सरकार से बड़ा समाज, अपने दायित्व को समझें... - revanchal times new

revanchal times new

निष्पक्ष एवं सत्य का प्रवर्तक

Breaking

रेवांचल टाइम्स अखबार पाठकों से अनुरोध करता है कि आप अपने सुझाव हम तक जरूर भेजें.. ताकि आने वाले समय मे हम आपकी मदद से और भी बेहतर कार्य कर सकें... साथ ही यदि आपको लेख अच्छा लगे तो इसे ओरों तक भी पहुंचाए.. प्रकाशन हेतु ख़बरें, विज्ञप्ति मोबाइल- 9406771592 पर व्हाट्सएप्प करें

Friday, May 21, 2021

सरकार से बड़ा समाज, अपने दायित्व को समझें...


रेवांचल टाईम्स डेस्क :- मैं तो नहीं पर इतिहास में ख़ासा दखल रखने वाले मेरे दोस्त कहते हैं कि सन १९१८ की स्पेनिश फ्लू की त्रासदी आज तक बीते कोरोना दुष्काल से ज्यादा बड़ी थी। वह कितनी भयावह थी, इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उसके बाद जब १९२१  में देश में जनगणना हुई, तो १९११  की जनगणना के मुकाबले आबादी कम हो गई थी। ईश्वर करे यह कोरोना दुष्काल का अंतिम दौर हो | पूरे भारतीय इतिहास में इसके पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। इतिहास यह भी गवाही देता है किउस त्रासदी के कई सबक बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक तो सरकार उस त्रासदी की भयावहता का सामना करने में पूरी तरह से अक्षम साबित हुई थी, जबकि अब सरकार का दावा सफलता का हैं,पर  वो प्रतिशत नहीं बताना चाहती। तब और अब में एक बड़ा अंतर यह भी है किउस दौरान बहुत से सामाजिक संगठन सामने आए थे और उन्होंने पूरे देश में लोगों की वास्तविक मदद की थी। इस दौरान सेवा के नाम पर जो सामने आये है उसमें उन लोगों का प्रतिशत कम है, जो निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं |

         इतिहास के पन्नों से कुछ नाम जो सामने आते हैं, जो  हमारी सामाजिक चेतना और सेवा-भावना की सही तस्वीर  सामने रखते हैं। कहानी बताती है कि बड़ी त्रासदी के वक्त हमारा समाज उसका मुकाबला कैसे करता है। इनमें ३ नाम है, पहले दो नाम दो भाइयों के हैं- कल्याणजी मेहता और कुंवरजी मेहता। और तीसरा नाम है दयालजी देसाई का। ये तीनों नाम गुजरात के हैं, लेकिन जो चीज इन्हें आपस में जोड़ती है, वह है गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के प्रति समर्पण। इसी वजह से ये तीनों १९१८ के खेड़ा सत्याग्रह में भी शामिल हुए थे। तीनों कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में भी शामिल हुए थे। मेहता बंधु सरकारी अधिकारी थे और दोनों ने एक साथ नौकरी छोड़कर अपना आश्रम स्थापित किया, जो आज भी मौजूद है। उन्होंने पटीदार युवा मंडल की स्थापना करके युवाओं को संगठित करने की कोशिश की और अपने आश्रम में युवाओं को राष्ट्रवाद की शिक्षा दी।

दूसरी तरफ, दयालजी देसाई ने भी इन्हीं कामों को अपने ढंग से शुरू किया और उनके आश्रम में भी युवाओं को राष्ट्रवादी बनाने का काम किया गया। स्पेनिश फ्लू महामारी के फैलते ही ये तीनों अपने-अपने ढंग से सक्रिय हो गए। इन तीनों के पास अच्छी संख्या में समर्पित युवा थे और दरअसल, वही उनकी ताकत बने। दो काम सबसे जरूरी थे, लोगों को महामारी के प्रति जागरूक बनाना और उन तक दवा पहुंचाना। इसके लिए वे घर-घर गए। दयालजी देसाई के बारे में कहा जाता है कि वह साइकिल पर बैठकर खुद गांव-गांव जाते थे। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वह लोगों को कौन सी दवा देते थे? आज अपने को सांस्कृतिक सन्गठन कहने वाले राजनीतिक दलों के अंध भक्त बने हुए हैं| ऐसा भाव दिख रहा है, जैसे समाज से उन्हें कोई सरोकार नहीं है |

 तब इन तीनों ने जो सबसे महत्वपूर्ण काम किया, वह था महामारी में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना। तमाम अफवाहों और अज्ञात भय के बीच लोग आज की तरह उस समय भी अपने परिजनों के पार्थिव शरीर को वैसे ही छोड़कर चले जाते थे। इनकी पहल ने धीरे-धीरे लोगों के भ्रम दूर किए और फिर लोग अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए खुद आगे आने लगे। एक सदी बाद आज फिर से इन चीजों को याद करना इसलिए जरूरी है कि इस बार भी देश भर में जिस तरह से विभिन्न सामाजिक संगठन लोगों की मदद के लिए सामने आयें |

यह तथ्य भी जगजाहिर है कि हमारी सरकारें भले त्वरित कार्यबल, त्वरित कार्यवाही जैसी बातें करती हों, लेकिन वे सब आखिर में नौकरशाही के जाल में फंसकर रह जाती हैं। लोगों को त्वरित राहत देने का काम, सीमित संसाधनों के बावजूद जिस तेजी और जिस सटीकता से हमारे सामाजिक संगठन कर सकते हैं, सरकारें उसके बारे में सोच भी नहीं सकतीं। हमारी कल्पना में राज्य कल्याणकारी होगा और संकट या किसी भी आम समय में लोगों तक किसी भी तरह की राहत पहुंचाने का काम अंत में सरकारों को ही करना होगा। दुर्भाग्य से, इस समय हम अपने सामाजिक संगठनों की भूमिका को उपयुक्त नहीं पा रहे है | एक सदी पहले इस देश में जो सरकार थी या जो राज्य था, महामारी आने पर उसके हाथ-पांव फूल गए थे। बेशक, हालात अब उतने बुरे नहीं हैं। । अब प्राथमिकता इस रवैये को बदलने की ही होनी चाहिए, सरकार से बड़ा समाज है, उसे आगे आना चाहिये |

                                           राकेश दुबे

No comments:

Post a Comment