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Saturday, October 1, 2022

चीतों की दहाड़ में छिप न जाये कही गौमाता के आंसू...


रेवांचल टाईम्स - मप्र मे 17 सितंबर को प्रधानमंत्री द्वारा अपने 72वें जन्मदिवस के मौके पर कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया से लाए गए चीतों को बाड़े में छोड़ा गया है निश्रित तौर पर ग्वालियर चंबल अंचल के लिए यह बहुत बड़ी सौगात है और अंचल आभारी हैं कि प्रधानमंत्री का इसके लिए उन्होंने अंचल को चुना क्योंकि आज भी यह पूरा क्षेत्र बीहड़ और डकैतों के नाम से पहचाना जाता है चीते न सिर्फ इस क्षेत्र की पहचान बदलेंगे बल्कि आदिवासी बहुल श्योपुर ही नहीं समूचे अंचल में रोजगार और पर्यटन उद्योग को नई ऊंचाइयां प्रदान करेंगे वही दूसरी ओर देश में गौवंशीय पशुओं की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है भारत में गाय को गौमाता का दर्जा दिया गया है लेकिन अफसोस आज गौमाता की दुर्दशा पर किसी का ध्यान नहीं है ऐसा लगता है जैसे चीतों की दहाड़ के आगे गौमाता के आंसू कहीं छिप गए हो वास्तव में गौमाता को जिस तरह भारतीय जनमानस के मन मस्तिष्क पर पूजनीय पशु का दर्जा देकर केवल चुनाव में इस्तेमाल किया जाता है गौशालाओं का समुचित प्रबंन्ध न होने के कारण आज गायों की इतनी दुर्दशा हो रही है जिसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते हैं आज गाय को रखने वाले लोग स्वार्थी हो गए हैं जब तक गाय दूध देती है तब तक तो लोग उसे अपने पास रखते हैं और उसके बाद उसका दूध निकाल कर सड़कों पर आवारा रुप से छोड़ देते हैं जिससे कि वह हादसों में भी अपनी जान गंवा देती है केंद्र सरकार गौतस्करी रोकने और अन्य राज्यों में गौमांस प्रबंधन को लेकर किये गए चुनावी वादों से जितना नुकसान किसान के इस पशुधन गाय का हुआ है शायद ही किसी अन्य पशु का हुआ हो जहां एक और करोड़ों रुपए खर्च कर प्रदेश में हर जिले में गौशालाओं का विस्तार तो करा दिया गया है और करोड़ों रुपए पानी की तरह खर्च किए जा रहे हैं लेकिन इन गौशालाओं में गायों को सिर्फ पानी ही बड़ी मुश्किलों से नसीब हो रहा है और सड़कों पर आवारा घूम रही है  करोड़ों रुपयों के बजट भी गाय के अच्छे दिन नहीं ला सकें मौजूदा चुनाव व राजनीति का प्रमुख दांव गौमाता की दुर्दशा का अंदाज़ा गौशालाओं व सड़कों पर आए दिन दुर्घटनाओं में गाय की अकाल मृत्यु से लगाया जा सकता है आज हालात ये है कि इस मूक पशु के संरक्षण की जिम्मेदारी लेने को कोई सरकार कोई संगठन तैयार नहीं है गाय सिर्फ राजनीति के नारों में जरूर जिंदा है सरकार चाहें तो सड़कों राजमार्गों व गली मोहल्लों में भूख प्यास व बीमारियों से मरती गायों का जिला स्तर पर चारागाह व सरकारी भूमि में संरक्षण कर सकती है सच तो यह है कि आज गौशाला पर हर साल करोडों रुपए का खर्च होता है इसके बावजूद भी अव्यवस्थाएं है जिसके कारण गायों की हालत खराब है गौशालाओं में गायों के लिए कोई सुविधाएं ही नहीं है गायों को सर्दी से बचाव के लिए पर्याप्त इंतजाम तक नहीं है इसके साथ ही बारिश के बाद तो हालात और भी बदतर हो जाते हैं गायों को रखने वाली भूमि पर अवैध कब्जों और चारागाह विकास न किए जाने के कारण किसान कम दूध देने  वाली गाय है बैल का पालन पोषण करने में असमर्थ हो गए हैं सरकार द्वारा बनाई गई गौशालाओं में भी गौवंंश की अच्छे से देखरेख नहीं होने के कारण मच्छरों व कीचड़ में ही रहना पड़ता है आज जब देश में चीतों को विदेशों से मंगाने की चर्चा जोरों पर है तो वहीं देश में गायों की हीन दशा पर किसी का ध्यान नहीं है तो क्या देश के लिए चीते इतने आवश्यक हो गए थे कि गायों की ओर किसी भी नेताओं  का ध्यान ही नहीं है आज यह आवारा पशुओं की तरह सड़क पर इधर उधर घुमती नजर आ जाती है सड़कों पर व्याप्त कूड़ा कचरा खाने पर मजबूर हैं यदि अपने पेट की भूख शांत करने हेतु किसी के खेत में घुस जाती है तो मारकर बाहर भगा दिया जाता है इस प्रकार गोवंशीय पशुओं का यह हाल देखा नहीं जाता भले ही चीतों के संरक्षण हेतु चीतों का भारत आना सही है लेकिन देश में दयनीय जीवन जीने के लिए विवश अति पूजनीय गौमाता की दशा सुधारने के प्रयास भी किये जाने चाहिए यदि गायों की दशा सुधारने के प्रयास नहीं किये जा सकते तब चीतों का भारत आना इतना आवश्यक नहीं जितना भारत के पूर्व से ही अपनी दशा पर आंसू बहा रही गायों का संरक्षण करना है।

         तेन्दूखेड़ा/दमोह से विशाल रजक की रिपोर्ट


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