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Monday, March 22, 2021

मुख्यमंत्री की घोषणा हुई बेकार .नहीं हो सका रंगरेज घाट का जीर्णोद्धार...

 


रेवांचल टाईम्स :- मंडला मध्यप्रदेश की जीवनरेखा मां नर्मदा के तटों का विकास और जल को प्रदूषणमुक्त रखने का प्रयास मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में परिणामकारी ढंग से नहीं किया जा रहा है यही वजह है कि यहां पर मां नर्मदा के तटों का विकास रूक गया है और जल दिनों दिन प्रदूषित होता जा रहा है। सभी को ज्ञात है कि मां नर्मदा में जिला मुख्यालय मंडला में ही 16 गंदे नालों का पानी लगातार जल में विलीन होता जा रहा है। गंदगी दिनों दिन बढ़ती जा रही है। खुले आम शौच भी नर्मदा के तटों में किया जा रहा है। नर्मदा के घाट जर्जर हो गये हैं। पुराने घाटों की मरम्मत या नवनिर्माण का काम नहीं किया जा रहा है वहीं आवश्यक होने के बाद भी नये घाटों का निर्माणकार्य नहीं किया जा रहा है। कुल मिलाकर यहां पर विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जिला मुख्यालय मंडला में करीब एक दशक पुराना रंगरेज घाट की मरम्मत की मांग की जा रही है। बताया जा रहा है कि यहां पर रंगरेज याने रंगाई का कार्य किया जाता था इसलिये इस घाट का नाम रंगरेज हुआ है। किसी जमाने में इस घाट में परिक्रमावासियों का भी आनाजाना लगा रहता था। कई तरह के धार्मिक कार्यक्रम भी यहां पर होते रहते थे। लोगों के ठहरने के लिये भी धर्मशाला का निर्माण किया गया है। प्राचीन महत्व के इस घाट की लगातार उपेक्षा की जा रही है। फिलहाल यह घाट पुराने जमाने के पत्थरों पर टिका हुआ है लेकिन यहां पर अधिक गहराई होने की वजह से कई हादसे भी हो चुके हैं और हमेशा ही यहां पर खतरा बना होता है। इस घाट की मरम्मत के लिए आखिरकार ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा है यह जांच का विषय हो गया है। वर्ष 2014-15 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मंडला आए हुये थे और कई विकास कार्यों का शिलान्यास इनके द्वारा उस समय किया गया था तब घोषणा की गई थी कि 5 करोड़ रूपयों की लागत से रंगरेज घाट का नवनिर्माण किया जाएगा। यह घोषणा छ: साल बाद भी पूरी नहीं हो पायी ? घोषणा के बाद राशि तो स्वीकृत हुई लेकिन टेंडर की प्रक्रिया में यह घाट उलझ कर रह गया। टेंडर डालने वाले एक ठेकेदार ने मंडला के ठेकेदार के विरोध में हाईकोर्ट में याचिका लगा दी जिसके चलते इसके निर्माण कार्य में रोक लगा है। अब पता चला है कि ठेकेदार ने मामला वापिस ले लिया है। नगरीय प्रशासन विभाग ने जीर्णोद्धार निरस्त कर नए सिरे से जानकारी मांगी है। नगरीय निकाय मंडला में नर्मदा नदी के इस ऐतिहासिक महत्व वाले रंगरेज घाट को बुरी नजर लग गई है। राशि स्वीकृत हो जाने के बाद भी काफी लंबे समय बाद भी काम नहीं हो पाया और सबसे प्राचीन घाट दुर्दशा का शिकार हो गया है। यहां पर हर साल मिट्टी का कटाव हो रहा है। इससे समस्या और बढ़ रही है। सीढिय़ां टूट रही हैं और हादसे हो रहे हैं। यह घाट पक्का घाट था लेकिन समय की मार के चलते अब खोखला हो गया है। रंगरेजघाट का जीर्णोद्धार करने के लिए नगर पालिका परिषद मंडला द्वारा विधानसभा चुनाव के पूर्व जारी किये गये टेंडर में मिलीभगत का आरोप लगाकर टेंडर में तीन कंपनियों ने आवेदन किये थे लेकिन टेंडर मंडला के लोगों को दिया गया था। इस पर राजस्थान के ठेकेदारों ने टेंडर प्रक्रिया को चैलेंज करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी थी। आपत्तीकर्ता ठेकेदार ने याचिका लगाई थी कि जिस ठेकेदार का टेंडर पास किया गया है उसे पानी में काम करने का कोई अनुभव नहीं है। करीब तीन साल बाद मामला वापिस लिया गया है। अब