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Thursday, May 20, 2021

दुष्काल : आज गाँधी जैसा कोई भी नहीं, इस देश में...



रेवांचल टाईम्स डेस्क :- दुष्काल भोग रहे भारत के सामने नेताओं के नाम पर जो नस्ल दिखाई दे रही है, उनमें ज्यादा की शक्ल और अक्ल, स्वार्थी,लुटेरी और खूंखारके रंगों से सराबोर दिखती है | ऐसे में “बापू” अर्थात मोहनदास करमचन्द गाँधी याद आते हैं | आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था। दुनिया के महानतम वैज्ञानिकों में से एक माने जाने वाले वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्संटीन का यह कथन भारतीय स्वंतत्रता संग्राम के मुख्य सूत्रधार बने महात्मा गांधी के सन्दर्भ में प्रसिद्ध है। आज इस दुष्काल में बापू का पासंग भी उपलब्ध नहीं है न तो “ सत्तारूढ़” लोगों में न “सत्ता से दूर” लोगों में|

        विश्व की महान क्रांतियों में शुमार किये जाने वाले भारतीय स्वाधीनता संग्राम का आधार बने गांधी को कैसे भी इस आन्दोलन से अछूता नहीं किया जा सकता, कितनी ही किताबें,लेख और सोशल मीडिया पर लिखे प्रसंग उनके अविस्मर्णीय योगदान को कम नहीं कर सकता । गांधी का योगदान आजादी की लड़ाई में अतुलनीय है। गांधी ने आजादी के लिए संघर्ष की शुरुआत सन् 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद की थी। गांधी ने जमींदारी प्रथा और इसके नकारात्मक पक्षों, भेदभाव जैसी मूलभूत सामाजिक समस्याओं के खिलाफ आन्दोलन का बिगुल बजाकर सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलन के साथ राष्ट्रीय पटल पर उनकी पहली बानगी थी। इसी कड़ी में सन् 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद का भार संभालने के बाद उन्होंने विभिन्न राष्ट्रव्यापी सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। वर्ष 1930 में दांडी पदयात्रा की शुरुआत तक आते-आते गांधी राष्ट्रीय पटल और जनमानस के बीच अपनी लोकप्रिय छवि व छाप छोड़ चुके थे।यहाँ इन सनों को दोहराने का अर्थ आज के नेताओं सवाल पूछना है, आप गाँधी के मुकाबले में कहाँ है ?

         आज के नेताओं को समझना चाहिए गांधी की इस वैयक्तिक सफलता के पीछे उनकी कार्यप्रणाली का अहिंसात्मक एवं शांतिप्रिय होना था। शांति व अहिंसा के मसीहा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के तरीकों में भी अहिंसावादी साधनों का इस्तेमाल किया, जिसमें पदयात्रा, अनशन और सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार मुख्य थे, आज पश्चिम बंगाल में जो हो रहा है, वो भारतके इतिहास  में कहाँ लिखा है । 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान सत्य अहिंसा  जैसे साधनों को आमजन का सर्वव्यापी समर्थन मिला आज भी देश में आमजन यही चाहता है. पर शायद नेता नहीं । गांधी की इसी कार्यप्रणाली से प्रभावित होकर विश्व के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार नोबेल में शांति के क्षेत्र में उन्हें पांच बार इस पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, लेकिन विडम्बना ये रही कि उन्हें यह पुरस्कार कभी नहीं मिल पाया। आलोचकों का मत है कि गांधी का योगदान केवल आजादी तक ही सीमित था, लेकिन ये तथ्य फेक न्यूज़ जैसा है, क्योंकि महात्मा गांधी के सुधार और परिवर्तन केवल स्वाधीनता संग्राम तक ही सीमित नहीं थे, अपितु उन्होंने भारतीय समाज में सर्वांगीण परिवर्तन का सूत्रपात भी किया। पुनर्जागरण के ऐतिहासिक दौर की समाप्ति के बाद भी उन्होंने पिछड़े हुए भारतीय समाज में व्याप्त बुराईयों का विरोध किया, जिसके अंतर्गत महिला शिक्षा, अस्पृश्यता व शराबबंदी के लिए सकारात्मक परिवर्तन की अलख जगाई। 1947 को जब देश औपनिवेशिक ताकतों की बेड़ियों से निकलकर आजादी का जश्न मना रहा था, तब गांधी आजादी से सालभर पहले, बंगाल के नोआखली में शुरू हुए साम्प्रदायिक दंगों के पीड़ितों के साथ अनशन पर बैठे थे। आजादी के जश्न के मौके पर जब पं. जवाहरलाल नेहरु और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पत्र के माध्यम से जश्न में शामिल होने का न्यौता दिया तो, गांधी ने निमंत्रण अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे देश के विभाजन व दंगों से दुखी थे। गांधी की दृढ़ शक्ति का ही परिणाम था कि देश ने संघर्ष कर आजादी पाई। इसके साथ ही वे अन्य क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत बने। सभी दलों को चाहिए कि वे वर्तमान युग में गांधी के विचारों का आदान-प्रदान करें और समाज में गांधीवादी मूल्यों की स्थापना करें। 

                                        राकेश दुबे

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