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Wednesday, August 5, 2020

मन्दिर हो, व्यवस्थित हो, ठेकेदारी न हो



रेवांचल टाइम्स डेस्क - देश के राम मर्मग्य संतों की पहली पंक्ति में स्थान रखने वाले पंडित राम किंकर उपाध्याय को 1978 से 1980 के बीच बहुत नजदीक से सुनने का मौका मिला | तब मैं उनके प्रवचन को समाचार के रूप में दैनिक नवभारत भोपाल में लिखता था | संवाददाता था, तत्कालीन सम्पादक स्व. त्रिभुवन यादव ने मुझे इस काम के लिए तैनात किया था |निरंतर मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुणगान में से अपने को राम के दो स्वरूप तत्समय समझ आये थे | पहला- राम सर्व समावेशी थे, दूसरा –अपना सब परपीड़ा निवारण में लगाना चाहते थे | आज मौका है, अपनी बात कहने का | विनम्र निवेदन है – राम के मन्दिर के निर्माण में ये दो गुण ओझल हो रहे हैं, अभी समय है कुछ हो सकता है | कीजिये, आगे राम की मर्जी |
         भारतीय वाड्.मय में वर्णित देवताओं में सिर्फ राम तक ही, राजा सुग्रीव से लेकर शबरी की पहुँच सुलभ थी | आज भी जब किसी के अंतिम प्रयाण की बात होती है, तो मंजिल “राम का धाम” होती है | सबके राम सबको सुलभ | मैं ही नहीं देश के करोड़ों जन ह्रदय से राम मन्दिर का निर्माण चाहते हैं | व्यवस्थित चाहते हैं पर ऐसे नहीं चाहते जैसे शुभारम्भ हो रहा है | राम के धाम से न्यौते चीन्ह-चिन्ह कर दिए गये हैं | न्यौते का सम्मान  रख कर संघर्ष के योद्धा अयोध्या तो पहुंचे, पर सरयू के किनारे चहलकदमी कर रहे हैं | तर्क वय,बुद्धि,रूचि और कोरोना तक के दिए गये, पूरी विनम्रता के साथ फिर निवेदन, ये तर्क गले नहीं उतरे |
        राम के सर्व समावेशी के गुण को ध्यान में रख कर सूची बनाई जाती तो उसमें देश के चोटी के वैज्ञानिको का नाम होता, ख्यातनाम बैंकर के नाम होते, न्यायपालिका से कोई न्यायमूर्ति शोभित होती, ख्यातनाम शिक्षाविद होते,कोई गुरु सिंघ सभा का बन्दा होता, आपके पसंदीदा उद्ध्योगपति के साथ इक़बाल अंसारी भी हो सकते थे | पता नहीं किस दृष्टि से बनी यह सूची सर्व समावेशी होने के स्थान पर एकांगी हो गई | मंच की सीमा हो सकती है, कार्यक्रम की मर्यादा भी | सब राम नहीं हो सकते, राम जैसे बनने की कोशिश तो कर सकते हैं |
राम किंकर जी ने दूसरा स्वरूप समझाते हुए एक श्लोक पढ़ा था |  " न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्ग न पुनर्भवम।।कामये दुख ऋतानां केवलमार्सि्त्रनाशनम"।। इसका शब्दार्थ कुछ इस तरह है - न राज्य चाहता  हूं ,न स्वर्ग ,न पुनर्जन्म के चक्कर से मुक्ति, मैं केवल दुखियों के पीड़ा निवारण का अवसर चाहता  हूं | जिस राम के जीवन का यह उद्देश्य हो उसका मन्दिर तो सबके लिए सदैव खुला रहना चाहिए | अभी से आसार टिकट, वी आई पी दर्शन, प्रतिमा से पास -दूर का शुल्क जैसे क्रियाकलापों के नजर आ रहे हैं | ये सब इस मंदिर में बदलना चाहिए | इससे कोई और लाभ हो न हो, इतना होगा राजा  सुग्रीव से लेकर शबरी तक अपने मन की बात अपने राम से कह सकेंगे |



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यह स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं है कि वास्तु विद्या में मेरा ज्ञान दिशाबोध से अधिक नहीं है | फिर भी मन्दिर के वास्तुविद चन्द्रकांत सोमपुरा से क्षमा याचना सहित निवेदन | जिस देवता के मन्दिर की आप रचना कर रहे हैं | उनके दो उपरोक्त दो गुण सर्व विदित हैं, गुण के आधार पर बनी एक संरचना की ओर सबका ध्यान दिलाता हूँ |बिड़ला परिवार सरकार की चहेती सूची में नहीं है, पर  उसके द्वारा बिट्स पिलानी में बनवाया गया सरस्वती मन्दिर विश्व की चहेती सूची में हैं | हो सकता है, सोमपुरा जी ने देखा हो | खजुराहो के कंदरिया  महादेव के मन्दिर की इस प्रतिकृति में प्रेमालाप में रत मूर्तियों के स्थान पर देवी-देवता,विश्व के दार्शनिक, संत समाज सेवी,वैगयानिको की 1267 मूर्तियां हैं | राम के मन्दिर से करुणा बरसे ऐसा प्रबंध अपेक्षित है |
अंत में फिर एक बात | पूरे मन से मन्दिर निर्माण की पक्षधरता के विनम्र निवेदन, राम जी के गुण पर विचार कीजिये ये मन की नहीं जन की बात है |  कुछ लोग जन की ठेकेदारी इस  बहाने से हथियाना भी चाह रहे हैं | उन्हें रामजी के हवाले छोड़ता हूँ | भली करेंगे राम |       
                                                राकेश दुबे

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