रेवांचल टाईम्स:इंसान के शरीर में एक प्रमुख अंग आंखें हैं, जो काफी सेंसिटिव होती हैं. हल्की सी आहट से तुरत पलकें झपका लेती हैं तो डर के मारे पुतलियां फैला लेती है. नींद में पलकों को बंद कर लेती है तो वहीं खुशी और गम में आंसू भी बहाती हैं. आंखों में आंसू आने के पीछे शरीर का पूरा विज्ञान काम करता है. इंसानों के आंखों से आंसू किसी दुख, परेशानी या बेहद खुशी के मौके पर ही नहीं आते हैं, बल्कि ये किसी खास गंध या चेहरे पर तेज हवा के लगने के वजह से भी आते हैं. जैसे कि प्याज काटने पर भी आंखें छलछला उठती हैं तो खुश होने पर ही और दुखी होने पर तो आंखें भर ही आती हैं.
भावुकता में आंसू सिर्फ इंसान बहा सकता है
क्या आप जानते हैं कि इंसानों को जानवरों से अलग करने वाली चीज़ों में से एक आंसू भी हैं जो आपको जानवरों से अलग करता है और वो है कि सिर्फ इंसान ही भावुक होकर आंखों से आंसू बहा सकता है. हम चोट लगने पर भी रोने लगते हैं तो दुखी होने पर भी आंसू बहाते हैं. लेकिन भावुक होने पर आने वाले आंसू अब भी अबूझ हैं.
आंसू आने के हैं फायदे, रोने की जांच असंभव है
आंखों में आनेवाला आंसू आंखों के लिए फायदेमंद होता है. ये आंख को शुष्क होने से बचाता है और उसे साफ और कीटाणु रहित रखने में मदद करता है. ये आंख की अश्रु नलिकाओं से निकलने वाला तरल पदार्थ है जो पानी और नमक के मिश्रण से बना होता है.
बीबीसी की छपी रिपोर्ट में प्रोफेसर माइकल जो ट्रिंबल इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूरोलॉजी में न्यूरोलॉजी के प्रोफ़ेसर ने बताया कि, “डार्विन ने कहा था कि भावुकता के आंसू सिर्फ़ इंसान ही बहाते हैं और फिर किसी ने इस बात का खंडन नहीं किया. दरअसल रोने की प्रयोगशाला में जांच नहीं की जा सकती.असल ज़िंदगी में रोना बहुत अलग होता है.”
अमेरिका में सबसे ज्यादा लोग रोते हैं
क्लाउडिया हेमंड कहती हैं, “ये अलग-अलग संस्कृति के हिसाब से अलग हो सकता है. अगर देश के लिहाज से देखें तो आदमी-औरत दोनों के रोने के लिहाज से अमरीका सबसे ऊपर है. सबसे कम रोने वालों में मर्द बुल्गारिया के हैं तो औरतें आइसलैंड और रोमानिया की.”
आंसुओं का खास मतलब होता है
इसराइल के वाइट्स मैन इंस्टीट्यूट में न्यूरोबायलॉजी के प्रोफेसर नोएम सबाओ ने भावुकता से पैदा हुए आंसुओं का सैंपल लिया और कामोत्तेजना पर उसकी जांच की. उन्होंने पाया कि दुख के आंसुओं का कामोत्तेजना पर असर पड़ा है और ये कम हुई. टेस्टेरॉन का स्तर कम होने से आदमी की आक्रामकता भी कम होती है. इसका मतलब ये है कि आंसुओं से सीधा संदेश जाता है- कृपया मुझ पर हमला न करें.
लड़कों के मुकाबले लड़कियां ज्यादा रोती हैं
प्रोफ़ेसर रौटैनबर्ग कहते हैं, “शिशुओं के रोने पर काफ़ी अध्ययन किया गया है, ये आसान है. लेकिन 10-11 की उम्र में जब लड़का और लड़की अपने लिंग को पहचानने लगते हैं, तबसे लड़कियां लड़कों के मुकाबले ज़्यादा रोती हैं और ये ताउम्र जारी रहता है.”
प्रोफ़ेसर ट्रिंबल कहते हैं, “टीवी के साथ इस पर काफ़ी फ़र्क पड़ा है. ओलंपिक एक अच्छा उदाहरण है. इसमें खिलाड़ी रोते हैं जीतने पर और हारने पर भी. दर्शक भी जीत और हार में रोते हैं और ये सब टीवी में देखता है. इससे सार्वजनिक रूप से रोने को स्वीकार्यता मिलती है.”

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