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Thursday, July 30, 2020

समय आ गया है आर्थिक चिन्तन का



रेवांचल टाइम्स - अब वो समय आ गया है, जब दिल्ली को वैश्विक अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक रुझानों के बारे में भी चिंतन करना चाहिए, खासतौर से अमेरिका और चीन के बीच चल रही तनातनी को देखकर| इससे जुड़े कई सवाल हैं। जैसे, अमेरिका और चीन किस हद तक आपसी तनाव बढ़ाएंगे? क्या हमें भू-आर्थिक प्रतिस्पर्धा  के इस युग में किसी एक तरफ झुक जाना चाहिए? क्या भारत के लिए यह एक मौका है कि वह बाजार में विविधता की इच्छा रखने वालों और वैश्विक उत्पादन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए विनिर्माण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा दे?

        यदि इसे आधार मानकर हम आगे बढ़ते हैं कि भारत को उच्च प्रौद्योगिकी वाले औद्योगिकीकरण, अधिक गुणवत्ता वाले विनिर्माण-कार्य, उत्पादों की आपूर्ति से जुड़ी व्यवस्था में अधिकाधिक रोजगार, और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला में ज्यादा से ज्यादा भागीदारी की दरकार है, तो वैश्वीकरण में खलल डालने वाले इन रुझानों का समझदारी से लाभ उठाने की जरूरत है। इसके अतिरिक्त हमारा एक रणनीतिक लक्ष्य अपने पारंपरिक रिश्ते को फिर से जिंदा करना भी है,अर्थात  इंडो-पैसिफिक और यूरेशियाई पड़ोसी देशों के साथ अपने
कारोबारी व सामाजिक संपर्क बढ़ाना। इस परिदृश्य में भारतीय अर्थव्यवस्था में चीन की भूमिका को आखिर किस तरह गढ़ा जाना चाहिए? पिछले छह वर्षों से मोदी सरकार का रुख यही रहा है कि व्यापार घाटे को नियंत्रित किया जाए और देश में चीनी निवेश व प्रौद्योगिकी को आकर्षित किया जाए। सब बखूबी जानते हैं कि नई दिल्ली और बीजिंग किस तरह एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

अब हमें ऐसा अध्ययन करना चाहिए कि किस तरह हम लागत से अधिक फायदा कमा सकते हैं, और इसका क्या असर पड़ेगा। ऐसे आकलनों के बाद ही नीति-नियंताओं को चुनिंदा क्षेत्रों में चीन के साथ परस्पर-निर्भरता विकसित करने की नीति बनानी चाहिए या किसी अन्य देश से आयात बढ़ाकर और दूसरी जगहों से आउटसोर्सिंग करके इसे कम करने की योजना पर काम करना चाहिए। हमें सबसे पहले चीन की 2025 योजना की तरह प्रभावी औद्योगिकीकरण की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए, और फिर पता करना चाहिए कि जिस तरह से चीन की सुधार प्रक्रिया में अमेरिका उत्प्रेरक बना था, उस तरह वह हमारे कैसे काम आ सकता है?

        विशेषकर डिजिटल क्षेत्रों में अमेरिका और चीन में जो मुकाबला चल रहा है, उससे एक अन्य नीतिगत चुनौती हमारे सामने है। एक डिजिटल सुपरपावर को छोड़कर दूसरे के पाले में जाने से हमें बचना होगा। आखिरकार, चीनी और अमेरिकी कंपनियां समान धरातल पर हैं। दोनों से समान रूप से हमारी डाटा संप्रभुता को खतरा है। आयातित सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर के लिए भी हमारी इन दोनों देशों पर निर्भरता है और दोनों ही हमारी स्थानीय क्षमताओं पर समान रूप से चोट करते हैं। लिहाजा, अपना बहुमूल्य संसाधन उन्हें सौंपने से पहले, हमें घरेलू नवाचार को बढ़ावा देना चाहिए।

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