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Monday, May 30, 2022

आज शनि जयंती में शनि देव के साथ वट सावित्री एवम पति की दीर्घायु के लिए माताओ ने की पूजा...


रेवांचल टाइम्स नैनपुर -- आज तीन तिथियां साथ आयी है जिसमे सोमवती अमावश्या,शनि जयंती के साथ वट सावित्री का योग बना है। शनि भगवान, शनिदेव की पूजा भी बाकि देवी-देवताओं की  पूजा की तरह सामान्य ही होती है. नगर के प्रतिष्ठित पंडित शांतनु महाराज ने बताया कि प्रातः काल उठकर शौचादि से निवृत होकर स्नानादि से शुद्ध हों. फिर लकड़ी के एक पाट पर काला वस्त्र बिछाकर उस पर शनिदेव की प्रतिमा या तस्वीर या फिर एक सुपारी रखकर उसके दोनों ओर तेल का दीपक जलाकर धूप जलाएं. शनिदेवता के इस प्रतीक स्वरूप को पंचगव्य, पंचामृत, इत्र आदि से स्नान करवायें. इसके बाद अबीर, गुलाल, सिंदूर, कुमकुम व काजल लगाकर नीले या काले फूल अर्पित करें.


तत्पश्चात इमरती व तेल में तली वस्तुओं का नैवेद्य अपर्ण करें. इसके बाद श्री फल सहित अन्य फल भी अर्पित करें. पंचोपचार पूजन के बाद शनि मंत्र का कम से कम एक माला जप भी करना चाहिए. माला जपने के पश्चात शनि चालीसा का पाठ करें व तत्पश्चात शनि महाराज की आरती भी उतारनी चाहिये.


ज्येष्ठ अमावस्या को शनि जयंती के साथ-साथ वट सावित्री व्रत भी रखा जाता है. हिन्दू धर्म में वट सावित्री व्रत को करवा चौथ के समान ही माना जाता है. स्कन्द, भविष्य पुराण व निर्णयामृतादि के अनुसार यह व्रत ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को करने का विधान है. भारत में वट सावित्री व्रत अमावस्या को रखा जाता है. इस व्रत को संपन्न कर सावित्री ने यमराज को हरा कर अपने पति सत्यवान के प्राण बचाए थे.


वट सावित्री व्रत की विधि-


वट सावित्री व्रत के दिन दैनिक कार्य कर घर को गंगाजल से पवित्र करना चाहिए. इसके बाद बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्माजी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए. ब्रह्माजी के बाईं ओर सावित्री तथा दूसरी ओर सत्यवान की मूर्ति स्थापित करनी चाहिए. कहा जाता है कि वटवृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु व डालियों व पत्तियों में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है.

इस व्रत में महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं, इस व्रत को स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती रहने की मंगलकामना से करती हैं. टोकरी को वट वृक्ष के नीचे ले जाकर रख देना चाहिए. इसके पश्चात सावित्री व सत्यवान का पूजन कर, वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पण करना चाहिए. पूजन के समय जल, मौली, रोली, सूत, धूप, चने का इस्तेमाल करना चाहिए. सूत के धागे को वट वृक्ष पर लपेटकर तीन बार परिक्रमा कर सावित्री व सत्यवान की कथा सुने. पूजन समाप्त होने के बाद वस्त्र, फल आदि का बांस के पत्तों में रखकर दान करना चाहिए और चने का प्रसाद बांटना चाहिए. यह व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है.

        सज इसी अवसर पर नैनपुर के हनुमान मंदिर में लगे वट व्रक्ष के नीचे बैठकर माताओं ने वट सावित्री की अपने पतियों की दीर्घायु के लिए पूजा अर्चना की।सुबह से ही गर्मी से बचने के लिए भीड़ देखी गई।

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