, July 13, 2021

दुर्भाग्य से भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है

 


 

रेवांचल टाईम्स डेस्क - नए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया की अंग्रेजी का ऑनलाइन मजाक उड़ाने का जो सिलसिला चल रहा है, हर भारतीय से यह सवाल पूछा जा सकता है की वो इस विवाद में किधर है?ऐसे में वे बातें याद आती हैं जो राज नारायण ने मोरारजी देसाई की जनता सरकार के स्वास्थ्य मंत्री के रूप में लंदन यात्रा के समय कहीसुनी  थीं।तब पत्रकारों ने उनसे पूछा था कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती तो वह  मंत्रालय कैसे चलाएंगे? समाजवादी राज नारायण जिनको हम  'असली बिहारी कह सकते हैं, ने बिना घबराए जवाब दिया था, 'अरे सब अंग्रेजी जानते हैं हम। मिल्टन-हिल्टन सब पढ़े हैं।' दरअसल उनके देशज तौर तरीकों और अंदाज से पता नहीं चलता था कि उनकी शिक्षा कहां तक हुई है। वह छात्र संघ के नेता, स्वतंत्रता सेनानी और 17 वर्ष की अवस्था से कांग्रेस के सदस्य थे। वह वाराणसी से जनमुख नामक समाचार पत्र प्रकाशित करते थे और राम मनोहर लोहिया के अखबार जन के संपादकीय मंडल में थे। जाहिर है ये अखबार हिंदी में प्रकाशित होते थे। अंग्रेजी भाषा में उनकी कमजोरी उन्हें इंदिरा गांधी को पराजित करने से नहीं रोक सकी। वह भी एक नहीं बल्कि दो बार। 

मांडविया के पुराने और खराब अंग्रेजी में लिखे गए ट्वीट्स अत्यधिक मजाकिया है। चिंता का विषय भी कि इस दुष्काल  के दौरान बतौर भारत के स्वास्थ्य मंत्री उन पर कैसे भरोसा किया जा सकता है? इसके बाद दलील आती है कि नरेंद्र मोदी की भाजपा से आप और क्या आशा करते हैं? भाजपा में प्रतिभा की कितनी कमी है और भाजपा इससे अधिक अहंकार भला क्या दिखा सकती है?

वैसे ज्यादातर भारतीय इसी तरफ होंगे, क्योंकि यह मानना गलत है कि जिसे अंग्रेजी आती है वही शिक्षित, पढ़ालिखा, और बुद्धिमान है। अंग्रेजी से फर्क नहीं पड़ता लेकिन एक मंत्री या सार्वजनिक जीवन में रहने वाले किसी भी व्यक्ति में राजनीतिक समझ, समझदारी, सीखने की क्षमता तथा अपनी टीम में भरोसा पैदा करने की क्षमता होनी ही चाहिए।

इतिहास के जानकर पुष्टि करेंगे कि के. कामराज जो भाजपा में अमित शाह के उभार के पहले किसी राष्ट्रीय दल (कांग्रेस)के सबसे ताकतवर अध्यक्ष थे, उन्हें 11 वर्ष की अवस्था में घोर गरीबी और पिता के निधन के कारण स्कूल छोडऩा पड़ा था। उन्हें तमिल आती थी और देश के गरीबों के दिलोदिमाग के साथ उनकी राजनीतिक समझ उन्हें श्रेष्ठ बनाती थी। उनके अंग्रेजी ज्ञान की बात करें तो कह सकते हैं कि वह खुशकिस्मत थे कि ट्विटर उनके समय नहीं था। अंग्रेजी के ज्ञान की महत्ता को कम नहीं आंका जा सकता। भारत में यह सशक्तीकरण की भाषा है। यही कारण है कि लोहियावादियों का सामाजिक कुलीनतावाद के विरोध में अंग्रेजी को खारिज करना गलत था। मुलायम सिंह यादव ने इसे उत्तर प्रदेश में लागू करने का प्रयास किया लेकिन उनके बेटे अखिलेश ने बहुत समझदारी से इससे दूरी बनाई। यही वजह है कि अब योगी आदित्यनाथ और वाई एस जगन मोहन रेड्डी जैसे मुख्यमंत्री अंग्रेजी भाषी शिक्षा को बढ़ावा दे रहे हैं। वैसे हम भारतीयों ने अंग्रेजी को अपने तरीके से बोलना, लिखना और व्याख्यायित करना सीखा है। रॉबिन राफेल जो अमेरिका की दक्षिण एशियाई मामलों की प्रभारी उप विदेश मंत्री थीं, ने कहीं जिक्र किया है कि कैसे नरसिंह राव के कार्यकाल में प्रणव मुखर्जी ने अपनी वॉशिंगटन यात्रा समाप्त की। एक साथी अमेरिकी वार्ताकार ने उनसे कहा कि वह बताएं कि उन्होंने अपनी बांग्ला लहजे वाली अंग्रेजी में क्या कहा?

वैसे आम  भारतीय तो 16 लहजों में अंग्रेजी बोलते हैं।' बात केवल शैली की नहीं है। हमारे देश में अंग्रेजी लिखने और इस्तेमाल करने के भी कई तरीके हैं, और रहेंगे | इस बात को कहने का अर्थ यह नहीं कि खराब अंग्रेजी का इस्तेमाल अच्छा है। लेकिन अगर आपकी अंग्रेजी अच्छी नहीं है तो आपको एकदम बेकार भी नहीं कहा जा सकता। सही अंग्रेजी को भी सैकड़ों तरह से परिभाषित किया जा सकता है |यही वजह है कि जब आप मनसुख मांडविया द्वारा महात्मा गांधी को 'नेशन ऑफ द फादर' कहने का मजाक उड़ाते हैं तो आप भी 16 लहजों में से किसी एक में सोच क्र बोलते हैं | दुर्भाग्य हमारे देश की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, जिसका कश्मीर से कन्या कुमारी तक एक ही अर्थ निकले |

                                       राकेश दुबे

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