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Saturday, June 19, 2021

बकस्वाहा जंगल बचाने की मुहिम को मिली शुरुआती सफलता, एनजीटी ने स्वीकार की रिट प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर संगठनों का मोर्चा बनाने की तैयारी भी शुरू

 


रेवांचल टाइम्स  -भोपाल, 18 जून। बकस्वाहा जंगल बचाने के मामले में दायर याचिका पर 17 जून को एनजीटी में पेशी हुई। उज्जवल-पुष्पराग विरुद्ध मध्य प्रदेश सरकार के मामले में हीरा खनन कंपनी को 30 जून तक अपना जवाब मय हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया गया है। अब अगली सुनवाई 30 जून को होनी है। पर्यावरण प्रेमियों ने एनजीटी में वाद स्वीकार किए जाने पर खुशी जताई है। 


उधर, बक्सवाहा जंगल बचाओ मुहिम से जुड़े युवाओं, सामाजिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय समिमि बनाने की तैयारी भी शुरू की गई है। इसके लिए एक आनलाइन बातचीत के जरिये तदर्थ समिति का गठन किया गया है। मेधा पाटकर, डॉ सुनीलम, अरविंद श्रीवास्तव और राजकुमार सिन्हा के मार्गदर्शन में गठित इस तदर्थ समिति में शुरुआती तौर पर 15 युवा और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। यह तदर्थ समिति देश—प्रदेश के विभिन्न संगठनों के जरिये युवाओं, छात्रों, आम जन तक पहुंचकर बक्सवाहा बचाओ अभियान को तेज करेगी। 


तदर्थ समिति को चार जिम्मेवारी सौंपी गई हैं। इनमें

1. स्थानीय साथियों से संपर्क और बक्सवाहा तक की यात्रा पर जाने की योजना तैयार करना,

2. राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर बक्सवाहा संबंधी अभियानों से समन्वय,

3. राज्य सरकार को दिए जाने वाले ज्ञापन को तैयार कर उसे सौंपना,

और 

4. विस्तृत संयोजन समिति तैयार कर आगामी रणनीति बनाना

शामिल है।


गौरतलब है कि देश भर के पर्यावरणविद इस परियोजना के खिलाफ हैं। उनकी चिंता सिर्फ जंगल को लेकर नहीं है, बल्कि इससे बिगड़ने वाली पारस्थितिकी और आसपास के लोगों के जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव भी है। यह इलाका पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहा है। पेड़ों की कटान से यह मुश्किल और बढ़ेगी। इसके अलावा माइनिंग से पानी के जहरीला होने का भी खतरा है। 


इस बारे में बक्सवाहा बचाओ तदर्थ समिति के सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. पुष्पराग ने बताया कि मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले की बस्कवाह जंगल को काटे जाने के संबंध में मध्य प्रदेश सरकार के द्वारा छतरपुर जिले की बस्कवाह क्षेत्र में आदित्य बिरला की ऐस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड कंपनी को हीरों की खदान के लिए हजारों साल पुराना 382.131 हेक्टेयर जंगल खत्म कर दो लाख 75 हजार 875 पेड़ काटने की अनुमति दे दी है।

 

यहां यह याद दिलाना समीचीन होगा कि हाल ही में इसी कोरोना काल में मध्य प्रदेश के सीहोर के एक किसान पर एक पेड़ काटने की एवज में एक करोड़ से अधिक का मुआवजा देने का दंड कोर्ट ने लगाया था। उसमें कोर्ट की टिप्पणी थी कि ऑक्सीजन देने वाला पेड़ अमूल्य है। इसी तरह 13 फरवरी 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा आदिवासियों के द्वारा जंगल को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इस तरह की याचिका के फैसले के रूप में 20 लाख आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर देने का फैसला दिया था। लेकिन आज इतनी आसानी से दो लाख 75 हजार से अधिक पेड़ों को, एक पूरे जंगल को काटने की इजाजत दी जा रही है, क्योंकि उस के साथ पूंजीपतियों का मुनाफा जुड़ा हुआ है। इस प्रोजेक्ट में कुल 300 से 400 लोगों को (अधिकारी, कर्मचारी, मजदूर सहित) रोजगार मिलने की बात कही जा रही है, किंतु इससे होने वाली हानि इस लाभ की तुलना में हजारों गुना अधिक है।


