मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित वारी ग्राम का सुप्रसिद्ध मां का मदिर वारी-खराड़ी में लगा भक्तो का तांता
रेवांचल टाइम्स - पाढरीपाठ मंदिर लोगों में आस्था का गहरा प्रतीक बानकर उभरा है, आज मंदिर की भव्यता मातारानी की शक्ति का बखान कर रहा है। इस मंदिर में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है और अपनी सिद्धि के कारण सिद्धपीठ के नाम से यह शक्ति स्थल उभर रहा है, मां की शक्ति और आषीर्वाद का उदाहरण स्वयं इस मंदिर के पुजारी रेखलाल कावरे है जिन्हे माता के आषीर्वाद के कारण नया जीवनदान मिला, इसके अलावा ऐसे अनेक उदाहरण है जो वारी खराड़ी मंदिर के मनोकामना पूर्ति होने के गवाह है।
दुर्ग मुख्य मार्ग से लगभग 03 किलोमीटर दूर वारी बांध के तट पर बने इस मंदिर का मनोरम दृष्य अपने आप में प्रकृति के सौंदर्य का बखान करता हुआ भक्तों की आध्यात्मिक शांति में वृद्धि का भी परिचायक है। वहीं स्वच्छंद वातावरण में पक्षियो का कलरव, गौ-माता का सानिध्य और सेवकों का सेवाभाव धार्मिक अनुभूति कराने में सर्वसमर्थ है। इस मंदिर का जितना बखान किया जाए कम है, अनंत है।
- जब मां के आषिर्वाद ने मौत को हराया
इस शक्तिपीठ का परिचय लोगों में उस वक्त था जब लोग पास ही पिकनिक स्पाॅट पर आया करते थे हालांकि उसके बाद यहां के वर्तमान पुजारी रेखलाल कावरे के साथ हुए भयावह हादसे ने लोगों के जेहन में आस्था का ज्वार निर्मित करने में कोई कोर-कसर ना छोड़ी आखिर मां पांढरीपाठ के आषिर्वाद से मौत के मुंह से वापस जो आए थे और आज अपनी सर्वस्व सेवाभाव पूरी लगन के साथ माता के चरणों में समर्पित करते आ रहे है। पुजारी रेखलाल कावरे की माता के प्रति निष्ठा और सेवाभाव के चलते उनके विरोधी भी आज माता की शक्ति के सामने स्वयं नतमस्तक है।
- अदभुत शक्तिपीठ भव्य मंदिर
आज से लगभग 21 वर्ष पहले तक पहाड़ी पर बने इस मंदिर में देवी मां के दर्षन करने के लिए भारी मषक्कत करनी पड़ती थी, कोई सिढ़ियां आदि नहीं थी लेकिन जिसे तकलीफ होती अपनी मनोकामना लेकर पंहुचता और मातारानी के आषिर्वाद से भक्तों के सहयोग से मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। बांध के किनारे पहाड़ी पर बना मंदिर, विषालकाय कलष कक्ष, सभागार, मंदिर गुंबद, सिढ़ियों किनारे बने भैरव व हनुमान मंदिर, नहर का कलरव करता पानी, गौषाला, अन्नपूर्णा रसोई, कबूतरखाना, खरगोष घर आदि मंदिर की भव्यता को परिपूर्णता की ओर अग्रसर और भव्यता को निखारते जा रहे है।
- जिले में सर्वाधिक कलष स्थापना
बालाघाट में स्थित धर्मनगरी लांजी में वारी मंदिर में इस शारदेय नवरात्रि पर लगभग 1221 ज्योति कलषों की स्थापना की गई है जो वर्तमान में संपूर्ण जिले में सर्वाधिक कलष स्थापना है। मंदिर के संरक्षक डाॅ. सुधीर दषरिया का कहना है कि लोगों की आस्था के चलते यह संभव हो पाया।
- ऐसा है सेवाभाव कार्यक्रम
मंदिर में रेखलाल कावरे मुख्य पुजारी के रूप में सेवा देते है तो वहीं डाॅ. सुधीर दषरिया द्वारा संरक्षक के तौर पर अपनी विषेष सेवा व समय देते है। इसके अलावा मंदिर में 25 गौ-सेवक है जो गौ-माता की सेवा में समर्पित है, प्रतिदिन रसोई में लगभग 11 महिलाएं प्रबंधन कार्य करती है, पूजा सेवा कर्म में 05 लोगों द्वारा सहयोग किया जाता है, विषेष उल्लेखनीय है कि समस्त वारी ग्राम उक्त मंदिर में अपनी सेवाएं देता है मानो पूरा ग्राम ही भक्तिमय होकर माता की सेवा में जुटा हुआ है। मंदिर परिसर में लगभग 250 भक्तों के ठहरने का प्रबंध है जो अपने आप में अनूठा है तो वही भक्तों आदि के लिए स्वल्पाहार, चाय, दोनो समय के भोजन के लिए अन्नपूर्णा रसोई, पंखे, कूलर के साथ ही 20 गाय, 12 बछड़े, कबूतरों का विषालकाय समूह, खरगोष, लव बर्ड, बागवानी के अलावा अनेक अदभुत सेवाभाव कार्य निरंतर चलते रहते है।
- इनका विषेष योगदान
मंगलवार और शुक्रवार को वारी खराड़ी के पांढरीपाठ मंदिर में विषेष पूजन-अर्चन का दिन होता है, क्रमबद्ध तरीके से ही पूजन दर्षन किए जा सकते है, ऐसे में इस कार्य के प्रबंधन हेतु सत्या पांचे, धर्मेंद्र पांचे, अनिल कावरे द्वारा कर्तव्य निर्वहन किया जाता है। मुख्य मार्ग से मंदिर तक भक्तो के आने जाने के लिए निःषुल्क वाहन की व्यवस्था है जिसमें वाहन चालक पिंटू द्वारा सेवा दी जाती है। मंदिर में विभिन्न व्यवस्थाओं आदि के लिए लीलाराम मानकर, रामदास खरे, ऋषि पटेल दषरिया, धनीराम इनवाती, श्रीचंद कावरे, हिरेलाल
चैधरी, षिवप्रसाद मातरे, कालूराम पांचे, बेनीराम इनवाती, अनिल कावरे, नारायण पंजरे, सुनील कावरे एवं समस्त ग्रामवासियों का योगदान रहता है।
रेवांचल टाइम्स बालाघाट से खेमराज बनाफरे की रिपोर्ट


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