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Wednesday, August 26, 2020

खिलौने तो अब दूर की कौड़ी हो रहे हैं



रेवांचल टाइम्स डेस्क - मशहूर शायर कैसर उल जाफरी की एक गजल का शेर है – “ माँ बाप भी रोये थे आकर के अकेले में,मिटटी के खिलौने भी सस्ते [मय्यसर]  न थे मेले में”| जी हाँ ! अब मिटटी के खिलौने बनना बंद हो गये और बाजार विदेश और खास कर चीन से आयातित खिलौनों से पटा पड़ा है | ये खिलौने बच्चों को जान से मंहगे साबित हो रहे हैं | एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन व कुछ अन्य देशों से आनेवाले खिलौनों में हानिकारक रसायन मौजूद हैं|

      इस बात को सब भलीभांति जानते हैं कि बड़ी आबादी होने की वजह से भारत खिलौनों का भी बड़ा बाजार है| साल 2019-20 की अवधि में लगभग चार हजार करोड़ रुपये मूल्य के खिलौने विदेशों से आयात किये गये थे, जिनमें से 70 प्रतिशत के आसपास चीनी खिलौने थे| कुछ खिलौना व्यापारियों का मानना है कि यह मात्रा अधिक भी हो सकती है, क्योंकि कुछ खिलौने अन्य श्रेणियों में या पुर्जों के रूप में भी मंगाये जाते हैं| यह भी आशंका जतायी जाती रही है कि कई अन्य चीजों की तरह भारतीय बाजार को सस्ते खिलौने से पाटने की कोशिश भी चीन की ओर से होती है| यह इन दिनों कुछ ज्यादा हो भी रही है |

           इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि एक समय भारत में न केवल हर घर में खिलौने बनते थे, बल्कि  यहाँ से बने खिलौने विश्व में अनेक जगह पर निर्यात भी होते  थे |इनमें मिटटी, कागज, कपड़े,पत्त्थर और लकड़ी से बने खिलौने होते थे |आज  भारतीय खिलौनों के निर्यात की तुलना में आयात चार गुना अधिक है| सरकार की इस विषय पर कोई स्पष्ट नीति नहीं है, यदि भारतीय खिलौनों के विकास पर सरकार और समाज की ओर समुचित ध्यान दिया जाता है,तो  इससे पारंपरिक दस्तकारी को भी बढ़ावा मिलेगा और उन खिलौनों के साथ जुड़े सांस्कृतिक आयामों को भी बच्चों को परिचित कराया जा सकेगा| इससे रोजगार और आय का रास्ता भी खुलेगा|
         एक और शबे बड़ा पहलू स्वास्थ्य और पर्यावरण का है|आयातित खिलौनों में इस्तेमाल होनेवाले पदार्थ बच्चों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहे  हैं तथा वातावरण में प्रदूषण को बढ़ाने का भी एक कारण साबित हुए हैं| ऐसे अध्ययन हमारे सामने हैं, जिनमें बताया गया है कि चीन व कुछ अन्य देशों से आनेवाले खिलौनों में हानिकारक रसायन मौजूद हैं| इनकी तुलना में परंपरागत खिलौने हर तरह से सुरक्षित हैं और औद्योगिक स्तर पर बननेवाले खिलौनों पर संबद्ध सरकारी विभाग निगरानी कर गुणवत्ता को सुनिश्चित कर सकते हैं|

           सरकार भी फैसले अजीबोगरीब लेती है| अपने  खिलौना निर्माण तंत्र को मजबूत करने और विदेशी खिलौना तन्त्र को हतोत्साहित करने के स्थान पर सरकार ने जो फैसला किया है, उसकी हर तरफ आलोचना हो रही है | केंद्र सरकार ने यह निर्णय किया है कि भारतीय गुणवत्ता ब्यूरो के अधिकारी सात बंदरगाहों पर तैनात किये जायेंगे, जिनकी जिम्मेदारी खिलौनों की जांच करना होगी| इसी निर्णय का अंग यह भी है कि निर्धारित मानकों पर खरे उतरने के बाद ही खिलौनों को देश में लाने की अनुमति दी जायेगी| इस प्रक्रिया में विदेशों में स्थित खिलौनों के उन कारखानों का भी मुआयना करना शामिल है, जहां से उन्हें आयात किया जाता है| सामान्य सी बात है, इससे खिलौने और महंगे होंगे |इससे घटिया सामान भेजने और लाने की भ्रष्ट और लापरवाह कोशिशों पर लगाम लगने की उम्मीद व्यर्थ  है| इससे भ्रष्टाचार के नये आयाम और पनपेंगे |
        होना यह चाहिए की इसके लिए एक पृथक नीति बने जो  घरेलू उद्योगों और उद्यमिता पर ध्यान देकर ही आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की और इस खिलौना उद्द्योग ओ अग्रेषित करे तथा खिलौना निर्यात को बढ़ावा दे | एक नया आयाम और भी है जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने रेखांकित किया है, नयी पीढ़ी की रुचियों के मुताबिक डिजिटल गेम के क्षेत्र में ज्यादा तेजी से  काम  क्या जाये करने  तथा उसमें भी पौराणिक और लोक कथाओं को आधार बनाया जाये | यह हो सकता है, पर पहला कदम तो सरकार को चलना है, वो भी पूरी शिद्दत के साथ |
                                                राकेश दुबे
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