इस प्रोजेक्ट क्षेत्र के आसपास 20 गांव है। 20 गांव और उनमें रहने वाले 8000 लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी इस परियोजना के हित में अनदेखा कर दिया गया है। यह पानी की कमी वाला क्षेत्र है, जहां पीने के पानी का संकट बना रहता है। माइनिंग के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत होगी, जिससे संकट और अधिक गहरा जाएगा। इतना ही नहीं माइनिंग और अयस्क की सफाई के दौरान अपनाई जाने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं से दूषित जल भूमि और जल को प्रदूषित कर देगा और जल पीने योग्य नहीं रहेगा। इस क्षेत्र का एक मात्र अस्पताल और सेकेंडरी स्कूल बक्सवाहा में ही पड़ता है। पशु पालन इस क्षेत्र के रोजगार का बड़ा साधन है, जो कि जंगल पर निर्भर हो कर ही चल रहा है। इस क्षेत्र के गरीब लोग सीजन पर महुआ के फल और बीज इकट्ठा करते हैं और तेंदू के पत्ता इकट्ठा करते हैं यह उनकी आजीविका का एक मात्र साधन है।


सरकार इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के हित की अनदेखी कर रही है जो कि अन्याय पूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से आज जंगलों का संरक्षण और अधिक पेड़ लगाने की आवश्यकता है, क्योंकि जंगलों की इसी प्रकार होती आ रही अनाप-शनाप कटाई से हर प्रकार का प्रदूषण बढ़ा है और ग्लोबल वार्मिंग भी खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है।

 

पर्यावरणविदों का साफ कहना है कि बक्सवाहा प्रोजेक्ट जनहितकारी प्रोजेक्ट नहीं है। एक पूंजीपति के व्यक्तिगत लाभ के लिए आमजन के जीवन और पर्यावरण की इतनी बड़ी हानि को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस प्रोजेक्ट को रद्द किया जाए। पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए आम जनता के हित की बलि चढ़ाना बंद किया जाना चाहिए।


उधर, एनजीटी ने यह मामला स्वीकार कर लिया है। यहां वाद दाखिल करने वाले पहले आवेदक ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, सोनीपत में लॉ दूसरे साल के स्टूडेंट हैं। रिट दाखिल करने वाले दूसरे व्यक्ति गुना में वकालत करते हैं। एनजीटी में दाखिल रिट में कहा गया है कि रियो टिंटो एक्सप्लोरेशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (आरटीईआईपीएल) नामक एक ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने बक्सवाहा संरक्षित वन, सगोरिया गांव, बक्सवाहा तहसील, छतरपुर जिला में बंदर डायमंड ब्लॉक का साल 2008 में खोज की है। यह स्थान मध्य प्रदेश में है। 


आरटीईआईपीएल ने 954 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन पट्टे के लिए आवेदन किया था। हालांकि, इसके तुरंत बाद आरटीईआईपीएल ने इसे मध्य प्रदेश सरकार को सौंपने का फैसला किया। जुलाई 2019 में उपरोक्त क्षेत्र में स्थित बंदर हीरा परियोजना के लिए खनन पट्टा देने की नीलामी की गई थी। ई-नीलामी प्रक्रिया, एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज, जो आदित्य बिड़ला समूह की कंपनी (जिसे बाद में ईएमआईएल के रूप में संदर्भित किया गया) द्वारा जीती गई थी। ईएमआईएल को ‘पसंदीदा बोलीदाता’ के रूप में घोषित किया गया था।  


19 दिसंबर 2019 को एक आशय पत्र जारी किया गया। आशय पत्र में उल्लिखित शर्तों की संतुष्टि के बाद, ईएमआईएल को बंदर डायमंड ब्लॉक के लिए 364 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र के खनन पट्टा दिया गया। उक्त प्रस्तावित परियोजना की अनुमानित लागत तकरीबन 2500 करोड़ रुपये है। ध्यान रहे कि ईएमआईएल को सिर्फ 364 हेक्टेयर क्षेत्र का खनन पट्टा दिया गया है, हालांकि, इसने 382.131 हेक्टेयर क्षेत्र की पूर्व पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन किया है, जो आवंटित क्षेत्र से लगभग 22.131 हेक्टेयर अधिक है। यहां यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि प्रस्तावित परियोजना में हीरे की निकासी के उद्देश्य से 382.131 हेक्टेयर में फैले 46 किस्मों के 2,15,875 (2.15 लाख) पेड़ों को काटना होगा। 


