नवाखवाई में नई फसल के साथ जीवंत हुआ सदियों पुराना जीवन-दर्शन : पी.डी. खैरवार
नई फसल पहले प्रकृति और पूर्वजों को अर्पित, गोंड-बैगा अंचल में अन्न के सम्मान और सामुदायिक एकता का संदेश
दैनिक रेवांचल टाइम्स – मण्डला। जिला मुख्यालय सहित आदिवासी बाहुल्य मवई, बिछिया, निवास, नारायणगंज और मोहगांव के गांवों में शुक्रवार को नवाखवाई पर्व परम्परागत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। नई फसल को ग्रहण करने से पहले प्रकृति, देवी-देवताओं और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की सदियों पुरानी परम्परा इस अवसर पर एक बार फिर जीवंत दिखाई दी।
नवाखवाई की मूल भावना है कि खेत से आई नई फसल पर केवल मनुष्य का अधिकार नहीं है। उसे ग्रहण करने से पहले प्रकृति और पुरखों के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
उपवास के साथ शुरू होती है परम्परा
इस दिन परिवार के मुखिया उपवास रखते हैं। रसोई में रोजमर्रा के भोजन के अलावा खीर, पूरियां और विशेष पकवान तैयार किए जाते हैं। घर के बीच बड़े हाल में लगभग तीन फीट लंबी और दो फीट चौड़ी जगह को छुई मिट्टी से लीपा जाता है।
खेत की मेड़ पर लगे साजा के पेड़ की पत्तियां, धान के खेत से नई धान की बालियां, फूल, मौसमी फल, नारियल और कलश लाकर पूजा की थाली सजाई जाती है।
साजा के पत्तों से नौ पत्तलें तैयार की जाती हैं। इनमें सभी प्रकार के भोज्य पदार्थ परोसे जाते हैं और नई फसल के धान के दाने भी रखे जाते हैं। इन पत्तलों को पूजा स्थल पर कतार से रखकर प्रत्येक पत्तल में दो-दो धान की बालियां रखी जाती हैं।
नई धान की बालियों से होता है हवन
पूजा स्थल पर कंडे की आग में घी, गुड़, लोबान, गेहूं के आटे और नई धान की बालियों के दानों का हवन किया जाता है। इसके बाद प्रकृति के देवी-देवताओं और पूर्वज पुरखों को नई फसल एवं पकवान अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद मांगा जाता है।
पूजन के बाद सात पत्तलों का भोजन प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है। शेष दो पत्तलों और पूजन सामग्री को थाल में रखकर घर के मुख्य दरवाजे के सामने से छत पर रखा जाता है और पानी छोड़ा जाता है।
लोक मान्यता: मान्यता है कि छत पर रखा भोजन ग्रहण करने के लिए पूर्वज कौए के रूप में आते हैं और परिवार को आशीर्वाद देकर चले जाते हैं।
पोला-पिठोरा से शरद पूर्णिमा तक नवाखवाई
यह पर्व पोला-पिठोरा के दूसरे दिन से लेकर शरद पूर्णिमा तक परिवार अपनी सुविधा और परम्परा के अनुसार मनाते हैं। आदिवासी अंचल में नवाखवाई केवल नई फसल के उपयोग की शुरुआत नहीं, बल्कि प्रकृति और पूर्वजों के प्रति सम्मान की महत्वपूर्ण परम्परा मानी जाती है।
बुजुर्गों के अनुसार नवाखवाई केवल नई फसल खाने की शुरुआत नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा जीवन-दर्शन छिपा है। यह संदेश देता है कि अन्न मनुष्य अकेले नहीं उगाता। मिट्टी, पानी, बीज, जैव-विविधता, जंगल और सामूहिक श्रम सभी की इसमें साझी भूमिका होती है।
नवाखवाई के जरिए नई पीढ़ी को अन्न का सम्मान, जंगल को जीवन का आधार मानने और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की सीख मिलती है।
🍃 साजा के पत्तों से बनाई जाती हैं नौ पत्तलें
🌾 पूजा में रखी जाती हैं नई धान की बालियां
🔥 नई फसल के दानों से किया जाता है हवन
🙏 सात पत्तलों का भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण
🐦 दो पत्तलें पूर्वजों के निमित्त छत पर रखने की परम्परा
🌳 अन्न, जंगल और प्रकृति के सम्मान का संदेश
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