बारिश ने खोली विकास की हकीकत, सड़कें बनी दलदल, गंदगी और जलभराव के बीच नारकीय जीवन जीने को मजबूर लोग
रेवांचल टाइम्स | मंडला, जिले के ग्रामीण अंचलों और क़स्बों में आज भी सड़के कीचड़ से भरी पड़ी हुई है जहाँ लोगो के लिए पक्की सड़कें नाली तो है पर वह दिखाई नही पड़ रही है जहाँ जिम्मेदार स्वच्छता को लेकर लाखों करोड़ों खर्च पर आज भी नाली और सड़कों के किनारे कचरे के लगे ढेर आसानी से देखे जा सकते है।
वही चुनावी मंचों से विकास के बड़े-बड़े दावे, स्वच्छता के लंबे-चौड़े भाषण और करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की घोषणाएं... लेकिन जैसे ही बारिश शुरू हुई, घुटास की सच्चाई ने इन सभी दावों की परतें उधेड़कर रख दीं। सड़कें कीचड़ में तब्दील हैं, नालियां जाम हैं, गंदगी का अंबार लगा है और आम जनता बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर है। सवाल यह है कि आखिर जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार अधिकारी जमीनी हकीकत देखने कब निकलेंगे, या फिर विकास केवल मंचों और भाषणों तक ही सीमित रहेगा?
बरसात ने साबित कर दिया कि विकास के नाम पर किए गए दावे कितने खोखले हैं। जिन रास्तों से रोज़ बच्चे स्कूल जाते हैं, बुजुर्ग अस्पताल पहुंचते हैं और ग्रामीण अपने जरूरी कामों के लिए निकलते हैं, आज वहीं सड़कें दलदल बन चुकी हैं। जगह-जगह गंदा पानी भरा है, प्लास्टिक और कचरे के ढेर सड़ रहे हैं और लोगों को हर कदम पर फिसलने व बीमारियों का खतरा झेलना पड़ रहा है।
स्वच्छता अभियान और विकास योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि गांव और बस्तियों की यह स्थिति है, तो यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता का परिणाम है। बरसात से पहले नालियों की सफाई, जल निकासी की व्यवस्था और कचरा प्रबंधन किया जाना चाहिए था, लेकिन जिम्मेदार विभाग शायद केवल फाइलों और बैठकों तक ही सीमित रहे।
अब सवाल जनता पूछ रही है—क्या जनप्रतिनिधियों का विकास केवल शिलान्यास, लोकार्पण और मंचों पर भाषण देने तक सीमित है? क्या उन्हें उन गलियों में जाने की फुर्सत नहीं, जहां लोग रोज़ गंदगी, कीचड़ और बदबू के बीच जीने को मजबूर हैं?
यदि समय रहते सफाई, जल निकासी और सड़कों की व्यवस्था नहीं सुधारी गई, तो यह गंदगी डेंगू, मलेरिया, डायरिया जैसी गंभीर बीमारियों को खुला निमंत्रण देगी। इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
घुटास की जनता अब भाषण नहीं, जमीनी विकास चाहती है। जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को चाहिए कि वे वातानुकूलित सभागारों और मंचों से निकलकर गांव की गलियों में उतरें, वास्तविक स्थिति देखें और तत्काल स्थायी समाधान सुनिश्चित करें। क्योंकि विकास भाषणों से नहीं, धरातल पर दिखाई देने वाले कार्यों से साबित होता है। ये हाल केवल घुटास के नही बल्कि अधिकांशतह ग्रामीण अंचलों के ऐसे और इससे भी अधिक दयनीय स्थिति में लोग अपना जीवन बसर कर रहे है और विधायक मंत्री सांसद मंचों से विकास के ढोल पीट रहे है और जनता अब इनके इरादे विकास वादे समझने लगी है किसी का विकास हो या न हो जनप्रतिनिधियों और उनके कार्यकर्ता ओ के विकास जरूर तेजी से हो रहे और जनता का जो हाल है वह तो जमी में दिखाई पड़ ही रह है।

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