इस परियोजना के लिए, ईएमआईएल एक मौसमी नाले को भी मोड़ देगा जो, खनिजयुक्त क्षेत्र पर स्थित है। इस पानी को बांध के निर्माण के माध्यम से अपस्ट्रीम पर एक जलाशय की ओर भेजा जाएगा। खदान और अयस्क प्रसंस्करण संयंत्र के लिए प्रति दिन 16,050 लीटर पानी की जरूरत है, जिसके परिणामस्वरूप प्रति वर्ष 5.9 मिलियन लीटर होगा। 


एनजीटी में दाखिल रिट में कहा गया है कि इस परियोजना को लागू करने के लिए 40 से अधिक प्रजातियों के पेड़ काटे जाने हैं। यह वन क्षेत्र 382.131 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं। अगर वनों को काटा गया तो 1972 की अनुसूची में सूचीबद्ध सात प्रजातियों सहित जीवों की काफी अच्छी विविधता बुरी तरह से प्रभावित होगी। इनमें भारतीय गज़ेल, चौसिंघा, सुस्ती भालू, तेंदुआ, मॉनिटर छिपकली, भारतीय दुम वाला गिद्ध और मयूर इनमें शामिल हैं। 


दाखिल की गई रिट में साइट निरीक्षण रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा गया है कि इस क्षेत्र के गांवों में रहने वाले लोग इन जंगलों पर निर्भर हैं। 


रिट दाखिल करने वालों की तरफ से कहा गया है कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में पहले से ही घटती जल उपलब्धता को यह परियोजना और खराब करेगी। इसके परिणामस्वरूप पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश और ह्रास होगा क्योंकि विकास की आड़ में पानी इसके अस्तित्व के लिए मौलिक जरूरत है। इसके अलावा, यह प्रस्तुत किया जाता है कि मौसमी नाला, जिसका पानी ईएमआईएल द्वारा उपयोग किया जाएगा, भूजल पुनरुद्धार का एक स्रोत है, और महत्वपूर्ण बेतवा नदी की जीवन रेखा में योगदान देता है, जिस पर पूरा बुंदेलखंड क्षेत्र निर्भर करता है। यह न केवल स्थानीय लोगों के जीवन और जीने के साधनों को अस्त-व्यस्त कर देगा, बल्कि क्षेत्र में पारिस्थितिकीय संतुलन को भी पूरी तरह से बाधित कर देगा।


एनजीटी का ध्यान वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की तरफ भी ध्यान दिलाया गया है। अधिनियम कहता है कि जब किसी क्षेत्र मंि किसी परियोजना के विकास के लिए जंगल को साफ किया जाना है, तो उतनी ही भूमि को वनरोपण के उद्देश्य के लिए डायवर्ट किया जाना है, और यह नई जमीन रखरखाव के लिए वन विभाग को सौंपी जानी है। हालांकि इस मामले में कलेक्टर, छतरपुर शैलेन्द्र सिंह ने स्वयं मनमाने ढंग से आदेश जारी कर कहा है कि राजस्व विभाग के पास उपलब्ध भूमि का उपयोग वन (संरक्षण) के अनुसार वन उपयोग के लिए किया जाना चाहिए। 


रिट में सुप्रीम कोर्ट की कई टिप्पणियों की तरफ भी ध्यान दिलाया गया है, जिसमें उच्चतम न्यायाल ने वनों को राष्ट्रीय धरोहर बताया है। न्यायालय ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि गैर-वन गतिविधियों के खिलाफ कानूनी संरक्षण प्राप्त है, जिसमें अवैध शिकार, खनन, पेड़ों की कटाई आदि शामिल है। आगे यह स्पष्ट किया गया है कि एक बार किसी क्षेत्र को संरक्षित वन के रूप में घोषित करने के बाद, यह एक संरक्षित वन बन जाता है, इस तथ्य के बावजूद कि उस क्षेत्र का एक हिस्सा बेकार है। एक क्षेत्र को संरक्षित वन घोषित करने के पीछे का विचार था, यह बताया गया था, केवल मौजूदा वन की सुरक्षा ही नहीं बल्कि वनरोपण भी है रिट में मांग की गई है कि पर्यावरण के हित में उत्तरदाताओं को निर्देश दें कि वे बहुमूल्य बक्सवाहा आरक्षित वन क्षेत्र में दो लाख पेड़ गिराने की अनुमति न दें। प्रतिवादी को खनन प्रक्रिया तभी शुरू करने का निर्देश दें जब नीति के अनुसार वैकल्पिक वनरोपण पर 100% यूरा जीवित रहने की दर प्राप्त हो और उसके बाद तीन साल बीत चुके हों।

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