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Saturday, September 26, 2020

जल्दबाजी में लाये बिलों से सरकार ने क्या खोया ?


रेवांचल टाइम्स - संसद में जल्दबाजी में पारित 3कृषि विधेयकों के खिलाफ किसानों का भारत बंद, कुछ राज्यों में जोरदार तो कुछ में ढीला रहा | सबसे ज्यादा असर पंजाब और हरियाणा में देखने को मिला। पंजाब में अमृतसर, फरीदकोट समेत कई शहरों में किसान रेलवे ट्रैक पर बैठे दिखे | रेलवे ने पंजाब जाने वाली 13 जोड़ी ट्रेनों को पंजाब पहुंचने से पहले ही रद्द कर दिया| इसके अलावा 14 ट्रेनों को निरस्त कर दिया है | वैसे जिस तरह बहुमत के बल पर जल्दबाजी से तीन कृषि अध्यादेशों को नये कानूनों में बदला गया है,उसका विरोध भी प्रजातंत्र में आस्था रखने वाले लोग कर रहे हैं|

  इस सम्पूर्ण घटनाक्रम से हमारी संसदीय लोकतांत्रिक पद्धति के भविष्य को लेकर कई सवाल पैदा होते हैं।जैसे  विपक्ष की आवाज़ को अनसुना कर दिया जाना। वास्तव में यह मुद्दों पर सार्थक बहस न होने देने वाली ताकत का निर्लज्ज नमूना ही तो  है। स्थापित संसदीय प्रक्रिया को दरकिनार करने वाले प्रसंग को जनता आसानी से कहाँ भूलने वाली है । अब तक स्थापित परंपरा यही  है कि सरकार सदन में कानून का मसौदा रखते वक्त इसकी उपयोगिता गिनाती है और चर्चा होती है, किंतु पिछले कुछ वक्त से बहस करवाने की जरूरी प्रक्रिया की अनदेखी करते हुए विधायी प्रक्रिया का ह्रास करना नित्यक्रम हो गया है। यह दृश्य राज्य विधान सभा में तो आम हो गया है | सदन के सत्रावसान का उपयोग “वीटो पावर “की तरह होने लगा है |

इन हरकतों से लोकतांत्रिक और नैतिक वैधता बेमानी होती जा रही  है। साफ है, लोकतंत्र में कोई ऐसा कानून, जिसे सरकार जोर-जबरदस्ती से लाद कर यह कहे कि जनता खुशी से कबूल रही है और पालना करेगी, तो यह दावा करना सही नहीं,बल्कि चिंगारी को हवा देना  है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि स्वतंत्र भारत के जीवट कृषक समुदाय की प्रतिष्ठा कायम करने के स्थान पर सरकार उसे वोट बैंक समझती है | सब यह जानते हैं कि किसी कानून की प्रभावशीलता उसके न्यायोचित होने और सार्थकता महसूस करने पर आधारित होती है। पहले से ही कोविड-19 महामारी से बनी अति विकट स्थितियों के बावजूद नये विवादित कृषि कानूनों को लेकर आज सड़कों पर जनाक्रोश देखने को मिल रहा है  |पंजाब के मुख्यमंत्री इस प्रतिक्रिया ने कि “जिस तरह संसद में कानूनों को धक्के से पारित करवाया गया है, उसे न्यायलय में चुनौती दी जाएगी "। यह भारतीय संघीय व्यवस्था के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं  है।

          नये कृषि कानूनों और पारित करने के तरीके  का विरोध देशभर में हो रहा है और भिन्न राजनीतिक विचारधारा वाले दल इन्हें बनाने एवं लागू करने के  खिलाफ हैं| कांग्रेस, डीएमके, तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, बीजेडी, आरजेडी, टीआरसी, शिरोमणि अकाली दल और वाम दलों ने अपना पक्ष रखते हुए मांग की  है कि तीनों कानूनों को राज्यसभा के चुनींदा सदस्यों वाली समिति के पास विस्तृत पुनः समीक्षा के लिए भेजा जाए। होना तो यह चाहिए था, विपक्ष शासित राज्य सरकारों और संबंधित पक्षों से पहले समर्थन जुटाया जाता |

 

         नये कानूनों का निर्मम होना और फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था हटने की आशंका से किसानों में इसके प्रति धारणा घातक होने वाली बन गई है। कुल मिलाकर किसानों को डर है कि मूल्य निर्धारण, बाजार के मुक्त खेल के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया है।

तर्क के लिए यह मान भी लें किसानों में इन कानूनों के लेकर बनी धारणा मात्र गलतफहमी है तो यह सरकार का दायित्व  था कि वह उनकी स्वीकार्यता बनाने को सही और संपूर्ण जानकारी मुहैया करवाती, लेकिन यह नहीं किया गया। इसके विपरीत केवल खुद को सही समझने वाली सरकार अपने निर्णयों को सही सिद्ध करने पर अड़ी है।सरकार का प्रदर्शन संसद के अंदर और बाहर ऐसा ही दिखा | ऐसे में ही अपने ही देश के नागरिकों के हितों से खिलवाड़ करने वाली सरकार शासन करने का नैतिक हक खो बैठती है। जरूरत महत्वपूर्ण मुद्दों पर बृहद राष्ट्रीय सहमति बनाने के लिए उभयनिष्ठ बिंदुओं की पहचान है , जिसमें कृषि-आर्थिकी को बदलने से संबंधित मामले भी शामिल हो । सरकार को लगातार उसकी घटती जा रही सहानुभूति और संवेदना को नहीं भूलना चाहिए है, यही क्रिया मानवता को परिभाषित करती है।

                                      राकेश दुबे

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