रेवांचल टाईम्स डेस्क :- देश कठिन दौर से गुजर रहा है ,सरकार को सलाह देना,अपराध होता जा रहा है |आलोचना को तो अंध भक्त देशद्रोह करार दे देते हैं | आलोचना करने वालो में मीडिया ही नहीं अब सत्तारूढ़ दल के बड़े नाम भी शामिल होने लगे हैं | पिछले ३-४ दिन के “प्रतिदिन” से कुछ अंध भक्त नाराज हो गये | सोशल मीदिया और सेलफोन के जरिये जो कहना था कह गये | इस कहासुनी के लिए मैं उन्हें नहीं उनके प्रशिक्षण को जिम्मेदार मानता हूँ | सही मायने में उनकी दृष्टि को उनके “भाई साहबॉ” ने विकसित ही नहीं होने दिया | जब पूर्व पत्रकार और वर्तमान भाजपा सांसद प्रभात झा ने भी वही बात कहीं तो अपनी आदत के अनुसार ये राष्ट्रवादी पलट गये | बदले स्वर में अब कह रहे हैं उनका आशय वैसा नहीं था | यह उनके प्रशिक्षण का परिणाम है, जो उन्हें दो जमा दो चार सीधे से मानने नहीं देता |
नाराजी भाजपा में भी है और संघ में भी | कुछ अनुशासन के कारण चुप है तो कुछ भय के कारण और कुछ उस तनखैया टीम के कारण जो “टूलकिट” बनाकर किसी का भी मानमर्दन करने में देर नहीं लगाती | मैंने पिछले दिनों जो लिखा, उसे स्वीकारते हुए पुन: चंद सवालों के साथ दोहरा रहा हूँ | जिससे सनद रहे और वक्त जरूरत पर काम आये |
“सरकार उस त्रासदी की भयावहता का सामना करने में पूरी तरह से अक्षम साबित हुई थी, जबकि अब सरकार का दावा सफलता का हैं,पर वो प्रतिशत नहीं बताना चाहती।“ “तब और अब में एक बड़ा अंतर यह भी है कि उस दौरान बहुत से सामाजिक संगठन सामने आए थे और उन्होंने पूरे देश में लोगों की वास्तविक मदद की थी। इस दौरान सेवा के नाम पर जो सामने आये है उसमें उन लोगों का प्रतिशत कम है, जो निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं |”
“ इतिहास के पन्नों से कुछ नाम जो सामने आते हैं, जो हमारी सामाजिक चेतना और सेवा-भावना की सही तस्वीर सामने रखते हैं। कहानी बताती है कि बड़ी त्रासदी के वक्त हमारा समाज उसका मुकाबला कैसे करता है। इनमें ३ नाम है, पहले दो नाम दो भाइयों के हैं- कल्याणजी मेहता और कुंवरजी मेहता। और तीसरा नाम है दयालजी देसाई का। ये तीनों नाम गुजरात के हैं, लेकिन जो चीज इन्हें आपस में जोड़ती है, वह है गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के प्रति समर्पण। इसी वजह से ये तीनों १९१८ के खेड़ा सत्याग्रह में भी शामिल हुए थे। तीनों कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में भी शामिल हुए थे। मेहता बंधु सरकारी अधिकारी थे और दोनों ने एक साथ नौकरी छोड़कर अपना आश्रम स्थापित किया, जो आज भी मौजूद है। उन्होंने पटीदार युवा मंडल की स्थापना करके युवाओं को संगठित करने की कोशिश की और अपने आश्रम में युवाओं को राष्ट्रवाद की शिक्षा दी।“ “आज अपने को सांस्कृतिक सन्गठन कहने वाले राजनीतिक दलों के अंध भक्त बने हुए हैं| ऐसा भाव दिख रहा है, जैसे समाज से उन्हें कोई सरोकार नहीं है |
‘देश में १३० करोड़ लोगों के वेक्सीन कब तक मिलेगी एक बड़ा सवाल है | भारत सरकार के एक मंत्री नितिन गडकरी ने इस संकट का हल के साथ क्या होना था साफ़ किया है | नितिन गडकरी ने साफ़ कहा “ वेक्सीन निर्माण का लायसेंस एक व्यक्ति को नहीं १० कम्पनियों को देना चाहिए था | उनका सुझाव निर्माण तक है, सत्तारूढ़ भाजपा और उसे अदृश्य रूप से संचालन करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इसमें जुटना चाहिए था | संकट अभी टला नहीं ये काम अभी भी हो सकता है |संघ के जो आंकड़े गूगल पर उपलब्ध है, उसके अनुसार देश में ५५०००० शाखाएं हैं और इनसे कोई ६० लाख स्वयंसेवक जुड़े हैं | वेक्सीनेशन के काम के लिए एक सप्ताह का प्रशिक्षण पर्याप्त होता है |
“संघ प्रमुख जब ३ सप्ताह के प्रशिक्षण के बाद स्वयंसेवक को सीमा पर तैनाती की बात कह सकते हैं तो मानवता बचाने के लिए चल रहे युद्ध में यह सन्गठन चुप क्यों है ? अंक गणित का हिसाब जोड़ें तो १३० करोड़ जनता और ६० लाख स्वयंसेवक अर्थात अक वेक्सीनेटर को २१६ लोगों को वेक्सीन देना है | सतर्कता और सजगता से यह लक्ष्य एक सप्ताह का है | बशर्ते आप के मन में सद्भाव हो |”
अब कुछ सवाल :-
१. क्या इस आपदा में सेवा कार्य में लगना जन्मभूमि से प्रेम नहीं है ?
२. इस आपदा के दौरान सांस्कृतिक सन्गठन की राष्ट्रवाद की परिभाषा क्या है ?
३. दवा, आक्सीजन और अस्पताल में पलंगों के दलाली करने वाले कितने किसके साथ है ? इस पर श्वेत पत्र
पुनश्च : इसके बाद भी चंद अंधभक्त इसे आँख खोलकर पढ़ेंगे, और सही दिशा में चल पडे तो राष्ट्र पर उपकार करेंगे |
राकेश दुबे
Sunday, May 23, 2021
एक का ही सही ईमान खुलकर तो मेरे साथ आया
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