क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद करीब दो करोड़ रू. नगरीय निकाय मंडला को दिये गये थे। बताया जा रहा है कि इस राशि से करीब एक करोड़ की राशि निर्माण कार्यों व अन्य मदों में उपयोग कर ली गई है। शासन स्तर से फिर से इसके टेंडर जारी किये जाते हैं रंगरेज घाट की मरम्मत कब होगी यह कहा नहीं जा सकता है। घोषणा की गई राशि स्वीकृत हुई और काम लटक गया। आखिरकार लापरवाही किसने की ? हाईकोर्ट जाने का रास्ता ठेकेदार के लिए क्यों तैयार किया गया ? नियमानुसार टेंडर प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं की ? उन तमाम नगरीय निकाय के अधिकारियों, कर्मचारियों के खिलाफ दण्डात्मक कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए जिनकी वजह से गलत तरीके से टेंडर प्रक्रिया पूरी की गयी और काम लटक गया। इस तरह से घोर लापरवाही सरकारी नुमांइदों द्वारा की जाती है और परिणाम नागरिकों को भुगतना पड़ता है। नागरिकों के अनुसार यदि सही तरीके से टेंडर दिया जाता तो शायद अब तक घाट का नवनिर्माण अब तक जरूर हो जाता। लेकिन सरकारी नुमांईंदों ने मुख्यमंत्री के प्रयासों और नगर की जनता की उम्मीदों पर पानी फेरने का पूरा प्रयास किया गया। तत्तकालीन सभी संबंधित अधिकारियों के खिलाफ दण्ड का विधान निश्चित होना चाहिये कि आखिरकार क्यों इस महत्वपूर्ण घाट के जीर्णोद्धार के लिए घोर लापरवाही बरती, विशेष ध्यान नहीं दिया और आज यह घाट बदहाली का शिकार दिखाई दे रहा है। लगातार इस आशय की खबरें भी प्रकाशित हो रही है। लेकिन किसी के कानों में जंू तक नहीं रेंग रही है। इस घाट की मरम्मत होना आवश्यक है साथ में नर्मदा घाटों के संपूर्ण विकास जरूरी हो गया है। नर्मदा जल को दूषित होने से बचाने के लिए परिणामकारी प्रयास करना आवश्यक हो गया है। नर्मदा तटों पर पर्यटन को बढ़ावा देने की दृष्टि से सभी धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों को विकसित करना भी जरूरी हो गया है। मां नर्मदा के तट पर स्थित सहस्त्रधारा जैसे कई स्थल आज भी उपेक्षित है। मंदिरों, आश्रमों की हालत खराब हो गयी है। हरियाली बढ़ाने के लिए समय पर कोई प्रयास नहंी किये जा रहे हैं। इस तरह से मां नर्मदा को उपेक्षित रखा जा रहा है। न नर्मदा भक्त जाग रहीं है और न सरकार। आखिरकार ये कब तक चलेगा लगभग सभी जानना चाह रहे हैं। इस तरह से पुरातात्विक महत्व के इस घाट को राशि स्वीकृत हो जाने के बाद भी संवारा नहीं गया। जिससे प्रतीत होता है कि सरकारी तंत्र इस तरह के कामों में कोई विशेष रूचि नहंी लेता है। यही वजह है कि इस जिले में विकास की गंगा नहीं बह पा रही है। ऐसे अनेक विकास कार्यों को रोककर रखा जाता है। जबकि विकास कार्यों के लिए सरकार अनाप शनाप धन खर्च कर रही है। आवंटित धन की यहां पर सिर्फ होली खेली जाती है। परिणाम सभी को ज्ञात है। आजादी के कई साल बाद भी यदि इस जिले से पिछड़ेपन का कलंक नहंी मिट पाया है तो उसकी मुख्य वजह यहां के नेताओं की निष्क्रियता और शासन प्रशासन की बेहोशी ही है। तमाम तरह की समस्याएं इस जिले में मौजूद हैं। जिनके निराकरण के लिए इसी तरह की लापरवाही बरती जाती है। सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही सरकारी योजनाओं को हकीकत के धरातल में क्रियान्वित करने के लिए घातक सिद्ध हो रही है। विकास कार्यों में यहां पर मनमानी, लापरवाही और धांधली पूर्णत: बंद की जाए। नर्मदा तट के रंगरेज घाट का जीर्णोद्धार आवश्यक रूप से कराते हुए संपूर्ण जिले में विकास को लगे ग्रहण को मुक्त किया जाऐ और यहां पर भ्रष्टाचार की नहीं बल्कि विकास की गंगा बहाई जाए। जनापेक्षा है कि समाज और सरकार दोनों ध्यान दे।

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