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Friday, October 9, 2020

संयुक्त संचालक, लोकशिक्षण जबलपुर के माध्यमिक शिक्षक की नियुक्ति निरस्त करने वाले आदेश दिनांक 15/07/2020 , को हाई कोर्ट, जबलपुर ने किया स्टे-


रेवांचल टाइम्स - मध्यप्रदेश राज्य शिक्षा सेवा, शैक्षणिक संवर्ग सेवा शर्ते एवं भर्ती नियम 2018 के नियम 4 एवं 5 के तहत , जिला स्तरीय चयन समिति के अनुशंसा के आधार पर, कुमारी प्रतिभा दुबे को माध्यमिक शिक्षक के पद पर , शासकीय हाई स्कूल गंगा टोला, जिला सिवनी में, नियुक्ति दी गई थी।  मूल रूप से पंचायत अध्यापक होते हुए, उनकी पदस्थापना आदिवासी विकास की शाला में नवीन संवर्ग में ,नियुक्ति के पूर्व थी। राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा संचालित चयन प्रक्रिया आधार पर, उन्हें सर्व शिक्षा अभियान में स्कूल शिक्षा विभाग की शालाओं में कार्य करने हेतु प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया था। भर्ती नियम 2018 में प्रभाव में आने के पश्चात , पंचायत अध्यापक मानते गए, भर्ती नियमों के अधीन, दिनांक  06/07/19 को माध्यमिक शिक्षक के पद पर,  नियुक्ति दी गई थी। किन्ही राजनैतिक आपत्ति जैसे सम्बन्धित अध्यापक ट्राइबल विभाग में कार्यरत थे,  प्रतिभा दुबे सहित अन्य शिक्षकों की नियुक्ति , संयुक्त संचालक, लोक शिक्षण जबलपुर संभाग द्वारा , दिनांक 15/07/2020 को नियुक्ति निरस्त कर दी गई थी। 


      सम्बंधित माध्यमिक शिक्षक द्वारा, आदेश दिनांक 15/07/2020  को हाई कोर्ट जबलपुर के समक्ष चुनौती दी गई थी।  याचिककर्ता के वकील श्री अमित चतुर्वेदी, उच्च न्यायालय, जबलपुर ने बताया कि सुनवाई के दौरान,हाई कोर्ट का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया गया था कि, चयन समिति की अनुशंसा के अनुपालन में, चयन के पश्चात नियुक्ति एवम नियुक्ति  आदेश का निष्पादन, कर्मचारी के पक्ष में उस पद को धारित करने का अधिकार उत्पन्न करता है। अतः नियुक्ति को निरस्त करने वाला आदेश, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के अतिक्रमण में, प्रारंभ से अवैध है।  इसके अलावा, शैक्षणिक संवर्ग का निर्माण, पंचायत विभाग में कार्यरत अध्यापकों एवं नगरीय प्रशासन में कार्यरत अध्यापकों एवं सीधी भर्ती एवम पद्दोन्नति द्वारा होता है। भर्ती नियम आदिवासी विकास के नाम से बनाये जाने पर,  पंचायत अध्यापकों को नियुक्ति के चुनाव से इस आधार पर, वंचित नही किया जा सकता है कि उनकी पदस्थापना ट्राइबल के विद्यालयों में थी। पंचायत अध्यापक को एक विशेष विभाग का चुनाव करने के लिए बाध्य करना अवैध है।


     इसके अलावा, कोर्ट को  बताया गया कि आदिवासी विकास के अधीन कार्यरत अध्यापकों की पूर्व में राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा  डेपुटेशन पर नियुक्ति  एवं प्रतिनियुक्ति की अवधि समाप्त होने पर, अध्यापकों को कॉउंसिल के माध्यम से स्कूल शिक्षा या आदिवासी विकास की शालाओं में पदस्थापित होने का विकल्प दिया जाता था। प्रमोशन के पश्चात, पदस्थापना के समय भी उनके पास, आदिवासी विकास या स्कूल शिक्षा की शालाओं में जानें का विकल्प होता था। उक्त सुविधा का आधार उनका पंचायत अध्यापक होना था।  


     कोर्ट ने प्रथम दृष्टया, अधिवक्ता अमित चतुर्वेदी के तर्कों से सहमत होते हुए एवं शासन की बात को अस्वीकार करते हुए की सम्बन्धित माध्यमिक शिक्षक की मूल पदस्थापना आदिवासी विकास की शाला में थी, नियुक्ति निरस्त करने वाले, संयुक्त संचालक लोकशिक्षण जबलपुर द्वारा जारी आदेश दिनांक 15/07/2020 को स्टे कर, दिनाँक 06/07/2020, विभाग को नोटिस जारी किये हैं।

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