रेवांचल टाईम्स डेस्क :- कोरोना दुष्काल की दूसरी लहर का अंत नहीं हुआ है और तीसरी लहत के अंदेशे से अपना देश हलकान हो रहा है | अपने देश भारत में कोरोना दुष्काल पहली पारी से ज्यादा खतरनाक दूसरी पारी में दिखा | एक दिन में अगर चार लाख से अधिक मरीज किसी रोग से संक्रमित होने लगें और दुनिया में इस महामारी से जान गंवाने वाला हर चौथा व्यक्ति भारतीय हो तो कौन नहीं सिहर उठेगा ? संकट में संपन्नता तलाश करटी एक नयी जमात देश के हर राज्य में पैदा हो गई है जिसमे सब शामिल हैं “सत्तारूढ़ भी” और “सत्ता से दूर भी” |
अभी सामान्य जीवन से आम आदमी का निर्वासन न जाने कितने दिन और है?
जिंदगी सामाजिकता, सभ्याचार, सार्वजनिक आदान-प्रदान का अर्थ त्याज्य होता जा रहा है। एक-दूसरे को चेहरा न दिखाने का सरकारी हुक्म है। अपनी सांसों को आवरण देना जरूरी है। ‘तीन हाथ दूर रहकर बात करने का नया रिवाज बन गया है। अब स्नेहिल अभिवादन की परिभाषायें बदल रही है। आत्मसाक्षात्कार और आत्मालाप की नयी पगडंडियां सामान्य मार्ग हो जीने का अर्थ बदलने की चेष्टा कर रही है । पाठशालाओं, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के परिसर में आदमी की उपस्थिति नगण्य होती जा रही है | परिसंवाद, वक्तृता, समूह गायन और सामूहिक प्रयास जीवन से बहिष्कृत होते नज़र आने लगे हैं । आभासी दुनिया और इंटरनेट जिंदगी का नया फलसफा आम आदमी को सिखा रहा है | लगातार दूसरे बरस भी लाखों की तादाद में लोगों का इस संक्रामक रोग से ग्रस्त हो जाना और हज़ारों की तादाद में दम तोड़ देना इसके भयावह प्रभाव को दिखा रहा है।
अपने देश की स्वच्छता का कसीदा तो पहले ही कोई नहीं पढ़ता था, इस बरस यहां इस रोग के संक्रमण को इस तेजी से बढ़ते देखा तो अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे अत्याधुनिक देशों ने घबरा कर भारत में आने-जाने से मनाही कर दी। चाहे उनके अपने देश भी इस संक्रामक रोग से अछूते नहीं रहे। जिस तरीके से अपने देश में इस संक्रामक रोग से निपटा जा रहा है, उसके प्रति न्यायपालिका की दैनिक चेतावनियों के बावजूद किसी प्रकार का कोई नव जागरण, नये ढंग से जीने की चेतना दिखायी नहीं देती। साफ नज़र आ रहा है कि दुष्काल की यह दूसरी लहर पहली लहर से कहीं अधिक भयावह है, लेकिन इसका सामना करने की प्रतिबद्धता नज़र नहीं आती। टीसती क्या करेगी राम जाने ?
मुनाफाखोरों की वही चाल बेढंगी, जो पहले थी, वह अब भी है |इसमें बड़े और रसूखदार लोग नज़र आने लगे हैं । रेमडेसिवीर जैसे टीके इस रोग की राम बाण औषधि हैं या नहीं, यह सिद्ध नहीं हुआ, और जमाखोरों ने इसकी जमाखोरी करके बाज़ार से गायब कर दिया। अब अनसुने दामों पर उसे बेचा जा रहा है। यह रोग फेफड़ों का संक्रमण पैदा करता है, आक्सीजन घटा देता है, वेंटिलेटर तक पहुंचने की नौबत आ जाती है। जिस जीवनरक्षक उपकरण और औषधि की मांग हुई, वही मार्किट से गायब हो गयी। काले बाजार की रौनक बढ़ाने लगी। मिलावटखोरों, तस्करों और नंबर दो का धंधा करने वालों की बन आयी। देश नें मौत एक ऐसी अचानक अनिवार्यत बन गई है, जो अचानक किसी का भी पता पूछती हुई आ धमकती है। पिछले बरस से यह सच आपके दरवाजों पर दस्तक दे रहा है, लेकिन उसकी परवाह किये बगैर, खाली शीशियों में नकली टीकों के बाजार अलग सजने लगे। आक्सीजन सिलेंडरों की मांग के बराबर आपूर्ति नहीं और वेंटिलेटर हैं तो उनके चलाने वाले प्रशिक्षित लोगों की कमी है। ऐसी दिल दहला देने वाली खबरें मिलती हैं कि पंचतारा अस्पतालों में आक्सीजन की आपूर्ति खत्म हो गयी और रोगी दम घुटकर मर गये।लगता है यहां जिंदगी नहीं आजकल मौत के बाजार सजते हैं। आदमी के उजले भविष्य पर प्राणघातक दवाओं के साये मंडराने लगे। मरने वालों की सूची लम्बी होती जा रही है, लेकिन संकट में से संपन्नता तलाश करने वालों की एक नयी जमात भी उभरती दिखायी दे रही है।भारत में अट्ठारह बरस से ऊपर के सब लोगों को यह टीका लगा देने का फैसला हुआ, लेकिन टीके की आपूर्ति जरूरत से कहीं कम है। ‘सबको टीका लगाओ’ के आदेश के बावजूद महज आठ राज्यों में सबका टीकाकरण शुरू हो सका। देश में अभी महज दस प्रतिशत आबादी को टीका लग सका है। इस गति से कब लगेगा सवा अरब की आबादी को टीका और तब तक कितनी कोरोना लहरें भुगतेगा देश?
राकेश दुबे

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