BREAKING
जवाहर नवोदय विद्यालय से दो छात्र लापता | एमपी में बड़ा प्रशासनिक फैसला | जबलपुर में सनसनीखेज वारदात
इस दुष्काल में बच्चो के लिए एक नया द्वार - revanchal times new

revanchal times new

निष्पक्ष एवं सत्य का प्रवर्तक

Breaking

aaj ka akhbar padhen

आज का ई-पेपर

पूरा अखबार पढ़ने के लिए नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करें।

ई-पेपर Viewer

Thursday, October 15, 2020

इस दुष्काल में बच्चो के लिए एक नया द्वार

रेवांचल टाइम्स डेस्क - स्कूल खोलने न खोलने को लेकर बहस जारी है | आने वाले कुछ दिन इस कवायद के नतीजे बतायेंगे | हम बच्चों को स्कूल सीखने के लिए भेजते हैं | वे क्या बड़े-बूढ़े तक, इस दुष्काल में घर में रह कर कुछ नये शब्द सीख गये हैं | ये हैं पेंडेमिक, इन्क्यूबेशन, एरोसोल्स, शोसल डिस्टेंसिंग, लॉकडाउन, सेनेटाइज, क्वारंटाइन, आइसोलेशन इनसे हम चाहे कितना ही घृणा करें, लेकिन ये शब्द विश्व के जन जीवन का हिस्सा बन गये हैं। लगभग साल पूरा होने जा रहा है, दिन में कई बार उक्त शब्दों का कहीं न कहीं प्रयोग होता ही है। रोजाना किसी न किसी माध्यम से-चाहे वह अखबार हो, टेलीविजन, मित्र या फिर परिवार का कोई सदस्य-इन शब्दों को पढ़ता, सुनता या इस्तेमाल करता ही है । बच्चे तो इस दुष्काल में उपजे ऐसे अनेक शब्दों का उच्चारण और प्रयोग बखूबी सीख गए हैं। ऐसे में बच्चों की इस प्रतिभा को देखते हुए अगर उन्हें नयी भाषा सीखने में लगाया जाये तो उसमें बुराई क्या है? भारत की बहुत सी समस्याएं भाषा के कारण ही है | एक भाषा का आग्रह और दूसरी का तिरस्कार की जो भावना देश में बलवती है, उससे निजात आगामी पीढ़ी दिला सकती है, बशर्ते हम उन्हें सही दिशा दें |

         बच्चे अपने आसपास, अपने परिवेश से बहुत प्रभावित होते हैं और उससे निरंतर कुछ न कुछ सीखते रहते हैं और यह बात भाषा पर भी लागू होती है। तो ऐसे में बच्चों की भाषा सीखने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को मात्र कोरोना की शब्दावली तक सीमित क्यों रखा जाये? इस संक्रमणकाल में, जबकि बच्चों के जीवन में रचनात्मक कार्यों की पहले के मुकाबले काफी कमी आई है और वे अपना अधिकांश समय घर की चारदीवारी में रहकर व्यतीत करते हैं क्यों ना उन्हें एक नयी भाषा सीखने का मौका दिया जाये? सबसे पहले अपनी परिवार की बोली और भाषा से इतर देश के किसी अन्य प्रान्त की भाषा |फिर कोई एक विदेशी भाषा |

वर्तमान दौर में अगर बच्चे नयी भाषा सीखने की ओर उन्मुख होंगे तो इससे न केवल महामारी की विभीषिका के प्रति उनका ध्यान हटेगा, बल्कि भविष्य में यह उनके लिए वरदान भी साबित होगा। यूं भी देखा जाता है कि बच्चे नयी संस्कृति, नयी जीवनशैली, पहनावे, खान-पान और रहन-सहन के प्रति एक विशेष आकर्षण रखते हैं। इन सबके लिए उनमें एक स्वाभाविक जिज्ञासा और रुचि होती है और नयी भाषा का ज्ञान उन्हें इन बातों को समझने और उनसे जुड़ने का मौका देता है। यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे बच्चे अपने पसंदीदा कार्टून चरित्रों के माध्यम से नयी संस्कृतियों के बारे में जानते और सीखते हैं।

          बच्चे जानते है कि ‘डोरेमोन’ से जापान की जीवनशैली का पता चलता है तो ‘ओग्गी एंड द कोक्रोचिस’ में फ्रांसीसी सभ्यता की झलक देखने को मिलती है और दुनिया के सबसे पुराने कार्टून चरित्रों में से एक ‘मिक्की माउस’ से अमेरिकी जीवन से जुड़ जानकारियों से रूबरू होने का मौका मिलता है। भारत के प्रान्तों में भी ऐसी सीरिज बने और व्यापक रूप से प्रसारित हो | वैसे एक नयी भाषा सीखना कार्टून देखने जैसा सरल कार्य नहीं है, इसके लिए एकाग्रता और समर्पण की आवश्यकता होती है। जब बच्चों द्वारा नयी भाषा सीखने की सीमा आकाश तक होती है। भाषा के विशेषज्ञ तो यहां तक मानते हैं कि द्विभाषी या बहुभाषी होना मस्तिष्क के लिए बहुत फायदेमंद होता है और एक से अधिक भाषा सीखने वाले की मानसिक सक्रियता और कार्य क्षमता पर सकारात्मक एवं सार्थक प्रभाव डालता है। इस तरह के कई शोध हो चुके हैं कि अगर बच्चे को एक से अधिक भाषाएं आती हैं तो उसके सोचने का ढंग भी विस्तृत होता है।

देशी भाषाओँ का अध्ययन देश के विकास में मददगार होगा तो विदेशी भाषाओं जैसे कि फ्रेंच, जर्मन या अग्रेजी में निपुणता विदेश मंत्रालयों, दूतावासों, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, एयरलाइंस, ब्रॉडकास्ट मीडिया, पब्लिशिंग आदि क्षेत्रों में अनेक अवसर खोल सकती  है। आईटी, मल्टीनेशनल कंपनियों, होटल एवं बीपीओ क्षेत्र में तो बहुभाषी युवाओ को बेहतर अवसर हैं। कुछ अभिभावक अपनी महत्वाकांक्षाओं और स्वार्थ के चलते बच्चों पर जल्दी सीखने और अच्छे परिणाम लाने का मानसिक दबाव बनाने लगते हैं। बच्चों पर प्रेशर बनाना या कुछ नया सीखने के उनके प्रयास को लेकर उन्हें डांटना बिल्कुल उचित नहीं। बात जब नयी भाषा को सीखने की होती है तो उस प्रक्रिया में गलतियां होना स्वाभाविक है। बेशक अभी कोरोना काल चल रहा है, लेकिन भाषायी दरवाजे तो हमेशा बुलंद ही रहेंगे।

                                      राकेश दुबे

No comments:

Post a Comment