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Wednesday, November 25, 2020

देवउठनी एकादशी और उसकी मान्यताएं


   

रेवांचल टाईम्स - कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारस तिथि को देवउठनी एकादशी कहा जाता है । इस वर्ष यह पुण्यतिथि 25 -11 -2020 दिवस बुधवार को मनाई जाएगी ।

         आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तक भगवान श्री हरि योग निद्रा में विश्राम करते हैं । इसी काल को चतुर्मास कहा जाता है ।जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पूर्ण होता है। इसलिए इसे देवउठनी ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है ।

         पौराणिक मान्यता के अनुसार आदिकाल में शंख चूर्ण नामक परम शक्तिशाली दानव हुआ। जिनकी पत्नी का नाम वृंदा था। वृंदा भी परम पतिव्रता एवं सतीत्व का पालन करने वाली नारी थी। शंख चूर्ण अपने शक्ति के बल पर धरती आकाश और पाताल तीनों लोगों में हाहाकार मचाने लगा ।वृंदा की सतीत्व के कारण शंख चूर्ण दैत्य का वध करना आसान नहीं था अतः श्री हरि ने छल से उसका सतीत्व भंग किया ' तभी शिव जी ने उस शक्तिशाली दैत्य का वध कर दिया था इस छल के लिए वृंदा ने श्री हरि को श्राप दे दिया और शिला रूप में परिवर्तित कर दिया था। जिसे शालिग्राम कहा जाता है। उसके पश्चात वृंदा ने कठोर तप करके उन्हें अपने पति के रूप में मांग लिया वृंदा ने तुलसी के रूप में जन्म लिया और श्री हरि शालिग्राम के रूप में तुलसी को अपनी पत्नी रूप में स्वीकार किया तब से तुलसी विवाह उपरांत ही सभी मांगलिक कार्य जैसे शादी ' विवाह 'सगाई 'गृह प्रवेश आदि प्रारंभ हो जाते हैं यह वही तुलसी है जिसे आयुर्वेद के ज्ञाता महर्षि चरक ने अमृ तोपमबताया है ।

  ओम श्री तुल सै .विद्मते 'विष्णु प्रियाए धीमहि 'तन्नो वृंदा प्रचोदयात् ।इस मंत्र से श्री तुलसी जी की पूजा करनी चाहिए ।

 रेवांचल टाइम्स मवई से मदन चक्रवर्ती

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