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सवालों के घेरे में जन अभियान परिषद की कार्य प्रणाली

 


दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला। मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मंडला जिले, विशेषकर जनपद पंचायत नैनपुर क्षेत्र से ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं जिनमें परिषद के अधिकारियों एवं परामर्शदाताओं पर ग्राम विकास प्रस्फुटन समितियों पर कथित रूप से अनावश्यक दबाव बनाने के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि समितियों को मिलने वाली सीमित सरकारी राशि का उपयोग ग्राम विकास के बजाय एमएसडब्ल्यू एवं बीएसडब्ल्यू कोर्स के नाम पर लक्ष्य पूरा करने तथा बार-बार फ्लेक्स-बैनर, बोर्ड, चाय-नाश्ते और कार्यक्रमों में खर्च कराया जा रहा है।

ग्रामीणों और समिति पदाधिकारियों का कहना है कि जिन समितियों को गांवों में विकास और जनजागरूकता के उद्देश्य से सीमित धनराशि उपलब्ध कराई जाती है, उसी राशि पर अब कई तरह के खर्च का बोझ डाल दिया गया है। इससे समितियां आर्थिक संकट से जूझ रही हैं और अपने मूल उद्देश्य पूरे नहीं कर पा रही हैं।

'लक्ष्य पूरा करो' का दबाव!

जानकारी के अनुसार एमएसडब्ल्यू एवं बीएसडब्ल्यू पाठ्यक्रम में अधिक से अधिक लोगों का प्रवेश कराने के लिए परामर्शदाताओं द्वारा समितियों पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। आरोप है कि यह दबाव मौखिक आदेशों के जरिए डाला जा रहा है। कई समितियों ने दबाव में आकर राशि खर्च भी कर दी, जबकि गांवों में इस प्रकार के पाठ्यक्रमों को लेकर अपेक्षित रुचि देखने को नहीं मिल रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शासन की कोई शैक्षणिक योजना है तो उसका खर्च संबंधित विभाग को उठाना चाहिए, न कि ग्राम विकास के लिए निर्धारित राशि को इस उद्देश्य में खर्च कराया जाए।

विकास की जगह फ्लेक्स-बैनर का बोझ

समितियों का आरोप है कि लगभग हर कार्यक्रम में नए फ्लेक्स-बैनर, बोर्ड, प्रचार सामग्री और चाय-नाश्ते की व्यवस्था कराने के निर्देश दिए जाते हैं। इससे मिलने वाली अधिकांश राशि इन्हीं मदों में खर्च हो जाती है। नतीजतन गांवों में विकास गतिविधियों, जनहित कार्यों और समिति संचालन के लिए पर्याप्त धन नहीं बचता।

समिति पदाधिकारियों का कहना है कि इस प्रकार के प्रचार-प्रसार संबंधी खर्च जनपद या जिला स्तर से किए जाने चाहिए, लेकिन पूरा वित्तीय भार ग्राम स्तर की समितियों पर डाल दिया जाता है।

यात्रा व्यय तक के पैसे नहीं बच रहे

कई समितियों के अध्यक्षों और सचिवों का कहना है कि उन्हें बैठकों और कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए स्वयं खर्च करना पड़ रहा है। समिति के खाते में इतनी राशि भी नहीं बचती कि यात्रा व्यय का भुगतान किया जा सके। ऐसे में गांव स्तर पर योजनाओं का प्रभावी संचालन करना कठिन होता जा रहा है।

मनमानी पर उठे सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि यदि वास्तव में समितियों के माध्यम से इस प्रकार खर्च कराया जा रहा है तो यह पूरी व्यवस्था की निष्पक्ष जांच का विषय है। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि किन अधिकारियों या परामर्शदाताओं के निर्देश पर समिति की राशि खर्च कराई गई और इसका लेखा-जोखा किस आधार पर तैयार किया गया।

जांच और कार्रवाई की मांग

नागरिकों एवं समिति पदाधिकारियों ने शासन और जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित परामर्शदाताओं तथा जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जाए। साथ ही समितियों को पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराई जाए, अध्यक्ष एवं सचिव को मानदेय दिया जाए, प्रशिक्षण की व्यवस्था हो तथा ग्राम विकास के वास्तविक कार्यों के लिए संसाधन बढ़ाए जाएं।

    वही बड़ा सवाल

क्या ग्राम विकास के लिए मिलने वाली राशि को लक्ष्य आधारित गतिविधियों और प्रचार-प्रसार में खर्च कराना उचित है? यदि नहीं, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी? यही सवाल अब मंडला जिले में जन अभियान परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।

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