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Sunday, 5 July 2020

ऐसे में कौन छात्र उत्तम और कौन फिसड्डी ?

रेवांचल टाइम्स - कल माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्यप्रदेश आयोजित परीक्षा कक्षा दस के परिणाम आये, इसमें 15 विद्ध्यार्थी 100 में 100 अंक लाये हैं | केंद्रीय शिक्षा मंडल भी इस कक्षा की परीक्षा को आयोजित करता है,केन्द्रीय शिक्षा मंडल से उत्तीर्ण विद्ध्यार्थी और मध्यप्रदेश या किसी अन्य राज्य से  उत्तीर्ण विद्ध्यार्थियों से बेहतर समझे जाते हैं | पाठ्यक्रम लगभग एक समान है,फिर आगे प्रवेश और नौकरी में यह भेदभाव क्यों ? क्या समूचे देश में कक्षा 10 और 12 की परीक्षा किसी एक बोर्ड से नहीं हो सकती ? क्या सारे देश में इस स्तर पर एकरूपता नही आ सकती |यह सब हो सकता है, अगर शिक्षा का व्यावसायीकरण रुके | शिक्षा भरपूर व्यावसायीकरण अर्थात ट्यूशन का एक बड़ा बाज़ार |
कल आये नतीजे में सर्व प्रथम रहने वाले छात्र अभिनव शर्मा का ऍफ़ एम् रेडियो पर साक्षत्कार आया, उसमे उसने स्वीकार किया कि ट्यूशन की भूमिका उसके परिणामों में भी रही है |  बोर्ड,स्कूल फिर ट्यूशन की उपलब्धता और अभाव देश की प्रतिभा के निखार में महत्वपूर्ण कारक है |पहले ट्यूशन शिक्षा के अंतर्गत एक विशेष सुविधा के रूप में होती थी, पर समय के साथ यह एक अनिवार्य व्यवस्था का रूप लेती जा रही है| इस बात का प्रमाण ‘राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थान’ (एनएसएसओ) की हाल ही में आई एक रिपोर्ट को देखने पर मिल जाता है| एनएसएसओ की रिपोर्ट के अनुसार इस वक़्त देश में निजी ट्यूशन ले रहे विद्यार्थियों की कुल संख्या लगभग 7.1 करोड़ है जो कि कुल विद्यार्थियों की संख्या का 26 से भी अधिक प्रतिशत है|
इस रिपोर्ट में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आई है कि बच्चों को ट्यूशन भेजने में अब पारिवारिक पृष्ठभूमि का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है| पहले सपन्न परिवार के ही बच्चे ट्यूशन में जाते थे मगर, अब इस स्थिति में परिवर्तन आ गया है| संपन्न परिवार हो या गरीब परिवार, सब अपनी पूरी क्षमता के अनुसार अपने बच्चे को निजी ट्यूशन के लिए भेजने लगे हैं| शहरी इलाकों में 38 प्रतिशत संपन्न परिवारों के छात्र ट्यूशन जाते हैं तो इनसे बहुत थोड़ी कमी के साथ गरीब परिवार के भी ट्यूशन जाने वाले बच्चों की संख्या 30 प्रतिशत है| इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में भी जहाँ संपन्न परिवारों के 25 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन जाते हैं, वहीँ गरीब परिवारों के भी 17 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन का सहारा लिए हुए हैं| ये अलग बात है कि संपन्न परिवार के बच्चे कथित तौर पर ज्यादा अच्छे ट्यूटर के पास ट्यूशन लेने जाते हैं तो गरीब परिवार के बच्चे शायद थोड़े कम अच्छे ट्यूटर के पास|
        बाज़ार स्कूल में प्रवेश के साथ शुरू हो जाता है | सरकारी स्कूल में प्रवेश आसानी से मिल जाता है, उसके लिए सिफारिश दान साक्षत्कार जैसे अनुष्ठान नहीं करने होते है | यहाँ नियुक्त अध्यापक अपने सारे जरूरी और ट्यूशन सहित सारे गैर जरूरी कामों से निवृत होने के बाद अपने छात्रों को दर्शन देते हैं | निजी और नामी स्कूलों में रोज आते अध्यापक स्कूल की ब्रांडिंग और प्रवेश में सुगमता जैसे सुविधा के वाहक भी होते हैं, बदले में वही ट्यूशन | केन्द्रीय शिक्षा मंडल तो मूलतः केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों को एक समान शिक्षा और पाठ्यक्रम की एकरूपता के लिए बने थे | इनमे प्रवेश के लिए जब से राजनीति का कोटा निर्धारित हुआ इनका मूल स्वरूप बदला और यह बड़े लोगो के स्कूल हो गये |
       इनकी बराबरी में कुछ धनिक लोग उतरे और उन्होंने अपने ब्रांड के स्कूल खोल दिए और यह  एक बड़ा  बाजार हो गया है | इस बाज़ार को मान्यता देने  के काम में आजकल ये सारे मंडल लगे  हुए हैं | राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वरा संचालित स्कूलों में कोई यह देखने को तैयार नहीं है कि अध्यापक कितने घंटे शैक्षणिक कार्य करते हैं |अध्यापक स्कूल के बाद निजी ट्यूशन कक्षा चलाते हैं | कुछ अध्यापक ऐसे भी हैं जो घर-घर जाकर भी ट्यूशन देने को तैयार हैं| बहुत से अध्यापक बच्चों को कक्षा और विषय के अनुसार समूह में विभाजित कर अपने घर बुलाकर भी ट्यूशन देते हैं तो कितने अध्यापक जिनकी विश्वसनीयता और साख थोड़ी स्थापित हो गई है, वे अपनी शर्तों जैसे की सप्ताह में दो या तीन दिन वो भी कोई एक विषय ही पढ़ाना तथा इसकी भी अत्यधिक फीस लेना आदि, पर ट्यूशन दे रहे हैं|
अध्यापकों से इतर ऐसे तमाम लोग जो किसी स्कूल आदि में नहीं पढ़ाते और कुछ अन्य कार्य करते हैं, वे भी अतिरिक्त समय में बच्चों को ट्यूशन देकर अच्छी-खासी आमदनी कमा  रहे हैं| साथ ही, खासकर ग्रामीण तबकों में ऐसे भी ट्यूटर्स की भरमार मिलेगी, जिनकी शिक्षा बेहद सामान्य रही है और अपने समय में वे संभवतः औसत विद्यार्थी ही रहे हैं, लेकिन लोगों में ट्यूशन के प्रति पनपे इस अति-आकर्षण का लाभ लेकर वे आज निष्णात खे जा रहे हैं| कुल मिलाकर तस्वीर यही है कि बाज़ार को छोड़ किसी को फुर्सत नहीं है कि देखें स्कूल कैसे चल रहे हैं |
                                        राकेश दुबे

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