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Wednesday, June 17, 2020

सोशल मीडिया “बूमरैंग” हो जाये तो

रेवांचल टाइम्स- मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच जो सोशल मीडिया युद्ध और थाना- कचहरी हो रही है, उसके मूल में सोशल मीडिया का दुरूपयोग है | दोनों को पहले अपनी, फिर राजनीति की सीमा और मर्यादा समझना चाहिए | इस मामले जो भी राजपुरुष शामिल हैं, उहे यह समझना चाहिए की समाज में उनके कृत्तित्व की नकल उनके कार्यकर्ता करते हैं | सोशल मीडिया का प्रयोग  करने से  इस दोधारी हथियार के प्रयोग की सीमा को समझना होगा |क्योंकि दुनिया में कहीं सम्पूर्ण आज़ादी जैसी कोई चीज नहीं होती, सोशल मीडिया में यह आज़ादी कभी बूमरैंग की भांति पलटवार भी करती है। साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए हमारी यह आज़ादी तभी बनी रह सकती है जब हम दूसरे की आज़ादी को भी बनाए रखें।

      इस बात में कोई दो मत नहीं है कि सोशल मीडिया ने हमें अपनी बात कहने की आज़ादी दी है, मगर नकारात्मकता और घृणा फैलाने में भी सोशल मीडिया का कोई जवाब नहीं, क्योंकि यहां किसी तरह की रोक-टोक नहीं है । यहाँ प्रिंट मीडिया की तरह न कोई जवाबदेही है, न ही कोई फिल्टर, जिसमें छन-छनकर चीजें बाहर आती हैं। प्रिंट मीडिया में समाज के हर तबके का ध्यान और घटना के परिणामो का ध्यान पहले रखा जाता था | सोशल मीडिया में किसी को नीचा दिखाना, किसी को नीचे गिराना, झूठी-सच्ची खबरें किसी के भी नाम से दे देना, पुराने फोटो, वीडियो, दूसरे देश के फोटो, घटनाएं अपने देश की घटनाएं बताकर डालना आम बात है। किसी को बदनाम करना, ब्लैकमेलिंग सब कुछ चलता है| यह ठीक है कि झूठी बातें पकड़ में आ जाती हैं, मगर कई बार एक झूठी बात के कारण किसी का पूरा जीवन बर्बाद हो सकता है। आपकी आज़ादी किसी की बर्बादी पर क्यों खड़ी होनी चाहिए। इसे क्या कहें जो लोग इन दिनों आज़ादी-आज़ादी गला फाड़कर चिल्लाते हैं, वे बिल्कुल उसी वक्त अपनी इसी तथाकथित आज़ादी के डंडे से न जाने कितनों का शिकार करते हैं। जब से कोरोना का दुष्काल शुरू हुआ है, तब से ऐसी बातों की बाढ़ आ गई है। क्या पढ़े-लिखे, क्या अनपढ़, सब घटिया बातें करके, अपने को दूसरे से श्रेष्ठ सबित कर रहे हैं।इनमे समाज ओ दिशा एने का दम भरने वाले राजनेता भी शामिल हो गये हैं |

       ऐसे ही नेताओ के अनुयायी “मोदी को कोरोना हो जाए” “गृहमंत्री को कैंसर” होने की जैसी दुआ सोशल मीडिया पर मांगते हैं |तरह-तरह के चुटकुले कार्टून किसी के मरने की कामना करना, किसी की बीमारी के लिए दुआ मांगना, किसी के बीमार होने पर हंसना, खुशियां मनाना, आज़ादी के नाम पर समाज में इस तरह की गिरावट इससे पहले हमने कभी नहीं देखी। इन बातों से पता चलता है कि हमारे समाज का कितना पतन हो चुका है।

     आप किसी के विचारों से असहमत हो सकते हैं। राजनीतिक रूप से उसका विरोध कर सकते हैं, विरोधी के खिलाफ चुनाव लड़ सकते हैं। मगर अपने विरोधी से इतनी नफरत कि हम बस उसका बुरा ही बुरा चाहें, यह कितना शर्मनाक है। शायद मानवीय गुण से इतर कोई नाम दिया जा सकता है |


      इतिहास उठा कर देखें ,इसी देश में नेता एक दूसरे के धुर विरोधी रहे हैं । वे एक-दूसरे के विचारों के घोर विरोधी थे, लेकिन वे अपने विरोधी को कभी नेस्तनाबूद नहीं करना चाहते थे। क्या उन महान नेताओं से कुछ सीखा जा सकता है?

       विपरीत परिस्थिति में वे दिन दूर नहीं जब अपने देश में भी सोशल मीडिया की दूसरे को लांछित करने की आज़ादी के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ेगा और उसकी जद में आज इसे हथियार की तरह  इस्तेमाल करने वाले राजपुरुष ही होंगे  और यह आगामी कालखंड किसी के लिए अच्छा नहीं होगा। सोशल मीडिया को अपनी राजनीति का हथियार मत बनाइए यदि यह बूमरैंग हो गया तो क्या होगा ?

                                   राकेश दुबे

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