मत भूलिए, इन्होने भोपाल का नाम रोशन किया है - revanchal times new

revanchal times new

निष्पक्ष एवं सत्य का प्रवर्तक

Breaking

रेवांचल टाइम्स अखबार पाठकों से अनुरोध करता है कि आप अपने सुझाव हम तक जरूर भेजें.. ताकि आने वाले समय मे हम आपकी मदद से और भी बेहतर कार्य कर सकें... साथ ही यदि आपको लेख अच्छा लगे तो इसे ओरों तक भी पहुंचाए.. प्रकाशन हेतु ख़बरें, विज्ञप्ति मोबाइल- 9406771592 पर व्हाट्सएप्प करें

 आवश्कता है  आवश्कता है ....

रेवांचल टाईम्स समाचार पत्र एव वेव पोर्टल में मध्यप्रदेश के सभी संभाग, जिला, तहसील, विकास खंडों, में संवाददाताओं की एंव विज्ञापनों व खबरों से सबंधित व्यक्ति संपर्क करें इन नम्बरों में 👉 9406771592/ 9425117297/ 8770297430/9165745947

Tuesday, May 25, 2021

मत भूलिए, इन्होने भोपाल का नाम रोशन किया है



रेवांचल टाईम्स डेस्क :- भोपाल भी विचित्र शहर होता जा रहा है | सोशल मीडिया में ऐसे लोगों की हिस्सेदारी बडती जा रही है, जिनका  भोपाल के इतिहास शख्सियतों से सरोकार नहीं है | मीडिया तो पहले ही खांचों में बंटा हुआ था, इसमें कुछ दोष मीडिया है तो ज्यादा बड़ा हिस्सा सरकार के खाते में हैं | सरकार भोपल और उसके आसपास के उन नामचीन लोगों को नहीं जानती जिनकी कीर्ति पताका देश और विदेश में फहरा चुकी है |

            कोरोना ऐसी दो शख्सियत कल और आज में भोपाल से ले गया | सरकारी संवेदना, सोशल मीडिया और मीडिया  में उन्हें वो स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे |इनमे एक महान शिक्षाविद थे,तो दूसरे भोपाल से जाकर दिल्ली के सर्वोच्च न्यायालय में नई नजीर देने वाले वकील थे |

           भोपाल के समीप सीहोर जिले के ग्राम नंद्नेर में संस्कृत के महान साहित्यकार एवं कवि महामहोपाध्याय प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी का जन्म हुआ था | वाराणसी (उ.प्र) में हृदय गति रुकने से निधन हो गया वह 91 वर्ष के थे। प्रोफेसर द्विवेदी भारत के शीर्षतम् संस्कृत विद्ववानों में थे। जिन्होंने प्राचीन संस्कृत साहित्य को आधुनिक विश्व से परिचित करवाया।नान्द्नेर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ग्राम जेत से 4 किलोमीटर दूर नर्मदा जी के किनारे पर है |

       उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नादेर के ही स्कूल से प्राप्त की, बाद में उच्च शिक्षा के लिए वह सन् 1950 में वाराणसी (उ.प्र) चले गए। जहां उन्होंने संस्कृत के महान विद्वान स्वर्गीय महादेव शास्त्री के सानिध्य में संस्कृत का अध्ययन किया । उन्होने 1953 में शास्त्री, 1965 में आचार्य और 1959 में बनारस हिंदु विश्वविद्यालय से एम. ए की डिग्री प्राप्त की। सन् 1965 में रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर से पीएचडी की तथा 1974 में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर ने उन्हें डी.लिट की उपाधी से सम्मानित किया। 

     प्रोफेसर द्विवेदी ने अपने अध्यापन की शुरूआत अपने गृह राज्य मध्यप्रदेश से ही की उन्हेंने 1959 से 1970 तक मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में अपनी सेवाएं दी इस दौरान वह अलग अलग शहरों में लेक्चरर से लेकर असिस्टेंट प्रोफेसर तक रहे। तत्पश्चात वह बनारस गए और बनारस हिंदु विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष तथा डीन के पद पर रहे | प्रो. द्विवेदी ने पहली बार महाकवि कालिदास के 300 पांडुलिपियों का संपादन किया है ( जिनमे हावर्ड यूनिवर्सिटी में संग्रहित पांडुलिपियोंभी शामिल हैं )  जो कालिदास संग्रहवली के नाम से पहली बार 1967 में प्रकाशित हुई , इसका हिंदी अनुवाद कालिदास संस्कृत अकादमी उज्जैन द्वारा 2007 में प्रकाशित किया गया था। उन्होने 1993 में वाराणसी के कालिदास संस्थान की स्थापना की जो संस्कृत काव्य के क्षेत्र में सेंटर फॉर एक्सिलेंस है। वे पिछले कुछ वर्षों से राजा भोज के साहित्य पर कार्य कर रहे थे। उनका मानना था कि भारतीय इतिहास में राजा भोज की एक मात्र ऐसे राजा थे जो अपनी वीरता के कारण नहीं बल्कि अपनी साहित्यिक रचनाओं के कारण अमर हुए हैं किंतु विडम्बना है कि आधुनिक युग को यह पता ही नहीं की राजा भोज ने क्या लिखा और उसका क्या महत्व है। 

    वे स्थापित मान्यताओं पर चलने वाले व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने संस्कृत भाषा विज्ञान के क्षेत्र में सदियों से प्रचलित सिद्धांतों को चुनौती दी उन्होंने अलंकार को संस्कृत काव्य की आत्मा बताया तथा भाषा विज्ञान में ध्वनि की ऐतिहासिक व तार्किकता पर सवाल उठाए। उन्होंने संस्कृत काव्य के इतिहास को नए आयाम भी दिये। उन्होंने संस्कृत काव्य इतिहास में चार धाम और पांच कल्प की परिकल्पना दी। उन्होंने अपने जीवनकाल में 12 हज़ार से अधिक संस्कृत कविताओं की रचना की जिसमें भारत की स्वाधीनता के 50 वर्ष पूर्ण होने पर उनके द्वारा रचित ब्रम्हसत्रम् काफी चर्चित हुई थी    |

 

           इसी कड़ी में दूसरी शख्सियत भोपाल के भीमसिंह बांठिया की है | 1980  के दशक में भोपाल से सर्वोच्च न्यायलय में पैरवी करने वाले वकील चुनिदा होते थे | स्व. भीम सिंह बंठिया इस रिक्ति की पूर्ति करने के लिए न केवल न्यायधीश की नौकरी छोड़ी बल्कि कड़ी मेहनत से उस परीक्षा को पास किया जो आज भी सर्वोच्च न्यायलय में वकालत के लिए अहर्कारी है |उनके मुकदमे और दलीले आज भी नजीर बने हुए हैं |

          ऐसी महान विभूतियाँ जब अनायास  बिना उल्लेख  अनंत यात्रा पर जाती है तो उनका कृतित्व  याद आता है, उन्होंने कितनी परेशानी में नई जगहों पर जाकर भोपाल का नाम रोशन किया | अमीर मिनाई का एक शेर याद आता है :-

वो फूल सर चढ़ा जो चमन से निकल गया |

इज्जत मिली उसे जो वतन से निकल गया |

                                           राकेश दुबे

No comments:

Post a Comment